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सत्याग्रही संपादक गांधी : मीडिया को फ़िर से पत्रकारिता बनाने की लड़ाई कलम के नाम उधार है

यदि यह विचारधारा सच हो, तो दुनिया के कितने समाचारपत्र इस कसौटी पर खरे उतर सकते हैं? लेकिन निकम्मों को बंद कौन करे? कौन किसे निकम्मा समझे? उपयोगी और निकम्मे दोनों साथ-साथ ही चलते रहेंगे। उनमें से मनुष्य को अपना चुनाव करना होगा।”

There are many challenges facing journalism in the country today.

आज देश में पत्रकारिता के सामने कई चुनौतियां हैं। इसकी सबसे बड़ी चुनौती आज खुद की विश्वसनीयता को बचाए रखना है। वर्तमान समय में मीडिया व सत्ता गठजोड़ ने लोगों को नए प्रकार से सोचने पर मज़बूर किया है। आज भारत मे बहुसंख्यकवाद यानी हिन्दुत्व का एक महत्वपूर्ण तात्पर्य यह भी है कि यह अल्पसंख्यकों के लिए बहिष्कारवादी, लेकिन हिन्दू समाज के लिए समवेशी मंतव्यों वाला सिद्धांत है।

आज भारत को एक नए दिशा मे बढ़ रहा है या गढ़ा जा रहा है, पर भारतीय जनमानस उस समझ से बिलकुल अछूता है। जिसमें पत्रकारिता की महती भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफ़ा का मानना है कि ‘पत्रकारिता में कामिटमेंट समाप्त होता जा रहा है।’ अखबारों मे संपादकों की पोस्ट ख़त्म हो गई, अब मैनेजर और प्रोपराईटर का जमाना है।

आज सामाजिक, धार्मिक कट्टरपंथ और बाजार का कट्टरपंथ मिल-जुल देश की राजनितिक जमीन तैयार करने में लगा है। वर्तमान संपादकीय में भी पाठकों से संवाद को लगभग खत्म सा कर दिया है। विचार का एकतरफा, ज्ञान व सूचना का आधिकारिक प्रामाणिक स्रोत समझ लेना इतिहास, वर्तमान व भविष्य के पत्रकारिता साथ बेईमानी है।

समाचार-पत्रों व मीडिया तंत्रों पर नजर डालें तो उसके सकरात्मक प्रभाव तो पड़ रहे हैं, पर इनके द्वारा फैलने वाले कई प्रकार के साम्प्रदायिक व झूठी ख़बरों से समाज के एक तबके के प्रति गुस्सा व वैमनस्यता को बढ़ावा दे रहे हैं।

Gandhi’s editorial on toxic journalism

अख़बारों व चैनलों पर नफ़रत फ़ैलाने वाले ख़बरों की बाढ़ है। इसी प्रश्न पर 28 मई, 1931 को ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी ने ‘विषैली पत्रकारिता’ शीर्षक से की गई एक टिप्पणी में लिखा-

“अख़बारों की नफरत पैदा करनेवाली बातों से भरी हुई कुछ कतरनें मेरे सामने पड़ी हैं। इनमें सांप्रदायिक उत्तेजना, सफेद झूठ और खून-खराबे के लिए उकसाने वाली राजनीतिक हिंसा के लिए प्रेरित करने वाली बातें हैं। निस्संदेह सरकार के लिए मुकदमे चलाना या दमनकारी अध्यादेश जारी करना बिल्कुल आसान है। ये उपाय क्षणिक सफलता के सिवाय अपने लक्ष्य में विफल ही रहते हैं; और ऐसे लेखकों का हृदय-परिवर्तन तो कतई नहीं करते, क्योंकि जब उनके हाथ में अख़बार जैसा प्रकट माध्यम नहीं रह जाता, तो वे अक्सर गुप्त रूप से प्रचार का सहारा लेते हैं।”

Gandhi had recognized the power of non-violent resistance in South Africa itself.

गांधी अहिंसात्मक प्रतिरोध की इस ताक़त को दक्षिण अफ्रीका में ही पहचान चुके थे। जब दुनिया के एक तिहाई से अधिक देश ब्रिटिश हुकूमत के अधीन गुलामी, शोषण व मानवीय क्रूरता के शिकार थे। उस समय गांधीजी अपने लेखों के जरिये इस गुलामी सोच के प्रति लोगों में चेतना जागृत करने का काम कर रहे थे। उन्होंने वहां राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जनमत निर्माण करने के माध्यम के रूप में पत्रकारिता का इस्तेमाल किया। वे अपने अनुभवों को और दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के अपने प्रयोगों को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में लाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने “इंडियन ओपीनियन”(1903) नामक पत्र का सम्पादन करना आरम्भ किया। इस पत्रिका के पहले अंक में ही गांधी जी ने पत्रकारिता के उद्देश्यों को बत्ताते हैं जिसमे वह स्पष्ट करते हैं कि पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्ति देना है। यह सब गांधीजी द्वारा एक संपादक के रूप में तब किया जा रहा था, जब ब्रिटिश सत्ता की सम्राज्यवादी व्यवस्था अपने उत्कर्ष पर थी। इस हुकूमत के खिलाफ़ उठने वाले किसी भी आवाज को न सुनना और न ही किसी प्रकार के उपदेश के रूप में पड़ना उसे पसंद था। दक्षिण अफ्रीका के अपने अख़बारी दिनों को याद करते हुए महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है –

“समाचार-पत्र सेवाभाव से ही चलाने चाहिएं। समाचार-पत्र एक जबर्दस्त शक्ति है; लेकिन जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गांव के गांव डुबो देता है और फसल को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार निरंकुश कलम का प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। लेकिन यदि ऐसा अंकुश बाहर से आता है, तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है. अंकुश अंदर का ही लाभदायक हो सकता है।”

वे साधारण लोगों में साम्राज्यवादी नीतियों के प्रति चेतना चाहते थे, ताकि वे साम्राज्यवाद व औधोगिक निति से मनुष्य के मशीनीकरण से बच सकें। मानवीय मूल्य जो एक मानव को सहयोग, प्रेम व सहभागी उत्पादन की शिक्षा देता है वह इस समाज में बना रहे।

महात्मा गांधी अपने पत्रकारिता से मनुष्य को उस एकाकी जीवन से बाहर निकलना चाहते थे जो उस समय से लेकर वर्तमान में पूंजीवाद की सबसे बड़ी समस्या है। मनुष्य की बहुआयामी व्यक्तित्व व उसके बहुल सृजनात्मकता की हत्या को रोकना चाहते थे, जो व्यक्ति को एकांकी बना रही थी।

वर्तमान समय में पत्रकारिता को एक पेशा व सूचनाओं को समाज का डंपिंग ग्राउंड समझना, ऐसे में गांधी की पत्रकारिता व सत्य के साथ उनके प्रयोग यह बताती है कि नैसर्गिक गति से भी पत्रकारिता की जा सकती है।

उनके लेख में पाठकों को सब्र से पढ़ने के निर्देश के साथ कई बार पढ़ने का निवेदन भी रहता था। वे मानते थे कि उनके हर आदर्श पाठक में स्वाध्याय और सत्याग्रह की योग्यता है। उनका पाठक से संबंध बनाने का उद्देश्य उनके जीवन को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलना नहीं था, जो सामन्यतया एक प्रचारक की होती है।

गांधी जी अपने पाठक के साथ बेबाक रिश्तेदारी और अधिकार रखते थे। वे यह बात पर हमेशा जोर देते हैं कि संपादक व मालिक से ज्यादा किसी प्रकाशन की मिल्कियत उसके पाठकों में होती है।

वे पाठकों को पत्रों का जवाब इस विनम्रता से देते थे, जैसे वे अपने किसी सम्बन्धी से बात कर रहे हों। वहीं अगर आज के पत्रकारिता पर जोर डाली जाय तो मीडिया के मालिक संस्थान ही नवउदारवादी और निजीकरण के सबसे बड़े लाभार्थी रहे हैं।

साप्ताहिक अख़बार इंडियन ओपिनियन में ही नहीं, बल्कि बाद के हरिजन, यंग इंडिया, दैनिक नवजीवन पत्रों के माध्यम से पाठकों के कटु से कटु सवालों का सहजता से जवाब नियमित देना जारी रखा। साथ ही, प्रेस की स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों पर भी उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे थे।

महात्मा गांधी का मानना था कि कलम की निरंकुशता खतरनाक हो सकती है, लेकिन उस पर व्यवस्था का अंकुश ज्यादा खतरनाक है। बीते दो दशकों में हमने पत्रकारिता को शेयर बाजार में बदल डाला है, जिनमें समय के साथ सूचना की कीमतों की बोली लग रही है। व्यवसाय के साथ पत्रकारिता इतनी ज्यादा गुथी है कि चैनलों के व्यावसायिक हित, दरअसल इन्हें नियंत्रित करने वालों के व्यावसायिक हित हैं। आज जानकारी उपनिवेश व साम्राज्यवादी काल से भी तेज गति से प्रसारित होती है। इसके बारे में कहा जाता कि इसने व्यक्ति को दुनिया से परिचित कराया है, जो उसके सर्वांगीण विकास में उत्प्रेरक का कार्य किया है। लेकिन इस बात पर उतनी प्रबलता से जोर नहीं दिया जा रहा है; सूचना की यह गति व्यक्ति को मशीनों का दास बना रही है।

गांधीजी मशीनी सभ्यता को ‘शैतानी सभ्यता’ कह कर इसकी भर्त्सना करते हैं। साधारण लोगों को एक क्रुद्ध और जानलेवा भीड़ बना देना कभी भी इतना आसान नहीं रहा।

इसाबेल हाफ्मायर द्वारा लिखित पुस्तक ‘गांधीज प्रिंटिंग प्रेस : एक्सपेरिमेंट इन स्लो रीडिंग’(2013) पत्रकारिता के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों पर नज़र डालते हुए इस प्रश्न का जवाब देने का प्रयास करती हैं कि पाठकों में यह बदलाव कैसे आए? इस तेज गति से भागती समाज में जिसमें हम किस ओर जा रहे हैं, यह तो पता है पर हम कहाँ पहुचेंगे इस पर बहुत कम ही ध्यान दिया जा रहा है।

जानकारी, सूचना और समझ का मनुष्य के शरीर और मन की प्राकृतिक गति के आधार पर, गहनता से विचार करने पर ज़ोर देने की ज़रूरत है।

गांधी जी द्वारा पाठक से संबंध बनाने का उद्देश्य उनके जीवन को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलना नहीं था, जो सामन्यतः एक प्रचारक की होती है। अख़बार, टीवी या वेब मीडिया की रीडरशिप और व्यूअरशिप उसकी लोकप्रियता का पैमाना उतनी नहीं हो सकता, जितनी कि उसका अपने पाठकों से वैचारिक आदान-प्रदान का स्वस्थ और आत्मीय संबंध। अपने अख़बार ‘इण्डियन ओपीनियन’ के बारे में वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं-

“इस अख़बार के द्वारा मुझे मनुष्य के रंग-बिरंगे स्वभाव का बहुत ज्ञान मिला। संपादक और ग्राहक के बीच का निकट का और स्वच्छ संबंध स्थापित करने की ही धारणा होने से मेरे पास हृदय खोलकर रख देने वाले पत्रों का ढ़ेर लग जाता था। उसमें तीखे, कड़वे, मीठे, भांति-भांति के पत्र मेरे नाम आते थे। उन्हें पढ़ना, उनपर विचार करना, उनमें से विचारों का सार लेकर उत्तर देना- यह सब मेरे लिए शिक्षा का उत्तम साधन बन गया था। मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो इसके द्वारा मैं समाज में चल रही चर्चाओं और विचारों को सुन रहा होऊं।”

प्रिंट मीडिया में जो लिखा जा रहा है उसपर कुछ गिने चुने ही समाचारपत्र विचार कर रहे हैं, लेकिन जो बोलते हैं वे जरूरी नहीं कि वह पहले उस पर सोचते हैं।

आज पत्रकारिता में विश्लेषण करने की क्षमता कम होती जा रही है। सूचना प्रदान करना ही नहीं वरन उसका दायित्व भावी समाज को निर्देशित करना भी हैं।

वर्तमान समय में लोकतंत्र के इस चौथे आधार ने मुनाफ़ा कमाना अपना प्राथमिक उद्देश्य बना लिया है। ऐसे में गांधी जैसा सत्याग्रही संपादकीय दर्शन ही इनको रास्ता व संबल प्रदान कर सकता है।

गांधी मार्ग अंक में पी.साईनाथ का लेख ‘कहां है हमारा मीडिया’ इस पर गहनता से विचार करता है। उनके शब्दों में “पत्रकारिता कब और कैसे मीडिया बन गयी? जब तक वह कलम थी, हमारे हाथ में थी; मीडिया बनी तो उसके हाथ में चली गई जो कलम चलाना नहीं जानता, शेयर बाजार चलाना जनता है! मीडिया को फ़िर से पत्रकारिता बनाने की लड़ाई कलम के नाम उधार है।”

शुभम जायसवाल

 

http://www.hastakshep.com/oldthe-storm-ahead-in-india-all-our-state-institutions-have-collapsed-and-become-hollow-and-empty-shells-justice-markandey-katju/

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