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‘न्याय, सुरक्षा आजादी, मांगे आधी आबादी‘ से देश की शान्ति को कौन सा खतरा था सरकार जी

शेष नारायण सिंह

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जो सन्देश आया है वह बहुत ही डरावना है। वहां की घटनाओं से पुरुष आधिपत्य की मानसिकता के जो संकेत आये हैं उनकी परतों की व्याख्या करने से जो तस्वीर उभरती है वह बहुत ही खतरनाक है। काशी का सन्देश (Kashi message) यह है कि अगर आपने देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में अपनी बेटी को पढ़ने के लिए भेजा है तो आपको हमेशा चिंतित रहना चाहिए।

यह भी संदेश आया है कि अपनी कमियां छुपाने के लिए बीएचयू का कुलपति किसी अन्य बहुत ही आदरणीय विश्वविद्यालय को अपमानित करने की कोशिश कर सकता है। जब कुलपति, जीसी त्रिपाठी ने कहा कि जेएनयू कल्चर की एक मजिस्ट्रेट ने उनको बदनाम करने की कोशिश की तो वे अपनी हीनभावना पर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे। उनको मालूम है कि जेएनयू में माता-पिता अपनी बेटी को वहां दाखिल करवा कर जब लौटते हैं तो वे जानते हैं कि वे अपनी बेटी को देश की एक बेहतरीन शिक्षा संस्था में दाखिल करवा कर आये हैं।

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बीएचयू में मौजूदा संकट की शुरुआत एक घटना से हुई। किसी मोटरसाइकिल सवार लफंगे ने एक लड़की के साथ अभद्र आचरण किया। वह लड़की अपनी शिकायत लेकर विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर के पास गई।

चीफ प्राक्टर और छात्रा के बीच बातचीत का जो विवरण सामने आया है वह हैरतंगेज है, सभ्य समाज को परेशान कर देने वाला है। छात्रा ने मीडिया को बताया है कि उस दुष्टात्मा ने शिकायत सुनने के बाद उस लड़की से कहा कि अब आप अपने हास्टल जायेंगी कि रेप होने तक यहीं इंतजार करेंगीं। इसके बाद वह लड़की वापस आई, अपनी सहेलियों से किया और कोई रास्ता न देख कर लड़की ने अपना सर मुंडवा लिया।

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मीडिया को उस लड़की ने बताया कि उसने ऐसा इसलिए किया जिससे कि वह बदसूरत लग सके जिससे लफंगों का ध्यान उसकी तरफ न पड़े। बाद में लड़कियों ने चीफ प्राक्टर के नाम एक अर्जी लिखी और उनके पास कई लड़कियां गईं। इस बार भी अपनी दम्भी मानसिकता का परिचय देते हुए उन अधिकारी ने लड़कियों को अपमानित किया और भगा दिया। यहां यह समझ लेना है कि प्राक्टर कोई सुरक्षा बलों से अवकाशप्राप्त अधिकारी नहीं होता, वह वास्तव में एक सीनियर शिक्षक होता है जो सुरक्षातंत्र के लोगों से संपर्क में रहता है और अपने बच्चों के कल्याण के लिए लगातार प्रयास करता रहता है। यह लड़की जिसको उसने रेप की धमकी दी थी वह भी उसकी बच्ची ही मानी जाती है। लड़कियों ने जो चि_ी लिखी वह बहुत ही साधारण मांग वाली थी।

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लड़कियों की केवल यह गुहार लगाई गई थी कि उनको कैम्पस में आने वाले पुरुषों की छेड़छाड़ से बचाएं। कोई भी सभ्य पुरुष इसके लिए उन लड़कियों को आश्वस्त कर देता लेकिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर साहब ने उनकी को नजरंदाज कर दिया। लड़कियां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से मिलने गईं लेकिन उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। लड़कियां धरने पर बैठ गईं फिर भी वीसी साहब मिलने से इंकार करते रहे। उसके बाद जो हुआ उसको पूरी दुनिया जानती है।

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इस सारे प्रकरण में मुख्य धारा के मीडिया के एक वर्ग की प्रवृत्ति बहुत ही अजीब रही। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में है। वहां कई राष्ट्रीय अखबारों के संस्करण निकलते हैं अधिकतर ने सही रिपोर्टिंग नहीं की। वैकल्पिक मीडिया से खबरें बाहर आईं और तब बीएचयू के अधिकारियों को लगा कि मीडिया को मैनेज करने के बावजूद अत्याचार की खबर को दबाया नहीं जा सका।

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एक सच्चाई और भी है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लड़कियों को वह सम्मान कभी नहीं मिला जो देश के अन्य विश्वविद्यालयों में लड़कियों को मिलता है लेकिन एक बात देखी गई थी कि अपनी उग्र पुरुषसत्तावादी मानसिकता के बावजूद बीएचयू में पुरुष छात्र लड़कियों की रक्षा में खड़े होते रहे हैं। पुराने छात्र नेता, चंचल ने यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़कियों की मर्यादा और खुदमुख्तारी को मुद्दा बनाकर लड़ा था और जीते थे। इस बार ऐसा नहीं हुआ। बहुत बाद में आम छात्र नेताओं ने मामले में दखल देना शुरू किया। जब पता लग गया कि केंद्र सरकार की सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी कुलपति को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है तब कुलपति की पार्टी से सम्बद्ध छात्र उसके बचाव में आ गए और अन्य छात्र उसके विरोध में मोर्चा सम्भालने में जुट गए। हालांकि मुख्यधारा के अखबार बहुत बाद तक अपनी मुसीबतों के लिए लड़ रही छात्राओं को उपद्रवी ही बताते रहे लेकिन उनकी बात को कोई भी मान नहीं रहा था।

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बीएचयू हमले के बाद वाराणसी के कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने जांच में बवाल के लिए बीएचयू प्रशासन को दोषी ठहराया है। इस जांच के सामने आने के बाद बीएचयू प्रशासन सक्रिय हुआ। लेकिन उसके पहले तक जो हो चुका था, वह किसी भी विश्वविद्यालय के लिए कलंक की बात है। पुलिस की पाशविकता की जो तस्वीर सामने आई है वह बहुत ही हृदय विदारक है। अपनी पुरुषसत्तावादी मानसिकता के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीएचयू कैम्पस में बहुत ही गैरजिम्मेदार काम किया। एक तो महिला महाविद्यालय में देर रात हमला करने जा रही फोर्स में महिला सिपाहियों को शामिल नहीं किया।

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पुरुष सिपाहियों की फोर्स ने लगभग आधी रात को लड़कियों के छात्रालय पर हमला किया और महिला प्रोफेसरों को भी नहीं छोड़ा। बीएचयू की एक सहायक प्रोफेसर ने बताया कि, 'जब पुलिस लाठियां चला रही थीं तो एक छात्रा जमीन पर गिर गई। मैं उस लड़की को बचाने गई तो मैं भी पुलिस के हमले का शिकार हो गई। उस समय रात के साढ़े ग्यारह बजे थे।'

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पूरे मामले में बीएचयू के कुलपति का रुख सबसे गैरजाम्मेदार था। घटना के बाद वे दिल्ली आये और एक टेलिविजन ने उनका इंटरव्यू किया। उस में उनका जो स्वरूप देखा उससे साफ समझ में आ गया कि कैम्पस में उन्होंने जो कुछ किया वह तो बहुत कम था। वे अगर अपनी पर उतर आते तो और भी बहुत कुछ कर सकते थे। कुलपति को देखकर लगा ही नहीं कि यह व्यक्ति उसी विश्वविद्यालय का कुलपति है जहां कभी कुलपति के रूप में बहुत बड़े विद्वान विराजते थे। कुलपति ने अपनी ही लड़कियों को पिटवाने के लिए कैम्पस में पुलिस बुला लिया जबकि भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान इसी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस राधाकृष्णन ने बीएचयू के कैम्पस में अंग्रेजों की पुलिस को दाखिल होने की अनुमति नहीं दी थी।

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बीएचयू की परम्पराओं का पतन 1967 में शुरू हुआ। एसी जोशी के कार्यकाल में ही बीएचयू का कुलपति अफसर माना जाने लगा, वरना उसके पहले वह परिवार का सही अर्थों में मुखिया होता था। जोशी जी के कार्यकाल में ही बीएचयू कैम्पस में पुलिस ने छात्रावासों के अन्दर घुसकर लड़कों की खूब पिटाई की थी। उसी के बाद छात्र आन्दोलन से निपटने के लिए विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने की परम्परा शुरू हुई। और वहां से चलकर आज के हालात तक बात पहुंची है।

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बताते हैं कि इसी नवम्बर में मौजूदा कुलपति जीसी त्रिपाठी का कार्यकाल पूरा हो रहा है। वे एक टर्म और चाहते हैं। दिल्ली दरबार में फेरी भी लगा रहे हैं। आरएसएस का समर्थन उनको पहले से ही है। लेकिन लगता है कि इस काण्ड के बाद उनकी पकड़ आरएसएस पर कमजोर पड़ेगी। एक जानकार ने बताया कि जब वे अपनी मंशा लेकर शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के सामने पेश हुए थे तो उन्होंने साफ बता दिया था कि आप अपना कार्यकाल सम्मानपूर्वक बिताकर चले जाइए अब वहां किसी विद्वान व्यक्ति को कुलपति बनाया जाएगा। हालांकि अब यह लगने लगा है कि कुलपति जी सी त्रिपाठी को अपना कार्यकाल पूरा करना भी भारी पड़ेगा।

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना के बाद हवा में बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं। अगर उच्च शिक्षा के केन्द्रों में महिलाओं की इज्जत की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती तो हम बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा क्यों लगाते हैं। बीएचयू के आन्दोलन में लड़कियों का नारा था, 'न्याय, सुरक्षा आजादी, मांगे आधी आबादी।‘ इसमें ऐसी कौन सी बात थी जिससे देश की शान्ति को खतरा था। या जैसा कि बाद में टेलिविजन पर कुलपति त्रिपाठी ने कहा कि प्रधानमंत्री की सभा में अड़ंगा लगाने के लिए यह आन्दोलन किया गया था। सच्ची बात यह है कि अगर कुलपति ने सही समय पर इस समस्या का हल निकाल दिया होता तो उनके फैसले से प्रधानमंत्री की वाहवाही ही होती।

About शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं।

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