डॉ. कविता अरोरा

Chand Kavita

मरजाने चाँद के सदके… मेरे कोठे दिया बारियाँ…

….कार्तिक पूर्णिमा की शाम से.. वो गंगा के तट पर है… मौजों में परछावे डालता.. सिरते दीप को निहारता.. सुर्ख़ आँखों वाला चाँद.. कच्ची नींद का जागा झींका.. माथे पर ढेर सी रोलियों का टीका……


Gaon ka kosa

.इस छोर… ढूँढता हूँ मैं … गुमशुदा ख़ुशियों का सिरा … उस छोर मेरी तलाश में है … इक गाँव सिरफिरा….

ऊँची रिहायशी बिल्डिंगों की खिड़कियों से झाँकूँ तो शहर बौना लगता है… चींटियों सी रेंगती कारें और खिलौने से मकाँ.. हवाओ के सफ़र से मैं भी मानने लगा हूँ कि क़द बढ़ गया है मेरा……


kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

मेरे शहर की/ तरक़्क़ी का यह मंज़र/ किसके हिस्से में आता है

काली रात की बस से उतरा रौशनी का छिटका, सहर की चिल्ल पौं, ट्रकों के हॉर्न की आवाज़ में भी बेसुध…बे खटका… वो रोड के डिवाइडर पर औंधे मुँह पड़ा रहेगा… और सैटेलाइट की सड़क…


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लोग कोस रहे हैं/ यह विकृत मानसिकता वालों का कृत्य है/ मगर मैं पूछती हूँ क्या केवल यही सत्य है ??

रेप के मौसम नहीं होते.. उम्र-वुम्र ठिकाने भी नहीं… मंदिर-वंदिर, मस्जिद-वस्जिद, घर-रिश्तेदारी, इराने-वीराने किसी भी कारण ..किसी बहाने .. कहीं भी हो सकता है … चस्का है, लत है हिन्दुस्तान को रेप की .. शर्त…


kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

देश नशे में है .. अफीम की खेती ही फूलेगी फलेगी…तमाशा ख़त्म हुआ ..चलो बजाओ…ताली…

महीनों से चल रहा मेला उखड़ने लगा.. खर्चे-वर्चे, हिसाब-विसाब, नफ़े-नुक़सान के कुछ क़िस्से कौन सा घाट किसके हिस्से… अब बस यही फ़ैसला होगा… बंदर बाट होगी काट छाँट होगी… बस कुछ दिन और चलेगा… पान…


kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

कैसे बेख़ौफ़ ..शनि मंगल के उतारों को पचा गया/ वो भूख का शिकार बच्चा ..मेरे टोटके भी खा गया…

वो भूख का शिकार बच्चा … डॉ. कविता अरोरा ..यही कोई आठ बरस का था वो …मगर अपनी असल उम्र से आधे का लगता था… सूकड़ी सा … भूख से ..बदन ..पनपा ही नहीं …….