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भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल (First Home Minister of India, Sardar Vallabhbhai Patel)
भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल (First Home Minister of India, Sardar Vallabhbhai Patel)

सरदार पटेल बनाम झूठों के संघी सरदार

सरदार पटेल बनाम झूठों के संघी सरदार

हमारे देश के किसी भी प्रमुख राजनैतिक नेता द्वारा भारत के प्रथम गृह मंत्री, सरदार वल्लभ भाई झावर भाई पटेल (Sardar Vallabh Bhai Jhawar Bhai Patel) जैसे क़द्दावर नेता के वारिस होने का सपना देखना एक स्वाभाविक बात है। मरते दम तक कांग्रेस से जुड़े रहने वाले सरदार की पूजनीय हैसियत रही है और देश के उप-प्रधान मंत्री के रूप में ही वे दुनिया से दिसम्बर 15, 1950 को विदा हुए।

पिछले कुछ सालों में उनकी विरासत के दावेदारों में अचानक ज़बरदस्त वृद्धि होई है। सरदार पटेल की विरासत (Sardar Patel’s legacy) हथियाने के काम में आरएसएस/भाजपा के नेताओं द्वारा, विशेषकर, नरेंद्र भाई मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद काफ़ी तेज़ी आई है।

लाल कृष्ण अडवाणी, केशु भाई पटेल और प्रवीण तोगड़िया एक ही समय में खुद को ‘छोटा सरदार’ या ‘लौह-परुष’ कहलवाना पसंद करते थे। मोदी तो सरदार की जगह खुद को विराजमान मानते हैं।

Sardar Patel’s order banning RSS

सरदार की विरासत के बहुत सारे दावेदार हों, इस में क्या बुराई हो सकती है, लेकिन परेशानी यह है कि बीसवीं शताब्दी के अंत में पैदा हुए यह वारिस, उनकी अपनी सार्वजानिक घोषणाओं के अनुसार, आरएसएस से जुड़े हैं। और यह वही संगठन है जिसे देशद्रोही मानकर सरदार ने आज़ाद भारत के प्रथम गृह-मंत्री रहते हुए, नाथूराम गोडसे द्वारा (जनवरी 30, 1948) गाँधी जी की हत्या (Assassination of Gandhi) के बाद फ़रवरी 4, 1948 के दिन प्रतिबन्ध लगाया था।

The main reasons for banning RSS

यह प्रतिबंध लगाए जाने के पीछे जो कारण थे उनमें कई राष्ट्र विरोधी कार्य भी शामिल थे। सरदार के गृह मंत्रालय द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगा देने वाला आदेश भी अपने आप में बहुत स्पष्ट था –

“भारत सरकार ने 2 फ़रवरी को अपनी घोषणा में कहा है कि उसने उन सभी विद्वेषकारी तथा हिंसक शक्तियों को जड़ मूल से नष्ट कर देने का निश्चय किया है, जो राष्ट्र कि स्वतंत्रता को ख़तरे में डालकर उसके उज्ज्वल नाम पर कलंक लगा रहीं हैं। उसी नीति के अनुसार चीफ़ कमिश्नरों के अधीनस्थ सब प्रदेशों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अवैध घोषित करने का निश्चय भारत सरकार ने कर लिया है। गवर्नरों के अधीन राज्यों में भी इसी ढंग की योजना जारी की जा रही है।”

सरकारी विज्ञप्ति में आगे चलकर कहा गया –

“संघ के स्वयं सेवक अनुचित कार्य भी करते रहे हैं। देश के विभिन्न भागों में उसके सदस्य व्यक्तिगत रूप से आगज़नी, लूटमार, डाके, हत्याएं तथा लुकछिप कर शस्त्र, गोला और बारूद संग्रह करने जैसी हिंसक कार्रवाईयां कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि ये लोग पर्चे भी बांटते हैं, जिनसे जनता को आतंकवादी मार्गों का अवलंबन करने, बंदूकें एकत्र करने तथा सरकार के बारे में असंतोष फैलाकर सेना और पुलिस में उपद्रव कराने की प्रेरणा दी जाती है।”

सरदार पटेल ने 18 जुलाई सन् 1948 को हिंदू महासभा के एक प्रमुख नेता, श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में एक बार फिर हिंदू महासभा के साथ-साथ आरएसएस को भी महात्मा गांधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए लिखा –

“जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए। लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का, ख़ासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर काण्ड संभव हो सका। मेरे दिमाग़ में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग षड़यंत्र में शामिल था। आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए ख़तरा थीं। हमें मिली रिपोर्टें बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं। दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है।“

Sardar Patel about the role of RSS in Gandhi’s assassination

सरदार पटेल ने गांधी जी की हत्या में आरएसएस की भूमिका के बारे में स्वयं गोलवलकर को एक पत्र के माध्यम से जो कुछ लिखा था वह भी पढ़ने लायक़ है।

सरदार पटेल ने, गाँधी जी की हत्या के लगभग आठ महीने बाद, यह पत्र 19 सितम्बर 1948 को लिखा :

“हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रश्न है। उनके अतिरिक्त यह भी था कि उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख़याल, न सभ्यता व विशिष्टता का ध्यान रखा, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी, इनकी सारी तक़रीरें सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह ज़हर फैले। उस ज़हर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कु़र्बानी देश को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति ज़रा भी आरएसएस के साथ न रही, बल्कि उनके खि़लाफ़ हो गयी। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी उस से यह विरोध और भी बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के ख़िलाफ़ कार्यवाही करना ज़रूरी ही था।”

यह सही है कि सरदार ने फ़रवरी 7, 1948 को प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में, जब गाँधी जी के हत्यारों और साज़िशकर्ताओं के बारे में जाँच-पड़ताल आरम्भिक दौर में थी, बताया था कि गांधीजी की हत्या की साज़िश में “आरएसएस बिल्कुल शामिल नहीं थी। यह सावरकर के सीधे नेतृत्व में हिन्दू महासभा का कट्टरवादी भाग था जिस ने यह साज़िश रची और अंजाम दिया।” हालांकि, इसी पत्र में सरदार ने यह भी यह भी बताना ज़रूरी समझा कि,

“आरएसएस जैसे गोपनीय संगठन जिसके कोई रिकॉर्ड, पंजिका इत्यादि नहीं होते हैं, के बारे में प्रमाणित सूचना प्राप्त करना कि कोई विशेष व्यक्ति इस का सक्रिय सदस्य है या नहीं, एक बहुत मुश्किल काम होता है।”

सरदार ने जब गोलवलकर को सितम्बर 1948 में पत्र लिखा तब तक हत्यारों और साज़िश के बारे में काफ़ी स्थितियाँ साफ़ हो चुकी थीं और सरदार ने इसे बेबाकी से लिखा भी।

Correspondence between Sardar Patel and Golwalkar (then the head of the RSS)

आरएसएस/भाजपा टोली एक सफ़ेद झूठ यह भी लगातार बोलती रहती है कि सरदार और भारत सरकार ने अपनी ग़लती मानकर उस पर से (जुलाई 11, 1949 को प्रतिबन्ध हटाया था। सच्चाई इस से कितनी भिन्न है इस का पता सरदार और गोलवलकर (उस समय आरएसएस के सर्वोसर्वा) के बीच हुए पत्र-व्यवहार से लगाया जा सकता है। गोलवलकर ने जब यह मान लिया कि आरएसएस भारतीय संविधान और तिरंगे में निष्ठा रखेगा, हिंसा और गुप्तता को पूरी तरह त्याग देगा, आंतरिक प्रजातंत्र को लागू करेगा और अपने एक लिखित संविधान को सार्वजानिक करेगा तभी प्रतिबन्ध हटाया गया।

सरदार ने इस की सूचना नेहरू को अगस्त 16, 1949 को लिखे अपने पत्र द्वारा इन शब्दों में दी :

“गोलवलकर आए और मुझ से मिले। मैंने उनसे सामान्य बात-चीत की और उन्हें समझाया कि ऐसी कौन सी बुराईयां हैं जिन से आरएसएस को न केवल अपने हितों के ख़ातिर बल्कि समग्र देश के हितों की खातिर बचना चाहिए। मैंने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि आरएसएस घातक और विनाशक पद्धतियों को छोड़ कर रचनात्मक पद्धतियाँ गृहण करे। मैं ने उन्हें सावरकर की आत्मघाती नीतियों से सावधान किया, गोडसे जिस का भाष्यकार था।”

नेहरू के खिलाफ़ सरदार को खड़ा करने वाली संघ टोली इतिहास की सच्चईयों से खिलवाड़ करने में माहिर होने के बावजूद धूल चाटेगी, यह तय है। इस सच को झुठलाना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है कि सरदार जीते-जी नेहरू के उप-प्रधान मंत्री रहे। अगर सरदार के प्रति नेहरू की ‘नफ़रत’ की आरएसएस के ‘बौद्धिक शिविरों’ में गढ़ी गयीं तमाम दस्तानों में रत्ती भर भी सच्चाई होती तो गांधीजी की हत्या के बाद नेहरू सरदार को गृह-मंत्री होने के नाते हटा सकते थे, जिस की मांग भी की जा रही थी और स्वयं सरदार ने इस्तीफे की पेशकश की थी, जो बिलकुल नहीं मानी गयी। नेहरू ने सख़्त शब्दों में ऐसी किसी मांग को ख़ारिज कर दिया।

ख़ुद सरदार नेहरू से कितना प्यार करते थे, उस की जानकारी सरदार की मौत से ठीक चार महीने पहले (अगस्त 16, 1949) उन के द्वारा, नेहरू को लिखे एक पत्र में इन शब्दों में मिलती है :

“मेरे लिए स्वतंत्रता दिवस वर्षगांठ पर आप से दूर रहना मेरे लिए बहुत दुखद अनुभव रहा है [सरदार गंभीर रूप से बीमार होने के कारण इलाज के लिए बम्बई में थे]। मैं जानता हूँ, इन नाज़ुक दिनों में मुझे आप के क़रीब ही होना चाहिए। मुझे पूरी आशा है कि दिल्ली से मेरी उनुपस्थिति कम-से-कम दिनों की होगी। मुझे ख़ासतौर पर यह जानकार बहुत दुःख हुवा है कि शरणार्थियों ने आप के साथ अशोभनीय बर्ताव किया है। यह हम सब के लिए शर्म की बात है और सार्वजानिक जीवन में शिष्टता के जो तत्व होने चाहियें उस के बिलकुल ख़िलाफ़ है। कितना अच्छा होता कि आप का बोझ बाँटने के लिए मैं दिल्ली में होता। आप ने इन शरणार्थियों का उस से कहीं ज़्यादा आदर किया है जिस के वे हक़दार थे।”

यह गंभीर जाँच का विषय है कि सरदार के आरएसएस के विरुद्ध बेबाक स्पष्ट विचार और कर्म होने के बावजूद आखिर हिंदुत्व टोली को उनके वारिस होने का दावा करने की हिम्मत कैसे होती है और उन्हें यह सब करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है।

RSS betrayed the freedom struggle

आरएसएस सिर्फ़ सरदार को ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के कई दूसरे नायकों जैसे कि गांधीजी, सुभाष चंद्र बोस और डॉ. भीमराव आंबेडकर को भी गोद लेना चाहता है। इस का एक मात्र कारण है कि आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम से ग़द्दारी की। इस के और जिन्ना की मुस्लिम लीग के विश्वासघात के बावजूद कांग्रेस के नेतृत्व में हमारा देश आज़ाद हुआ और एक प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में जीवित भी रहा।

आरएसएस/भाजपा शासकों की टोली अपने हिन्दुत्ववादी पूर्वजों की ग़द्दारी पर पर्दा डालने के लिए इतिहास की सच्चाईयों और वास्तविक घटनाओं को तोड़-मोड़ कर पेश करने के काम में जुटी है। सरदार पटेल तो एक बहाना हैं!

शम्सुल इस्लाम

नवम्बर 11, 2019.

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