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दक्षिण एशिया में बढ़ती असहिष्णुता

राम पुनियानी

गत 18 अप्रैल, 2017 को राजस्थान में पहलू खान को एक भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इस घटना की चर्चा मीडिया के एक हिस्से में हुई। इसी तरह की घटनाएं आसपास के देशों और हमारे देश के दूसरे राज्यों में भी होती रही हैं। 13 अप्रैल, 2017 को पाकिस्तान में मशाल खान नामक एक विद्यार्थी को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। उस पर ईशनिंदा का आरोप था।

इसके पहले, तमिलनाडु में मार्च 2017 में फारूख नाम के एक व्यक्ति को चार लोगों ने घेर कर मार डाला। उसका अपराध यह था कि उसने सोशल मीडिया पर नास्तिकता के समर्थन में कुछ पोस्ट लिखे थे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि दक्षिण एशियाई देशों, विशेषकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत, में असहिष्णुता का स्तर बहुत अधिक है। तीनों ही देशों में असहिष्णुता के कारण हिंसा होती रही है।

पाकिस्तान में सन 2011 में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या कर दी गई थी। बांग्लादेश में सन 2015 में कई ब्लॉगरों को इसलिए मारा डाला गया क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में बातें कहीं थीं।

पाकिस्तान में ज़िया-उल-हक के शासन में आने के बाद से वहां उदारवादी प्रजातांत्रिक मूल्यों का तेज़ी से क्षरण हुआ। ज़िया-उल-हक, मुल्लाओं के सहारे देश का शासन चलाते थे। पाकिस्तान में ईशनिंदा संबंधी कानूनों के कारण वहां के नागरिकों को प्रताड़ित किया जाता रहा है। सलमान तासीर इसी कानून शिकार बने।

बांग्लादेश में प्रगतिशील, उदारवादी विचारों में आस्था रखने वालों और कट्टरवादियों के बीच संघर्ष लंबे समय से जारी है। ब्लॉगरों की हत्या इसी का नतीजा थी।

भारत में स्थितियां कहीं अधिक जटिल हैं। पिछली सरकारों के शासनकाल में भी कलाकारों को निशाना बनाया गया, किताबों को प्रतिबंधित किया गया, चित्रकला दीर्घाओं में तोड़फोड़ की गई, फिल्मों पर हमले हुए और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को ज़बरन रोका गया।

भारत में असहिष्णुता-जनित घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। तस्लीमा नसरीन पर हमला हुआ, गुलाम अली का कार्यक्रम नहीं होने दिया गया, सलमान रूश्दी की पुस्तक ‘सेटेनिक वर्सेस’ पर प्रतिबंध लगाया गया, एमएफ हुसैन के चित्रों की प्रदर्शनी को रोका गया और आमिर खान की फिल्मों का बहिष्कार करने की अपीलें हुईं।

पिछले तीन दशकों, और विशेषकर पिछले तीन वर्षों, में हिन्दुत्व की राजनीति के परवान चढ़ने के साथ देश में उदारवादियों के लिए जीना और अपनी बात कहना मुश्किल होता जा रहा है। अक्सर भारत की स्थिति की हमारे पड़ोसी देशों की स्थिति से तुलना कर, यहां होने वाली घटनाओं को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है।

यह सही है कि भारत में हमारे पड़ोसी मुल्कों की तुलना में अभिव्यक्ति की आज़ादी कहीं अधिक रही है। क्या इसका कारण यह है कि यहां हिन्दू बहुसंख्यक हैं और वे सहिष्णु हैं? यह कहना सही नहीं होगा।

भारत में यदि अभिव्यक्ति की आज़ादी को उतना सीमित नहीं किया गया जितना कि अन्य देशों में, तो इसका कारण है हमारे स्वाधीनता संग्राम की विरासत और हमारे संवैधानिक मूल्य। सांप्रदायिक ताकतें इतनी शक्तिशाली नहीं थीं कि वे इस विरासत और इन मूल्यों को नष्ट कर सकें। इसी कारण, हमारे देश में सहिष्णुता का स्तर अपेक्षाकृत ऊँचा था। इसके विपरीत, पाकिस्तान की तो नींव ही संकीर्ण सांप्रदायिक राष्ट्रवाद पर रखी गई।

सिद्धांततः तो पाकिस्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश है परंतु व्यवहार में वहां की राजनीति और शासन व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई स्थान नहीं है। पाकिस्तान में उदारवादी मूल्यों का क्षरण मोहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु के बाद से ही शुरू हो गया था। बांग्लादेश, वहां के निवासियों के पाकिस्तानी सेना द्वारा क्रूर दमन के नतीजे में अस्तित्व में आया। बांग्लादेश ने भी धर्मनिरपेक्षता को अपने संवैधानिक मूल्यों में शामिल किया परंतु वहां की मुस्लिम सांप्रदायिक ताकतें इतनी शक्तिशाली हैं कि उन्होंने देश को सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष नहीं बनने दिया।

भारत में पहचान की राजनीति और भावनात्मक मुद्दों पर जुनून पैदा करने के कारण असहिष्णुता में बढ़ोत्तरी हुई।

सन 2014 में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी। हमलावरों को एक ओर राज्य का संरक्षण प्राप्त था तो दूसरी ओर उनकी पार्टी की विचारधारा उन्हें आक्रामक होने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी। तथाकथित हाशिए पर पड़े आक्रामक और कट्टरवादी तत्व केन्द्र में आ गए। उन्हें अब कानून और प्रशासन का डर न था। इसके कारण ही चर्चों पर हमले हुए और नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी जैसे तार्किकतावादियों की हत्या हुई। सांप्रदायिक विचारधारा को खुलकर अपना खेल खेलने का अवसर मिल गया।

राममंदिर आंदोलन ने देश में असहिष्णुता का वातावरण निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गोमाता के मुद्दे की भी इसमें कम भूमिका नहीं थी। नफरत की तिजारत करने वाले लोग गोरक्षकों का भेष धरकर सड़कों पर तांडव करने लगे। पहले मोहम्मद अखलाक की जान गई, फिर पहलू खान की और उसके बाद असम में दो लोगों की जान ले ली गई। यह सब इस बहाने से किया गया कि वे लोग या तो गोहत्या कर रहे थे या गायों की तस्करी में संलग्न थे। सच यह है कि यह सब धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध बना दिए गए घृणा के वातावरण का नतीजा था।

भारत की तुलना पाकिस्तान या बांग्लादेश से करना बेमानी है क्योंकि भारत की नींव प्रजातांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतों पर रखी गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे देश में भी कुछ कमियां और कमज़ोरियां थीं (और हैं) जिनके कारण अलग-अलग समय पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को रौंदने के प्रयास हुए। इसके पीछे मुख्यतः वे राजनीतिक शक्तियां थीं जो अवसरवादी तो थीं हीं वरन उन्हें यह एहसास भी था कि अगर उन्होंने भावनाएं नहीं भड़काईं और लोगों में जुनून पैदा नहीं किया तो वे सत्ता में नहीं आ सकतीं। बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस के बाद पाकिस्तानी कवियत्री फहमिदा रियाज़ ने एक कविता लिखी, जिसका शीर्षक था ‘‘तुम बिल्कुल हम जैसे निकले’’ https://urduwallahs.wordpress.com/2015/03/27/tum-bilkul-hum-jaise-nikle/ उन्होंने इस कविता में इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि पाकिस्तान में तो सांप्रदायिकता पहले से ही व्याप्त थी, अब भारत भी पाकिस्तान जैसा बनता जा रहा है।

आज भारत में गोरक्षक और धर्म के कई अन्य स्वनियुक्त ठेकेदार सड़कों पर दादागिरी और गुंदागर्दी कर रहे हैं। हर मामले में अपराध के बाद कोई मंत्री या अधिकारी पीड़ितों को ही गलत बताता है और फिर पीड़ितों के खिलाफ मुकदमा कायम कर दिया जाता है। अगर किसी दोषी के विरूद्ध प्रकरण दर्ज होता भी है तो उस पर मामूली धाराएं लगाई जाती हैं। कई मामलों में आरोपियों के नाम तक एफआईआर में दर्ज नहीं किए जाते और यह कह दिया जाता है कि अपराध एक अज्ञात भीड़ ने किया।

जो लोग भारत के घटनाक्रम की तुलना हमारे पड़ोसी देशों के हालात से कर उसे उचित ठहराने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि दो गलत मिलकर एक सही नहीं होते।

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

 

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