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देशद्रोह और राष्ट्रद्रोह शब्द भारतीय दंड संहिता में हैं ही नहीं

क्या राजद्रोह हटेगा? राजद्रोह जैसे अपराध को अभिव्यक्ति की आजादी कुचलने के सरकारी या पुलिसिया डंडे के रूप में रखे जाने का संवैधानिक औचित्य नहीं है၊

कनक तिवारी

राजनेता, मीडिया, विश्वविद्यालय और स्वयंभू प्रबुद्ध वर्ग देशद्रोह, राजद्रोह और राष्ट्रद्रोह शब्दों को गड्डमगड्ड कर रहे हैं। देशद्रोह और राष्ट्रद्रोह शब्द भारतीय दंड संहिता में हैं ही नहीं। धारा 124- के अनुसार-जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का, प्रयत्न करेगा या अप्रीति प्रदीप्त करेगा, या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुर्माने से दंडित किया जाएगा। स्पष्टीकरण 1-‘‘अप्रीति पद के अंतर्गत अभक्ति और शत्रुता की समस्त भावनाएं आती हैं।‘‘ जेएनयू में 9 फरवरी को कुछ छात्रों ने कथित कश्मीरी आजादी के लिए भारत विरोधी तथा पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए। तीन छात्र गिरफ्तार किए गए लेकिन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर पुलिस ने भारत विरोधी नारे लगाने का साक्ष्य नहीं पाया। सैनिकों की कुर्बानी, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, देशभक्ति, जेएनयू की स्वायत्तता, अभिव्यक्ति की आजादी, छात्र राजनीति की भूमिका आपस में सरफुटौवल कर रहे हैं। राजद्रोह की पैदाइश और संवैधानिक स्थिति समझना जरूरी है। 1850 में ब्रिटिश संसद में रचित भारतीय दंड संहिता में शामिल राजद्रोह में 1870 में संशोधन भी हुआ। लोकमान्य तिलक पर 1897 में राजद्रोह का मुकदमा चला। परिभाषा की अपूर्णता के कारण 1898 में छोड़ दिया गया। 1898 में परिभाषा संशोधित हुई। तिलक को 1908 में राजद्रोह के लिए गिरफ्तार कर 6 वर्ष काले पानी की सजा दी गई। 1922 में राजद्रोह का अपराध चलने पर गांधी ने व्यंग्य में जज से कहा कि यह अंगरेजी कानून की जनता की स्वतंत्रता को कुचलने की धाराओं में राजकुमार की तरह है। गांधी को छह वर्ष की सजा दी गई। संविधान सभा के ड्राफ्ट में अभिव्यक्ति की आजादी को राजद्रोह सहित प्रतिबंधों के साथ परिभाषित किया गया। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने तर्कपूर्ण भाषण के जरिए राजद्रोह शब्द रखने का कड़ा विरोध किया। मुंशी ने बताया कि राजद्रोह शब्द की विचित्र गति होती रही है। डेढ़ सौ वर्ष पूर्व इंग्लैंड में सभा करना अथवा जुलूस निकालना राजद्रोह समझा जाता था। ब्रिटिश काल में भारत में एक कलेक्टर की आलोचना करने पर राजद्रोह का अपराध बताया गया। महबूब अली बेग साहब बहादुर ने कहा कि ऐसे प्रावधान के कारण हिटलर जर्मनी के विधानमंडल द्वारा बनाए हुए कानूनों के अधीन बिना मुकदमा चलाए हुए जर्मनों को बंदी शिविरों में रख सकता था। सेठ गोविन्ददास ने राजद्रोह को संविधान से उखाड़ फेंकने की मांग की। रोहिणी कुमार चौधरी ने कहा कि यह अभागा शब्द देश में कई क्लेशों का कारण रहा है। इसकी वजह से स्वतंत्रता पाने तक में देर हुई है। टी.टी. कृष्णमाचारी ने बताया कि अमेरिकी कानूनों में अठारहवीं सदी के अंत में कुछ समय के लिए इस तरह के प्रावधान थे लेकिन इस शब्द के प्रति विश्वव्यापी घृणा फैल गई। संविधान के पहले संशोधन पर 1951 में संसद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस शब्द को हटाने की पुरजोर दलील दी। फिर भी यह शब्द भारतीय दंड संहिता में कायम रह गया। पंजाब उच्च न्यायालय ने 1951 तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1959 में राजद्रोह को असंवैधानिक घोषित किया। लेकिन केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य वाले मामले में 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह की संवैधानिकता को बरकरार रखा। फिर भी इस शब्द की परिभाषा कोव्यापक, जनोन्मुखी और लचीला बनाने की कवायद की। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्त किया कि किसी कानून की एक व्याख्या संविधान के अनुकूल प्रतीत होती है और दूसरी संविधान के प्रतिकूल। तो न्यायालय पहली स्थिति के अनुसार कानून को वैध घोषित कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 1960 में दि सुप्रिंटेंडेंट प्रिजन फतेहगढ़ विरुद्ध डॉ. राममनोहर लोहिया प्रकरण में पुलिस की यह बात नहीं मानी कि यदि किसी कानून को नहीं मानने का जननेता आह्वान करे तो उसे राजद्रोह की परिभाषा में रखा जा सकता है। बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तान जिंदाबाद नारा लगाने के कारण आरोपियों को राजद्रोह के अपराध से मुक्त कर दिया। कानून का ऐसा ही निरूपण बिलाल अहमद कालू के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया। 2010 में कश्मीर के अध्यापक नूर मोहम्मद भट्ट को कश्मीरी असंतोष को प्रश्न पत्र में शामिल करने, टाइम्स ऑफ इंडिया के अहमदाबाद स्थित संपादक भरत देसाई को पुलिस तथा माफिया की सांठगांठ का आरोप लगाने, विद्रोही नामक पत्र के संपादक सुधीर ढवले को कथित माओवादी से कम्प्यूटर प्राप्त करने, डॉक्टर विनायक सेन को माओवादियों तक संदेश पहुंचाने, उड़ीसा के पत्रकार लक्ष्मण चौधरी द्वारा माओवादी साहित्य रखने, एमडीएमके के नेता वाइको द्वारा यह कहने कि श्रीलंका में युद्ध नहीं रुका तो भारत एक नहीं रह पाएगा और पर्यावरणविद पीयूष सेठिया द्वारा तमिलनाडु में सलवा जुडूम का विरोध करने वाले परचे बांटने जैसे कारणों से राजद्रोह का अपराध चस्पा किया गया। उच्चतम न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ के ताजा फैसले में यह सिद्धांत स्थिर किया है कि किसी कानून में इतनी अस्पष्टता हो कि निर्दोष लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके तो ऐसा कानून असंवैधानिक है। भारतीय दंड संहिता में अन्य कई प्रावधान हैं। उनसे राज्य विद्रोही कार्यवाहियों के आरोपियों की मुश्कें कसी जा सकती है। धारा 121ए 121-क और 122 केअनुसार राज्य के विरुद्ध अपराध करने के लिए मौत तक की कड़ी सजाएं तो राजद्रोह की सजाओं से ज्यादा हैं। राजद्रोह के लिए मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है। धारा 131 से 140 तक सेना के विरुद्ध अपराधों की सूची है। सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ के प्रकरण में राजद्रोह की संवैधानिकता पर मुहर लगाई थी। तब इंग्लैंड में प्रचलित समानान्तर प्रावधानों का सहारा लिया था। इंग्लैंड में संबंधित धारा का विलोप कर दिया गया है। न्यूजीलैंड, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया वगैरह में भी इस तरह के कानून की कोई उपयोगिता प्रकट तौर पर नहीं रह गई है। राजद्रोह जैसे अपराध को अभिव्यक्ति की आजादी कुचलने के सरकारी या पुलिसिया डंडे के रूप में रखे जाने का संवैधानिक औचित्य नहीं है၊ कनक तिवारी की फेसबुक टाइमलाइन से साभार

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