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आखिर, सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम रखवाला यूं ही नहीं कहा जाता

आखिर, सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम रखवाला यूं ही नहीं कहा जाता

असहमति और जनतंत्र बनाम निर्वाचित तानाशाही

0 राजेंद्र शर्मा

सुप्रीम कोर्ट कुल मिलाकर, भारतीय संविधान के अंतिम रक्षक की अपनी भूमिका को गंभीरता से लेता नजर आता है। भीमा-कोरेगांव प्रकरण के सिलसिले में, जाने-माने मानवाधिकार तथा नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं तथा वामपंथी बुद्धिजीवियों के घरों पर 28 अगस्त के छापों तथा पांच लोगों की गिरफ्तारियों के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने शासन की मनमानी के खिलाफ हस्तक्षेप किया है। तात्कालिक राहत के तौर पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने अगले हफ्ते में इस मामले की अपनी पूरी सुनवाई तक, इन पांचों कार्यकर्ताओं को पुणे पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने पर रोक लगा दी है और स्थानीय पुलिस की निगरानी में उन्हें अपने-अपने घर पर ही नजरबंद रखने के लिए कहा है। लेकिन, इससे बड़ी राहत सुप्रीम कोर्ट ने अपने इसके संकेतों से दी है कि वह, असहमति की आवाजों को दबाने के लिए शासन की शक्तियों के दुरुपयोग के खिलाफ हस्तक्षेप करने के लिए तैयार है।

सविधान का रखवाला किसे कहा जाता है? | who is known as the guardian of the Indian constitution

          सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दो स्तरों पर दिया है। पहला, इन गिरफ्तारियों के खिलाफ देश के जाने-माने अकादमिकों-बुद्धिजीवियों की उस याचिका को विचार के लिए स्वीकार करने के जरिए, जिनकी मुख्य दलील यह थी कि यह वंचितों, अधिकारहीनों के पक्ष में, मौजूदा शासन से असहमति की आवाज उठाने वालों को दबाने और ऐसी आवाजों को बंद कराने की कोशिश है। यह गौरतलब है कि इन अकादमिकों-बुद्धिजीवियों की याचिका के विचार के लिए स्वीकार किए जाने के खिलाफ शासन की ओर से दी गयी इस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने नामंजूर कर दिया कि यह न्यायिक प्रक्रिया के लिए ‘अनजाने लोगों’ का हस्तक्षेप है। उल्टे अदालत इस याचिका में उठाए गए असहमति के दमन के वृहत्तर प्रश्न पर विचार करने के लिए ही तत्पर दिखाई दी। दूसरा स्तर काफी प्रत्यक्ष है। हमारा इशारा, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बैंच के एक न्यायाधीश, जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा इस सुनवाई के दौरान असहमति के स्वरों को दबाने के खिलाफ एक पुरानी और जानी-मानी चेतावनी के बड़े असरदार तरीके से दोहराए जाने की ओर है। उनके शब्द हैं: ‘असहमति, जनतंत्र का सुरक्षा वाल्व है…अगर उसके लिए इजाजत नहीं दी गयी तो प्रेशर कुकर फट जाएगा।’

असहमति या विरोध की आवाजों को सुनना पसंद नहीं करती कोई भी सत्ता

          इसे वाकई जनतंत्र के लिए बढ़ते खतरे का ही संकेत कहा जाएगा कि अदालत को, शासन को और देश के शासकों को यह चेतावनी देना जरूरी लगा है कि असहमति को कुचला गया तो, जनतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। जाहिर है कि कोई भी सत्ता, असहमति या विरोध की आवाजों को सुनना पसंद नहीं करती है। यह बात आज के शासकों की ही तरह, उनसे पहले आए शासकों के बारे में सच थी। वास्तव में 1975-77 के दौरान इंदिरा गांधी ने तो इमर्जेंसी लगाकर देश में जनतंत्र को बाकायदा स्थगित ही कर दिया था। लेकिन, बहुत से लोगों का यह मानना है और उनका यह मानना निराधार भी नहीं है कि मौजूदा शासन ने इमर्जेंसी की घोषणा के बिना ही, असहमति तथा विरोध की आवाजों के दमन के जरिए, जनतंत्र के लिए और भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। यह खतरा इसलिए बड़ा है कि यह जनतांत्रिक व्यवस्था के प्रावधानों को घोषित रूप से स्थगित करने वाली इमर्जेंसी के विपरीत, जनतांत्रिक वैधता की दुहाई का इस्तेमाल कर, जनतंत्र को ही ‘निर्वाचित तानाशाही’ में तब्दील करने की कोशिश करता है। इंदिरा गांधी की घोषित इमर्जेंसी को चुनाव का मौका आते ही जैसे पराजित कर दिया गया, जनतंत्र के आवरण में सामने आने वाली ‘निर्वाचित तानाशाही’ को उतनी आसानी से पराजित नहीं किया जा सकेगा।

कोई भी समानता नहीं निर्वाचित तानाशाही और जनतंत्र में

          याद रहे कि निर्वाचित तानाशाही और जनतंत्र में, कोई भी समानता नहीं है, सिवाय चुनावी आवरण के। निर्वाचित तानाशाही, न सिर्फ जनतंत्र को महज चुनाव की शर्त में घटा देने की कोशिश करती है बल्कि खुद चुनाव को भी जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति के पहलू से ज्यादा से ज्यादा निरर्थक बनाती है। संसदीय प्रणाली को खत्म किए बिना ही देश पर ज्यादा से ज्यादा राष्टï्रपति-प्रणालीनुमा चुनाव थोपे जाने, चुनाव के मीडिया द्वारा गढ़ी गयी छवियों के चकाचौंध भरे और बहुत महंगे मुकाबले में तब्दील किए जाने, जनता के वास्तविक हित के सवालों को पीछे खिसकाकर भावनाएं भडक़ाने वाले मुद्दे सामने किए जाने, विरोधियों को राष्टï्रविरोधी/ देशद्रोही करार देकर उनके खिलाफ उन्माद जगाने, आदि, आदि के रूप में हमें आज, चुनाव के ज्यादा से ज्यादा निरर्थक बनाए जाने के रास्ते पर ही धकेला जा रहा है।   

जनतंत्र के मूल में है, व्यक्ति नागरिक की संप्रभुता

          निर्वाचित तानाशाही की इस मुहिम के विपरीत, जनतंत्र का मूलाधार ही है, निरंकुश सत्ता का नकार। निरंकुश सत्ता, वह भले ही चुनी गयी हो, जनतंत्र की मूल धारणा का ही नकार है। जनतंत्र के मूल में है, व्यक्ति नागरिक की संप्रभुता और शासन या राज्य का उसका आदर्श रूप मूलत: उसके दायरे में आने वाले व्यक्तियों के कांट्रैक्ट का है। स्वतंत्र तथा समान नागरिक, सामाजिक व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए, अपनी संप्रभुता का एक हिस्सा, खुद अपनी खड़ी की शासन व्यवस्था को सौंपते हैं। जनतंत्र, इस सामाजिक कांट्रैक्ट के लिए स्वाभाविक व्यवस्था है। आमतौर पर संविधान, वह चाहे हमारी तरह लिखित हो या दूसरे कुछ देशों की तरह अलिखित, इस सामाजिक कांट्रैक्ट का पालन सुनिश्चित करता है। नागरिक की संप्रभुता की रक्षा करना और सत्ता की शक्तियों की सीमाएं तय करना, संविधान का सामान्य काम है। नागरिक और राज्य के बीच जो एक तनाव है, उसे संविधान और उसके अनुकूल कानूनों के जरिए, नागरिक अधिकारों, स्वाधीनताओं आदि के जरिए अनुशासित किया जाता है। कहने का तात्पर्य यह कि जनतंत्र, इसीलिए जतनंत्र है कि वह शासन पर अनेकानेक अंकुशों वाली व्यवस्था है। इसमें निरंकुशता की कोई गुंजाइश नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम रखवाला क्यों कहा जाता है | Why is the Supreme Court the final authority on the meaning of the Constitution?

          जनमत, जनतंत्र का बुनियादी अंकुश है। इसीलिए, हमारे देश के संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों तथा नागरिक स्वाधीनताओं के साथ ही साथ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इतना जोर दिया गया है, जो एक जानकार व जागरूक जनमत की अनिवार्य शर्त है। मीडिया की स्वतंत्रता इसी से प्रवाहित होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सत्ता के प्रति विरोध तथा असहमति के स्वरों के माध्यम से जनमत को प्रभावित करने जरिए ही, सत्ता पर अंकुश रख सकती है, जो कि जनतंत्र का बुनियादी तकाजा है। इसके बिना सत्ता निरंकुश हो जाएगी, चुनाव बेमानी हो जाएगा और जनतंत्र ढह जाएगा, जिसकी डा0 आंबेडकर ने किंचित भिन्न संदर्भ में बहुत पहले ही चेतावनी दे दी थी। संघ-भाजपा की मौजूदा सरकार, शासन की शक्तियों और उन्मत्त भीड़ की ताकत, दोनों का सहारा लेकर, देश को ठीक इसी रास्ते पर धकेल रही है। असहमति तथा विरोध के सभी स्वरों को कुचलने की कोशिश, इसी मुहिम का बहुत ही जरूरी हिस्सा है। वास्तव में पिछले साढ़े चार साल में यह मुहिम उग्र से उग्रतर होती गयी है क्योंकि जनता के वंचित प्रचंड बहुमत के वास्तविक हितों से, मौजूदा शासन की दूरी बढ़ती गयी है। सिर्फ कार्पोरेटों को साधने के जरिए ‘मीडिया मैनेजमेंट’ के जरिए, असहमति व विरोध की आवाजों की पहुंच सीमित करना अब काफी नहीं है। अब तो ऐसी तमाम आवाजों को डराकर या दबाकर बंद ही करना उसका लक्ष्य है। तानाशाही कोई चुनौती सहन नहीं करती है। ऐसे में यह बहुत भारी राहत की बात है कि देश की सबसे बड़ी अदालत न सिर्फ इस मुहिम के खतरे को देख पा रही है तथा उस पर सवाल उठा रही है बल्कि उस पर अंकुश लगाने का मन बनाती भी नजर आ रही है। आखिर, सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम रखवाला यूं ही नहीं कहा जाता है।      

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Supreme court is known as the guardian of the Indian constitution. explain

About राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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