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Shaheed E Azam Bhagat Singh

क्रान्ति ईश्वर-विरोधी हो सकती है लेकिन मनुष्य-विरोधी नहीं- शहीद-ए-आज़म भगत सिंह

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और इंक़लाब

उदय चे

23 मार्च 1931 भारत की क्रांति के  इतिहास का वो ऐतिहासिक दिन है जिस दिन इंग्लैंड की साम्राज्यवादी सरकार ने साम्राज्यवादी इंग्लैंड के खिलाफ भारत ही नहीं पूरे विश्व की मेहनतकश जनता द्वारा छेड़े गये युद्ध के महान योद्धाओं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को युद्ध छेड़ने का आरोपी मानते हुए इन 23 साल के नौजवान योद्धाओं को फांसी दे दी गयी थी। आज 23 मार्च इन योद्धाओं का 87 वां शहादत दिवस है।

 इसलिए 87 वें शहादत दिवस पर मैं एक महत्वपूर्ण चर्चा करना चाहता हूँ।

मैं ईमानदारी से कोशिश करना चाहता हूँ उनके उस विचार को आम जनता के सामने लाने की जिस महान विचारधारा के लिए उन्होंने अपनी जान कुर्बान की, लेकिन उनके उस विचार को और उनकी कुर्बानियों को सभी राजनितिक पार्टियों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने आने वाली पीढ़ियों के सामने ईमानदारी से रखने की बजाए, बड़े ही शातिराना तरीके से अपने अनुसार पेश किया। इन सभी ने शहीदों के विचारों के साथ खिलवाड़ करके उनके विचारों को मारने का ही काम किया। जिसे पूरे विश्व की मेहनतकश जनता कभी माफ नहीं करेगी।

मुझे शहीदों के विचारों की हत्या करने में शामिल पूंजीवादी, साम्प्रदायिकतावादी, फासीवादी पार्टियों, धार्मिक संगठनों से कोई गिला नहीं है क्योंकि ये सभी तो इनके जीवित रहते समय भी इनको मारने का काम ही कर रहे थे। लेकिन सबसे ज्यादा गुस्सा उन प्रगतिशील बुद्विजीवियों और वामपंथियों पर है जिनको भगत सिंह और उनके साथियों के विचार को, उस युद्ध को जिन्दा रखना था। उस विचार और युद्ध को जो मेहनतकश आवाम की आजादी के लिए लड़ा जा रहा था, जो अन्याय के खिलाफ, साम्राज्यवाद के खिलाफ और जो प्रकृति का अनिवार्य युद्ध है लेकिन इन्होंने इस युद्ध में भागीदारी करने की बजाए, इस घिनौने काम में अपनी भागीदारी निभायी।

इतिहास में इन छद्म प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और संशोधनवादी वामपंथियों को युद्ध से गद्दारी करने के नाम से जाना जायेगा।

भगत सिंह के एक वाक्य पिस्तौल और बम क्रांति नहीं लाते, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है  जिसको इन सब ने संदर्भ से काटकर जनता के सामने पेश किया जो सबसे खतरनाक कार्य है।

इन्होंने भगत सिंह और उसके साथियों को सशस्त्र संघर्ष चलाने वाले और वैचारिक क्रांति के अग्रदूत पेश करने की बजाए एक अहिंसावादी साबित करने की कोशिश की, जो बहुत ही खतरनाक के साथ-साथ भगतसिंह के विचार से गद्दारी है।

मैं भगत सिंह और उसके साथियों के दस्तावेजों से कुछ कोटेशन यहाँ रखना चाहूंगा। उसके बाद फैसला आपको करना है कि क्रांतिकारी साथियों का इंक़लाब और क्रांति से क्या मतलब था और इंक़लाब का रास्ता क्या होगा।

“स्वतन्त्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है। भारत में स्वतन्त्रता का पौधा फलने के लिए दशकों से क्रान्तिकारी अपना रक्त बहाते रहे हैं। बहुत कम लोग हैं जो उनके मन में पाले हुए आदर्शों की उच्चता तथा उनके महान बलिदानों पर प्रश्नचिह्न लगायें, लेकिन उनकी कार्रवाइयाँ गुप्त होने की वजह से उनके वर्तमान इरादे और नीतियों के बारे में देशवासी अँधेरे में हैं, इसलिए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने यह घोषणापत्र जारी करने की आवश्यकता महसूस की है।

 विदेशियों की ग़ुलामी से भारत की मुक्ति के लिए यह एसोसिएशन सशस्त्र संगठन द्वारा भारत में क्रान्ति के लिए दृढ़ संकल्प है। ग़ुलाम रखे हुए लोगों की ओर से स्पष्ट तौर पर विद्रोह से पूर्व गुप्त प्रचार और गुप्त तैयारियाँ होनी आवश्यक हैं। जब देश क्रान्ति की उस अवस्था में आ जाता है तब विदेशी सरकार के लिए उसे रोकना कठिन हो जाता है। वह कुछ देर तक तो इसके सामने टिक सकती है, लेकिन उसका भविष्य सदा के लिए समाप्त हो चुका होता है। मानवीय स्वभाव भ्रमपूर्ण और यथास्थितिवादी होने के कारण क्रान्ति से एक प्रकार का भय प्रकट करता है। सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताक़त और विशेष सुविधाएँ माँगने वालों के लिए भय पैदा करता है। क्रान्ति एक ऐसा करिश्मा है जिसे प्रकृति स्नेह करती है और जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती – न प्रकृति में और न ही इन्सानी कारोबार में। क्रान्ति निश्चय ही बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दा मुहिम नहीं है और न ही यहाँ-वहाँ चन्द बम फेंकना और गोलियाँ चलाना है; और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समयोचित न्याय और समता के सिद्धान्त को ख़त्म करना है। क्रान्ति कोई मायूसी से पैदा हुआ दर्शन भी नहीं और न ही सरफ़रोशों का कोई सिद्धान्त है। क्रान्ति ईश्वरविरोधी हो सकती है लेकिन मनुष्यविरोधी नहीं। यह एक पुख़्ता और ज़िन्दा ताक़त है। नये और पुराने के, जीवन और ज़िन्दा मौत के, रोशनी और अँधेरे के आन्तरिक द्वन्द्व का प्रदर्शन है, कोई संयोग नहीं है। न कोई संगीतमय एकसारता है और न ही कोई ताल है, जो क्रान्ति के बिना आयी हो। ‘गोलियों का राग’ जिसके बारे में कवि गाते आये हैं, सच्चाई रहित हो जायेगा अगर क्रान्ति को समूची सृष्टि में से ख़त्म कर दिया जाये। क्रान्ति एक नियम है, क्रान्ति एक आदर्श है और क्रान्ति एक सत्य है।”*1 हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

 “क्रान्तिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतन्त्रता मिलेगी। वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रान्तिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जायें। क्रान्ति पूँजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अन्त कर देगी।”*2 बम का दर्शन

हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वंतन्त्रता का अवसर मिल सके। हम मनुष्य का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुःखी है। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है।”*3 अस्मेबली हॉल में फेंका गया पर्चा

आतंकवाद सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं और क्रान्ति भी आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं

 “आतंकवाद सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं और क्रान्ति भी आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं। यह तो क्रान्ति का एक आवश्यक और अवश्यम्भावी अंग है। इस सिद्धान्त का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रान्ति का विश्लेषण कर जाना जा सकता है। आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदा करता है और पीड़ित जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत कर उसे शक्ति प्रदान करता है। अस्थिर भावना वाले लोगों को इससे हिम्मत बँधती है तथा उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है। इससे दुनिया के सामने क्रान्ति के उद्देश्य का वास्तविक रूप प्रकट हो जाता है क्योंकि यह किसी राष्ट्र की स्वतन्त्रता की उत्कट महत्त्वाकांक्षा का विश्वास दिलाने वाला प्रमाण है। जैसे दूसरे देशों में होता आया है, वैसे ही भारत में भी आतंकवाद क्रान्ति का रूप धारण कर लेगा और अन्त में क्रान्ति से ही देश को सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।”*4 बम का दर्शन

“यदि वायसराय की गाड़ी के नीचे बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो दो में से एक बात अवश्य हुई होती, या तो वायसराय अत्यधिक घायल हो जाते या उनकी मृत्यु हो गयी होती। ऐसी स्थिति में वायसराय तथा राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच मन्त्रणा न हो पाती, यह प्रयत्न रुक जाता और उससे राष्ट्र का भला ही होता। कलकत्ता कांग्रेस की चुनौती के बाद भी स्वशासन की भीख माँगने के लिए वायसराय भवन के आसपास मंडराने वालों के ये घृणास्पद प्रयत्न विफल हो जाते। यदि बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सज़ा पा जाता। ‘मेरठ’ तथा ‘लाहौर षड्यन्त्र’ और ‘भुसावल काण्ड’ का मुक़दमा चलाने वाले केवल भारत के शत्रुओं को ही मित्र प्रतीत हो सकते हैं।”*5 बम का दर्शन

“हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें। हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही ग़लत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धान्तों का स्पष्ट बोध नहीं हो पाता। हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल-प्रयोग, परन्तु क्रान्तिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है; दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अपने आप को कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का हृदय-परिवर्तन सम्भव हो सकेगा।”*6 बम का दर्शन

काल्पनिक अहिंसा

ऊपर हमने ‘काल्पनिक अहिंसा’ शब्द का प्रयोग किया है। यहाँ पर उसकी व्याख्या कर देना भी आवश्यक है। आक्रामक उद्देश्य से जब बल का प्रयोग होता है उसे हिंसा कहते हैं, और नैतिक दृष्टिकोण से उसे उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब उसका उपयोग किसी वैध आदर्श के लिए किया जाता है तो उसका नैतिक औचित्य भी होता है। किसी हालत में बल-प्रयोग नहीं होना चाहिए, यह विचार काल्पनिक और अव्यावहारिक है। इधर देश में जो नया आन्दोलन तेज़ी के साथ उठ रहा है, और जिसकी पूर्व सूचना हम दे चुके हैं वह गुरु गोविन्द सिह, शिवाजी, कमाल पाशा, रिज़ा खाँ, वाशिंगटन, गैरीबाल्डी, लफ़ायत और लेनिन के आदर्शों से ही प्रस्फुरित है और उन्हीं के पद-चिह्नों पर चल रहा है। चूँकि भारत की विदेशी सरकार तथा हमारे राष्ट्रीय नेतागण दोनों ही इस आन्दोलन की ओर से उदासीन लगते हैं और जानबूझकर उसकी पुकार की ओर से अपने कान बन्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं, अतः हमने अपना कर्त्तव्य समझा कि हम एक ऐसी चेतावनी दें जिसकी अवहेलना न की जा सके।*7 बम कांड पर सेशन कोर्ट में बयान   

है। अकेला बम और पिस्तौल क्रांति ला सकते है और अकेला विचार

      क्रांति के लिए बम, पिस्तौल और मेहनतकश के पक्ष का विचार बहुत जरूरी तत्व है। न अकेला बम और पिस्तौल क्रांति ला सकते है और न अकेला विचार। क्योकि बम और पिस्तौल अगर किसी लुटेरे के हाथ में जायेगा तो वो लूट मचाएगा, अगर किसी धार्मिक, जातिय अतिवादी के हाथ में जायेगा तो वो दूसरे धर्म और जात के लोगो को मारेगा। लेकिन अगर मेहनतकश आवाम को वैचारिक तौर पर परिपक्व कर दिया जाये तो वह अपने दुश्मन पूंजीपति लुटेरे को पहचान लेगा। मेहनतकश आवाम, लुटेरे पूंजीपति की लूट के खिलाफ आवाज उठाएगा। सदियों से लूटी गई अपनी दौलत को वापिस मांगेगा। लेकिन लुटेरा पूंजीपति उस समय मेहनतकश आवाम के खिलाफ पिस्तौल और बम का इस्तेमाल करेगा। उसके जवाब में मेहनतकश आवाम को पिस्तौल और बम की जरूरत अपनी आत्मरक्षा में और जवाबी कार्रवाई में पड़ेगी।

न ही अकेला विचार क्रांति ला सकता है।

अगर आप क्रांति के रास्ते में पिस्तौल और बम को नकारते हो सिर्फ वैचारिकता की बात करते हो तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हो। लुटेरा पूंजीपति आपको एक झटके में हरा देगा।

      “मेरा मतलब यह कदापि नहीं है कि बम व पिस्तौल बेकार हैं, वरन् इसके विपरीत, ये लाभदायक हैं। लेकिन मेरा मतलब यह जरूर है कि केवल बम फेंकना न सिर्फ बेकार, बल्कि नुकसानदायक है। पार्टी के सैनिक विभाग को हमेशा तैयार रहना चाहिए, ताकि संकट के समय काम आ सके। इसे पार्टी के राजनीतिक काम में सहायक के रूप में होना चाहिए। यह अपने आप स्वतन्त्र काम न करे।”*8 कांग्रेस का उद्देश्य

        मेरे मेहनतकश साथियों अगर आप अन्याय पर आधारित किसी भी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहते हो और एक न्याय संगत समाज जिसमे इंसान का इंसान शोषण न करे, एक देश दूसरे देश का शोषण न करे, जाति, धर्म, इलाका के नाम पर भेदभाव न हो, सबको अपना विकास करने के भरपूर मौके मिलें। जहाँ अन्नदाता आत्महत्या न करे, जहाँ न किसी माँ से नजीब छीना जाये, न रोहित वेमुला। न मिर्चपुर हो, न भगाना, न डाबड़ा हो। न सलवा जुडूम हो, न नंदीग्राम, न सिंगुर हो। न मारुति हो न हौंडा हो, हो तो बस न्याय हो। न ही जहां सिख कत्लेआम हो न ही मुस्लिमों के साथ गुजरात हो। जहाँ महिला पेट से लेकर कब्र तक सुरक्षित हो तो इसके लिए सिर्फ एक ही रास्ता है, वो रास्ता है…..

भगत सिंह का रास्ता, इंक़लाब का रास्ता

                             इंक़लाब जिंदाबाद जिंदाबाद जिंदाबाद।।

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