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शरदजी को जेपी मूवमेंट के नास्टैल्जिया से बाहर आकर राहुल के नैरेटिव को अपनाना होगा

 

अभिषेक श्रीवास्तव

शरद यादव के साझी विरासत बचाओ सम्मेलन पर आज बहुत सी प्रतिक्रियाएं सुनने को मिली हैं। मौके पर भी और पीठ पीछे भी। मेरी समझदारी ये कहती है कि आज के आयोजन को एक लंबी प्रक्रिया का आग़ाज़ माना जाना चाहिए। बेशक़, यह लंबी प्रक्रिया साल भर से लंबी नहीं खिंचनी चाहिए क्योंकि मोदीजी 2018 के अंत में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ ही लोकसभा चुनाव करवाने के मूड में हैं।

शक़ है कि "मोदी हटाओ देश बचाओ" का नारा कुछ कर पाएगा

जैसी भीड़ आज दिल्ली में जुटी, वह अप्रत्याशित है। इसे लोगों में बेचैनी का अक्स माना जाए, लेकिन एक ग़फ़लत से बच सकें तो बेहतर होगा। शरदजी को चाहने और मानने वाले लाखों होंगे, लेकिन उन्हें राजनीतिक ताकत में तब्दील करने का नारा किसके पास है? शरदजी के पास तो नहीं है, इतना आज साफ हो गया। युवाओं की भारी उपस्थिति अगर उम्मीद जगाती है तो सवाल भी उठाती है कि कौन सा नारा इन्हें बाँध कर रख पाएगा। मुझे शक़ है कि "मोदी हटाओ देश बचाओ" का नारा कुछ कर पाएगा।

सबसे शार्प दिखे राहुल गांधी

जितने भी लोगों ने आज मंच से अपनी बात रखी, उनमें राहुल गांधी सबसे शार्प दिखे। लालू प्रसाद यादव के अलावा वे अकेले आरएसएस का खूँटा पकड़े बैठे हैं। ये सही राजनीति है। मेरा मानना है कि शरदजी को जेपी मूवमेंट के नास्टैल्जिया से बाहर आकर राहुल के नैरेटिव को अपनाना होगा। बदले में राहुल अगर खुद को 2019 में खर्च होने से बचा सकें, तो उन्हें आगे बढ़कर खुद शरदजी के नाम का प्रस्ताव UPA-3 के प्रधानमंत्री प्रत्याशी के लिए दे देना चाहिए।

साल भर के लिए शरदजी बाबावाद को थोड़ा किनारे रख दें

शरदजी ने बड़ी जिम्मेदारी ले ली है। यदि उनके भीतर जेपी का आधुनिक संस्करण बनने की चूल न मची हो, तो लोग उनके पीछे ज़रूर आएंगे। शर्त ये है कि बस साल भर के लिए शरदजी बाबावाद को थोड़ा किनारे रख दें और राहुल गांधी के नैरेटिव को आसान तरीके से जनता के बीच ले जाएं। वे इसमें सक्षम हैं।

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