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sulabha deshpande

‘शान्तता! सुलभा देशपांडे दिवंगत!

ज्येष्ठ अभिनेत्री सुलभा देशपांडे यांचं निधन Peace! Sulabha Deshpande died.

‘शान्तता! सुलभा देशपांडे दिवंगत! मराठी रंगमंच (Marathi Theater) की चर्चा अगर विजय तेंदुलकर के बिना असंभव है और वहीं से समांतर सिनेमा (Parallel cinema) के डा. श्रीराम लागू, अमरीश पुरी और नाना पाटेकर जैसे असंख्य कलाकार भारतीय सिनेमा के चमकते दमकते सितारे रहे हैं, तो हमारी सुलभा देशपांडे न सिर्फ मराठी बल्कि भारतीय नारी का आम चेहरा है, जिसकी चमक किसी स्मिता पाटिल या शबाना आजमी से कम नहीं है।

मराठी मीडिया की खबर हैः

मुंबई : ज्येष्ठ अभिनेत्री सुलभा देशपांडे यांचं आज निधन झालं. वृद्धापकाळाने सुलभा देशपांडे यांनी राहत्या घरी त्यांनी अखेरचा श्वास घेतला. त्या 80 वर्षांच्या होत्या.

मराठीसह हिंदी सिनेमांमध्ये आपल्या अभिनयाची छाप उमटवणाऱ्या सुलभा देशपांडे यांच्या निधनामुळे अवघ्या चित्रपटसृष्टीवर शोककळा पसरली आहे.

सुलभा देशपांडे यांच्या अनेक भूमिकांनी प्रेक्षकांच्या मनावर छाप पाडली. शांतता! कोर्ट चालू आहे, चौकट राजा या सिनेमातील त्यांच्या भूमिका विशेष गाजल्या. मागील एक-दोन वर्षात आलेल्या  विहीर, हापूस या सिनेमातही त्यांनी काम केलं होतं.

मराठीच नाही तर आदमी खिलौना है, गुलाम-ए-मुस्तफा, विरासत या हिंदी चित्रपटातील त्यांच्या भूमिका लक्षवेधी होत्या.

Kanan Bala : First superstar of indian film

भारतीय फिल्म की पहली सुपर स्टार कानन बाला का बचपन सिरे से गुमशुदा है और मुकम्मल अभिनेत्री बतौर क्या अभिनय और क्या गायन वे भारतीय फिल्मों के संगीतबद्ध लोक संस्कृति से गूंथे मथे विकास में शामिल गाती, नाचती अभिनेत्रियों  में हैं, जिन्होंने परदे पर अपनी फिल्म मुक्ति में पहली दफा रवींद्र का गीत लाइव गाया और खुद कविगुरु उनके प्रशंसक थे तो वे शांति निकेतन से भी संबद्ध रही हैं।

घर-घर बर्तन मांजने वाली, निषिद्ध बस्ती से संगीत और अभिनय यात्रा शुरु करने वाली काननबाला बुनियादी तौर पर एक भारतीय नारी है, जिसकी कोई जाति, वंश इत्यादि नहीं है।

अब खबर आ रही है कि प्रज्ञा की सुलू मौसी और बेहतरीन अदाकारा सुलभा देशपांडे नहीं रहीं, तो भारतीय सिनेमा से तेजी से गायब होती जा रही श्री चारसौ बीस की आम औरतों के साथ-साथ लोकगीतों के देसी परिदृश्य में असल भारतीय स्त्री का चेहरा सिलसिलेवार ढंग से गायब हो रहा है और समूचा लोक भव्य सेट और रंगों के बहार में गायब है, क्योंकि बाजार में श्वेत श्याम पृष्ठभूमि गैरजरूरी है।

इसी श्वेत श्याम लोक भावभूमि में आम औरत का वह गायब जुझारू चेहरा काफी हद तक शबाना और स्मिता का अभिनय का चरमोत्कर्ष रहा  है। लेकिन वह चेहरा किसी सुलभा देशपांडे के बिना अधूरा है।

आम भारतीय औरत का जो चेहरा भारतीय रंगमंच के साथ-साथ भारतीय सिनेमा खोजते रहे हैं, वह चेहरा कानन बाला को हो न हो, सुलभा ताई का ही चेहरा है, जिसे हम स्मिता और शबाना जैसी सितारों की चमक-दमक में शायद सही तरीक से कभी जान ही नहीं सके हैं।

How incomplete is the face of the Indian parallel cinema movement without Sulabha Deshpande

भारतीय समांतर सिनेमा आंदोलन का चेहरा सुलभा देशपांडे के बिना कितना अधूरा है तो उसे इस तरह समझें कि आप हम उन्हें बाज़ार, भूमिका जैसी भूमिकाओं के लिए जानते हैं लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि मराठी में समानांतर रंगमंच को बढ़ाने वाले हरावल दस्ते की वे सदस्य थीं।

यह एक पूरा आन्दोलन था जिसने अनेक पीढ़ियों को तैयार किया।

प्रज्ञा के कहने पर उनकी सबसे अविस्मरणीय भूमिका – ‘शान्तता ! कोर्ट चालू आहे’ में मिस बेणारे.

सुलभा देशपांडे की जीवनी : Biography of sulabha deshpande in hindi

बहरहाल मुंबई से खबर यह है कि कैंसर से पीड़ित प्रसिद्ध अभिनेत्री सुलभा देशपांडे का आज निधन हो गया।

वे 80 साल की थीं।

सुलभा देशपांडे मराठी के साथ ही हिंदी फिल्मों में भी काम किया था और आज उनके निधन से फिल्म उद्योग में शोक की लहर फैल गयी।

गौरतलब है कि सुलभा देशपांडे को छोटे परदे पर अंतिम बार ’अस्मिता’ सीरियल में देखा गया था।

सुलभा देशपांडे का जन्म 1937 में मुंबई में हुआ था और अपने कैरियर की शुरूआत दबीलदास हाईस्कूल में एक शिक्षिका के रूप में शुरू किया था।

शिक्षिका का काम करते हुए सुलभा देशपांडे ने विजय तेंदुलकर के लिए बच्चों का नाटक लिखा था और उसी दरम्यान उनकी मुलाकात विजय मेहता, अरविंद देशपांडे, श्रीराम लागू, विजय तेंदुलकर जैसे कलाकारों से हुयी।

उन्होंने 1960 के दशक में श्री विजय तेंदुलकर के ’शांतता कोर्ट चालू आहे’ नाटक में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

महाराष्ट्र के लोगों के लिए वे इतनी खास हैं कि वे यह कहते नहीं हिचकते कि सुलभा देशपांडे ने मराठी सिनेमा, टीवी और नाटक के अलावा हिंदी फिल्मों में भी काम किया। जैसे कि हिंदी फिल्मों में उनका काम मराठी भाव भूमि से तड़ीपार है। इसी तरह बाकी देश के लोगों को भी मालूम नहीं है कि वे किस हद तक अपनी जमीन की मराठा मानुष रही हैं कि उनके लिए मराठी मानुष के दिलों दिमागों में उथल पुथल मची हुई है और बाकी भारत के लिए यह किसी फिल्मी कलाकार की नॉर्मल मौत से ज्यादा बड़ी कोई घटना नहीं है। यही वर्चस्ववाद का वास्तव है जहां बहुलता और विविधता के बावजूद देश को देश बनाने वाली लोक विरासत की जड़ों से हमारे कटे होने का बेकल इंद्रिय नागरिकत्व है संवेदनाहीन।

गौरतलब है कि सुलभा ताई ने अपने पति अरविंद देशपांडे के साथ मिल कर आविष्कार संस्था की स्थापना की। यह युगलबंदी भारतीय रंगमंच के इतिहास में अभूतपूर्व है।

सुलभा ताई ने अरविंद देसाई की अजीब दास्तां, भूमिका, चौकट राजा, जैत रे जैत और आदमी खिलौना है जैसी फिल्मों में काम किया था।

अरसा हो गया अरविंद देसाई को गये और अब उनके पीछे पीछे सुलभा ताई भी चल दीं।

‘शान्तता! सुलभा देशपांडे दिवंगत!

पलाश विश्वास

About Palash Biswas

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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