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देखना है विध्वंसकारी सफल होते हैं या समृद्ध साझी संस्कृति वाली भारतीय सभ्यता

धर्मनिरपेक्ष-प्रजातान्त्रिक भारत की बौद्धिक सम्पदा का विनाश

शम्सुल इस्लाम

आधुनिक विश्व इतिहास के बदतरीन तानाशाह हिटलर ने जर्मनी पर नाज़ी पार्टी का पूरी तरह शिकंजा कसे जाने के बाद गर्व से घोषणा की थी कि नाज़ी पार्टी की इस सफ़लता की सब से बड़ी वजह जर्मनी के विश्वविद्यालयों पर नाज़ियों का आधिपत्य स्थापित होना था। भारत का मौजूदा आरएसएस/बीजेपी नेतृत्व दिन-रात इसी पवित्र काम में लगा है। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए वे दोहरी रणनीति पर काम कर रहे हैं। एक है देश की उच्च शिक्षा संस्थानों, खासकर बौद्धिक उत्कृष्टता और स्वतंत्र वैचारिक अभिवयक्ति के लिए प्रसिद्ध राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं, के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ना। इस हमले के भी दो पहलू हैं। एक है JNU, Jadavpur University, Delhi University, Hyderabad Central University और Poona Film Institute जैसी संस्थाओं को राष्ट्रविरोधी केंद्रों के रूप में चिन्हित करना। और फिर ABVP, आरएसएस के प्रचारक उपकुलपतियों, हिंदुत्व के पक्षधर विचारकों के साझा अभियान द्वारा हिन्दुत्ववादी और हिन्दू राष्ट्रवादी चिंतन से असहमत शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों पर हिंसक हमले करना। इस के बाद पुलिस की मिलीभगत से उनकी गिरफ्तारियां और राष्ट्रद्रोह जैसे इल्ज़ामों में मुक़दमों की बौछार।

यह सब कितनी सीना-जोरी से हो रहा है इस का अंदाज़ा इन शिक्षा संस्थाओं में घटी कुछ शर्मनाक घटनाओं को जानकर भली-भांति लगाया जा सकता है। 

JNU के उपकुलपति ने हाल ही में यह मांग की है कि तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में और खासकर उनकी जागीर JNU में सेना के टैंक को स्थापित किया जाए। फिलहाल तो उनकी मांग सेवा से बाहर एक टैंक खड़ा करने की है लेकिन यह महोदय कब सच-मुच के सेना टैंकों को विश्वविद्यालयों में आमंत्रित करेंगे इस खतरे को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। याद रहे कि यह मांग कुलपति महोदय ने एक भूत-पूर्व सेना अधिकारी की मौजूदगी में की जिन्हों ने खुल्ले-आम कहा कि JNU ही नहीं बल्कि राष्ट्रविरोधी तत्वों के क़ब्ज़े में "कई क़िले हैं जैसे कि Jadavpur और Hyderabad University जिन पर हमारी सेना को क़ब्ज़ा करना होगा"।  



हमारे शासकों का यही 'मिलिट्री' दिमाग़ है जिस की वजह से BHU की आम छात्राएं जो बेलगाम छेड़-छाड़ और गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़ उठा रहीं थीं, भयानक पुरुष पुलिस दमन की शिकार हुई हैं, महिला अधियपिकाओं को भी नहीं बख्शा गया। हिन्दुत्ववादी राजनीति के अलम्बरदार उत्तर प्रदेश के मुख़्यमंत्री और BHU के उप कुलपति ने इन् के विरोध को समाज विरोधी तत्वों द्वारा संचालित बताया है। 

ऐसा नहीं है की किसी देश में पहली बार विश्वविद्यालयों में सेना के टैंकों को भेजने की  बात हो रही है। यह पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सैनिक तानाशाहों द्वारा 1969-1971 के दरमियान और इंडोनेशिया में 1967-1969 के काल में सैनिक तानाशाह जनरल सुहार्तो द्वारा भेज भी जा चुके हैं। वहां 'राष्ट्रविरोधी' अध्यापकों, छात्रों और कर्मचारियों के खून की नदियां बह चुकी हैं। 

इस सीधे हमले का एक पहलू है इन शिक्षा संस्थाओं का निर्धनीकरण अर्थात शिक्षा बजट में भारी कटौती। इस का सीधा नतीजा यह हुआ है कि शिक्षकों की नौकरियों में ज़बरदस्त कटौती या तदर्थ नियुक्तियां (इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 50% पद खाली हैं), छात्रों के लिए उपलब्ध सीटों में भारी कटौती और कर्मचारियों की भर्ती लगभग रोक। ऐसा लगता है मानो मौजूदा शासकों ने तय कर लिया है कि वे बांस ही नहीं रहने देंगे जिस के बाद बांसुरी के भिन्न-भिन्न स्वर ही नहीं निकल सकेंगे। 

ज्ञान और बुद्धि के विकास के लिए अति-ज़रूरी इन शिक्षा संस्थाओं के विनाश के लिए केवल हिंसा को ही औज़ार नहीं बनाया जा रहा है। इस से भी खतरनाक छल-कपट से भरा एक एजेंडा आरएसएस के बौद्धिक संचालकों द्वारा सार्वजानिक किया जा चुका है। इस मुहिम के सर्वसर्वा हैं वरिष्ठ प्रचारक, दीनानाथ बत्रा। वे पहले ही आरएसएस/भाजपा प्रशासित राज्यों में स्कूल शिक्षा प्रणाली जिस का उद्देश्य जिज्ञासु, और उदार शागिर्द जो यथास्तिथि को चुनौती दे सकें पैदा कराना था को ख़तम करने का बीड़ा उठाये हुए हैं। हाल ही में उन्होंने भारतीय शिक्षा की 'शुद्धि' के लिए एक नई 'हिट-लिस्ट' जारी की है। फिलहाल यह 'शुद्धि' केवल स्कूली शिक्षा पाठ्यकर्म में की जानी है लेकिन इस सफाई अभियान से उच्च शिक्षा बच पाएगी, यह संभव नहीं है ।

बत्रा ने आरएसएस से जुडी संस्था 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' की ओर से 5 पन्नों की एक सूची जारी की है, जिसमें उन आपत्तिजनक मुद्दों को गिनवाया गया है जिन्हें शिक्षा अध्ध्य्यन से तुरंत बहार करना है। जिन मुद्दों को हटाया जाना है वे हैरान ही नहीं करते बल्कि अत्यधिक हास्यजनक भी हैं जैसे कि हम निम्नलिखित में पायेंगे। 

पहली मांग है कि पाठ्यक्रमों से उन सभी सन्दर्भों को हटाया जाये जो पुरुष दुराग्रह और लिंग भेदभाव को चुनौती देते हैं। मिसाल के तौर पर प्रसिद्ध हिंदी कवि रामधारी दिनकर की एक कविता को हटाए जाने की मांग की गयी है क्यों कि यह शागिर्दों को ग़लत रास्ते पर ले जाती है और उनके चरित्र को भरष्ट करती है। महान कन्नड़ भक्ति कवयित्री अक्का महादेवी का एक लेख इस लिए रद्दी की टोकरी में दाल दिया जाये क्योंकि उसमें एक महिला पात्र उत्पीड़न के विरोध में स्वयं को निर्वस्त्र कर देती है। हिंदुत्व नैतिकता के कोतवाल बत्रा के अनुसार इस प्रकार का विवरण औरत की आज़ादी हिन्दू संस्कृति पर हमला है।  

बत्रा ने यह भी मांग की है कि 19वीं शताब्दी की महान महिला समाजिक कार्यकर्ता ताराबाई शिंदे के पुरुष प्रधान विरोधी विचारों और जातिवाद के खिलाफ सन्दर्भों को निकल बाहर किया जाये।  याद रहे ताराबाई शिंदे भारत की पहली नारीवादी मानी जाती हैं।  बत्रा की यह भी मांग है कि वर्ण ववस्था से सम्बंधित सभी हवालों को सिलेबस से ख़ारिज किया जाये।

आरएसएस की तरफ से यह भी मांग की गयी है कि पाठ्यक्रमों से अल्प-संख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा के तमाम सन्दर्भ निकल दिए जाएँ। भूतपूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख जनसंहार के लिए जो माफ़ी माँगी थी उसे पुस्तकों से हटाया जाये।

याद रहे कि मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद में बोलते हुए इस जनसंहार पर खेद प्रगट किया था और देश से माफ़ी मांगी थी।

इसी तरह 2002 में गुजरात में 2000 से ज़्यादा मारे गए मुसलमानों के बारे में हर सन्दर्भ को हटा दिया जाये। बत्रा ने यह भी मांग की है कि सम्प्रदायक दंगों के बारे में कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस से बहुमत का अपमान होता है और अल्प-सांख्यकों का तुष्टिकरण। इस प्रकार अल्प-संख्यकों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा की घटनाओं पर हर तरह की चर्चा को रोकना है।

बत्रा की एक और मांग यह है कि रबिन्द्रनाथ टैगोर के अंध-राष्ट्रवाद के खिलाफ जो विचार हैं उन्हें निकल बाहर किया जाये।

टैगोर ने देश के राष्ट्र-गान की रचना की और भारत ही नहीं विश्व के महानतम कवि, नाटककार, लेखक और विचारक माने जाते हैं। उन्हों ने जातिवाद, तानाशाही और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बेमिसाल लेखन किया है। 

बत्रा द्वारा अमीर ख़ुसरो, जिन्हों ने आधुनिक हिंदी की बुनियाद रखी, इस्लाम और हिन्दू धर्मों के बीच एक मज़बूत पुल का काम किया, क़व्वाली, तबले का आविष्कार किया उन्हें हिन्दू धर्म विरोधी बताकर पढ़ाई-लिखाई से बाहर करने की मांग भी की गयी है। ख़ुसरो संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, पंजाबी और ब्रज भाषाओँ के माहिर थे।

बत्रा के शुद्धि-पत्र में ग़ालिब के कलाम को ख़ारिज करने की भी मांग की गयी है। ग़ालिब की जिन पंक्तियों को खासकर हटाने की मांग की गयी है वे हैं: 'हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन/दिल को खुश रखने को ग़ालिब यह ख्याल अच्छा है' । 

याद रहे यह वही ग़ालिब हैं जिन्हों ने जीवन भर धार्मिक कट्टरता और पुरातनपंथी विचारों के खिलाफ सशक्त शायरी की और इस तरह के तत्वों से हमेशा लोहा लिया। 



पंजाबी के महानतम युवा कवि, अवतर सिंह 'पाश' जिन्हों ने पंजाब में हिन्दू सिखों को लड़वा रही साम्प्रदायिक ताक़तों के खिलाफ मोर्चा लिया था और इस जंग में शहीद हुए थे, उनकी कविताओं को भी हटाने की मांग की मांग की गयी है।  

बत्रा ने उन अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी शब्दों की भी एक सूची जरी की है जिन्हें देश निकला दिया जाना है। वाईस-चांसलर, वर्कर, पोशाक, ताक़त, इलाक़ा, अक्सर, ईमान, मेहमान-नवाज़ी और सरेआम जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर राज्य ने प्रतिबन्ध लगाना है। 

भारत की आज़ादी को लगभग 70 साल बीतने के बाद अब ऐसे तत्व जवान हो गए हैं जो इस देश की साझी विरासत को मलियामेट करने पर उतारू हैं, देखना यह है कि यह विद्धवंसकारी सफल होते हैं या समृद्ध साझी संस्कृति वाली भारतीय सभ्यता।

 

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