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Tag Archives: लालन फकीर

हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है

पलाश विश्वास बौद्धमय भारत के अंत के बाद ब्राह्मण धर्म के मनुस्मृति विधान की बहाली के लिए हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है, इसे समझे बिना नस्ली वर्चस्व के नरसंहारी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध असंभव है। रवींद्र का दलित विमर्श औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के उसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध में है। 14 मई के बाद हमारी दुनिया सिरे से बदल …

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रवींद्र के खिलाफ भयंकर घृणा अभियान

रवींद्र का दलित विमर्श-24 पलाश विश्वास        रवींद्रनाथ टैगोर पर बचपन और किशोर वय में ही उत्तर भारत के कबीरदास और सूरदास के साहित्य का गहरा असर रहा है और संत सूफी साहित्यकारों के अनुकरण में ब्रजभाषा में उन्होंने भानुसिंह के छद्मनाम से बांग्ला लिपि में पदों की रचना की जो गीताजंलि से पहले की उनकी रचनाधर्मिता है  और ऐसा …

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क्या यह हत्यारों का देश है? गौरी लंकेश की हत्या के बाद 25 कन्नड़, द्रविड़ साहित्यकार निशाने पर!

हम किस देश के वासी हैं? रवींद्र का दलित विमर्श-20 पलाश विश्वास इंडियन एक्सप्रेस की खबर है। गौरी लंकेश की हत्या के बाद कन्नड़ के 25 साहित्यकारों को जान के खतरे के मद्देनर सुरक्षा दी जा रही है। जाहिर है कि दाभोलकर, पनासरे, कुलबर्गी, रोहित वेमुला, गौरी लंकेश के बाद वध का यह सिलसिला खत्म नहीं होने जा रहा है। …

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संत कबीर को समझें तो रवींद्र और लालन फकीर को भी समझ लेंगे

  रवींद्र का दलित विमर्श-19 लालन फकीर  का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष। ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया। । पलाश विश्वास बौद्धमय बंगाल का अवसान ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ। आठवीं सदी से लेकर ग्यारहवीं सदी तक बंगाल में बौद्ध पाल राजाओं का शासन रहा जिसका ग्यारहवीं सदी में सेन वंश के अभ्युत्थान के साथ अंत हुआ। सेन वंश के …

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गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं, इसीलिए उनका वध हुआ

  रवींद्र का दलित विमर्श-18 पलाश विश्वास                 कल हमने रवींद्र के दलित विमर्श के तहत रवींद्र के दो निबंधों जूता व्यवस्था और आचरण अत्याचार की चर्चा की थी। आचरण अत्याचार में जाति व्यवस्था की अस्पृश्यता पर प्रहार करते हुए रवींद्र ने लिखा है कि गाय मारने पर प्रायश्चित्त का विधान है लेकिन मनुष्य को मारने पर सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती …

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सभ्यता का संकट : फर्जी तानाशाह बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन मनुस्मृति राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग है

  रवींद्र का दलित विमर्श-15 पलाश विश्वास बंगाल के नबाव के दरबारी दो पूर्वज गोमांस की गंध सूंघने का आरोप में मुसलमान बना दिये गये थे तो रवींद्र के पूर्वज अछूत पीराली ब्राह्मण बन गये थे। नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले सामाजिक बहिष्कार की वजह से अपने बचपन की अस्पृश्यता यंत्रणा पर उन्होंने कोई दलित आत्मकथा नहीं लिखी लेकिन उनकी …

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हिंदुत्व के एजंडे के लिए गांधी की तरह रवींद्र का वध भी जरूरी है

Rabindra Impact ও উচ্চকিত রাজনীতি ও প্রযুক্তির তান্ডবে লোকসংস্কৃতির অবক্ষয়! पलाश विश्वास जिस रवींद्र नाथ को मिटाने का एजंडा मुक्तबाजारी कारपोरेट हिंदुत्व का एजंडा है, उन्हीं रवींद्रनाथ ने कभी कहा हैः मनुष्य के इतिहास की मुख्य समस्या क्या है? जहां कोई अंधत्व, मूढ़त्व मनुष्य और मनुष्य में विच्छेद घटित कर देता है। मानव समाज का स्रवप्रधानतत्व मनुष्यों की एकता है। …

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आस्था की सांस्कृतिक जड़ें खत्म करके हम अपराध कर्म में तब्दील कर रहे हैं धर्म को?

आस्था और धर्म-कर्म की सांस्कृतिक जड़ें खत्म करके हम अपराध कर्म में तब्दील कर रहे हैं धर्म को? यह अभूतपूर्व धर्म-संकट क्यों है? क्योंकि मनुष्यता और प्रकृति के विध्वंस का मुक्तबाजार हमने चुना है! पलाश विश्वास हमारा धर्म कितना कमजोर है जो महज असहमति या आलोचना से लहूलुहान हो जाता है? हमारी आस्था कितनी निराधार है कि हम दूसरों की …

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युद्धक घृणा के खिलाफ रंगभेदी शास्त्रीयता तोड़कर बॉब डिलान के रंगकर्म को साहित्य का नोबेल पुरस्कार

युद्धक घृणा के खिलाफ रंगभेदी शास्त्रीयता तोड़कर बॉब डिलान के रंगकर्म को साहित्य का नोबेल पुरस्कार अमेरिकी बाउल गायक गीतकार बॉब डिलान के रंगकर्म को साहित्य का नोबेल पुरस्कार रवींद्र की गीताजंलि के बाद संगीतबद्ध लोकसंस्कृति और विविधता बहुलता को मिले इस नोबेल से विश्वव्यापी अभूतपूर्व हिंसा और अविराम युद्धक घृणा के खिलाफ रंगभेदी शास्त्रीयता तोड़कर भारत की विविधता और …

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महाश्वेतादी की राजकीय अंत्येष्टि : हम अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकते क्योंकि वे पूरी तरह सत्तावर्ग के कब्जे में हैं

हिंदुत्व का पुनरूत्थान का मतलब नवजागरण की विरासत से बेदखली है। इसी तरह टुकड़ा टुकड़ा मरते जाना नियति है क्योंकि फिजां कयामत है! जनम से जाति धर्म नस्ल कुछ भी हो, जनप्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हुए तो आप अछूत और बहिष्कृत हैं! पलाश विश्वास विरासत से बेदखली का कितना ख्याल है हमें? इसी तरह टुकड़ा टुकड़ा मरते जाना नियति है क्योंकि …

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#ISIS #अलकायदा और #तालिबान भी उन्हीं ने पैदा किये जो पैदा कर रहे हैं #हिंदूतालिबान

बिरंची बाबा ने अमेरिकी युद्ध में भागेदारी का वायदा दोहरा दिया #पेरिस में #मुंबई धमाके इसीलिए की हमीं नहीं सिर्फ, सारी दुनिया अब #मजहबी सियासत के शिकंजे में हैं! इस्लामिक स्टेट का आखिरी निशाना सउदी अरब है और इस्लाम के सबसे पाक इबादतगाह भी, तो समझिये कि उसके पीछे हाथ किस किसके हैं! इस्लामिक स्टेट,  अलकायदा और तालिबान भी उन्हीं …

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हिंदुत्व के पुनरुत्थान के साथ भारत अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील, हिटलर जैसे हारा, वैसे हमारा लाड़ला झूठा तानाशाह भी हारेगा

ब्लेअर बाबू ने मान लिया युद्ध अपराध माफी भी मांग ली, हम किस किसको माफ करेंगे? गधोंं को चरने की आजादी है और पालतू कुत्तों को खुशहाल जिंदगी जीने की इजाजत है! तय करें कि गधा बनेंगे कि कुत्ता या इंसान! लाल नील एका के बिना कयामत का यह मंजर नहीं बदलेगा और अधर्म अपकर्म के अपराधी राष्ट्र और धर्म …

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हवा हवाई है हमारा यह अंध राष्ट्रवाद, जिसकी कोई हकीकत की जमीन है ही नहीं #MannKiBaat

कोई मंकी बात जब तब बोल सकत है तो हमउ बोलत ह। पलाश विश्वास पहले एक बात साफ कर दूं कि हमने प्रवचन शुरु क्यों किया है। मेरे पिता मुझसे बहुत जियादा मजबूत आदमी थे, जिनकी रीढ़ कैंसर में सड़ गल जाने के बावजूद मुझसे सीधी रही है। उन्हें दरअसल किसी चीज की कोई परवाह नहीं थी। उन्होंने अपनी झोपड़ी …

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वेदों और उपनिषदों की कोई भूमिका बची नहीं, इसीलिए गीता

जाति व्यवस्था जारी रखने के लिए अब वेदों और उपनिषदों की कोई भूमिका बची नहीं है। वैदिकी आराधना पद्धति की परंपरा मानें तो यज्ञ के अलावा मूर्ति पूजा हो ही नहीं सकती जो मौजूदा हिंदुत्व की बुनियाद है। मूर्ति पूजा और नस्ली शुद्धता केंद्रित जो मनुस्मृति निर्भर हिंदुत्व है, उसके लिए वेदों और उपनिषदों समेत समूचे वैदिकी साहित्य की प्रासंगिकता …

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कथनी और करनी का विभेद नवारुण दा का जीवनदर्शन नहीं रहा

हमारे नवारुण दा और उन्हें हम जैसे जानते हैं पलाश विश्वास शुरू में ही यह साफ कर दिया जाये कि नवारुण भट्टाचार्य का रचनाकर्म सिर्फ जनप्रतिबद्ध साहित्य नहीं है,  वह बुनियादी तौर पर प्रतिरोध का साहित्य है और वंचितों का साहित्य भी। मंगलेश डबराल के सौजन्य से यह मृत्यु उपत्यका मेरा देश नहीं है,  के बागी कवि जिस नवारुण को …

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नोबेल शांति जनपदों को, तो जनपदों की भी सुधि लें, वरना हिंदी संस्कृत हो जायेगी!

पलाश विश्वास वीरेनदा की कविता उद्धृत करने का एक और मौका। 16 को बसंतीपुर पहुंच रहा हूं। वे लोग, जिनसे अस्मिताओं के आर-पार, तराई और पहाड़ के गांव गांव में, हर परिवार में बेशुमार प्यार का तोहफा मिला है, उनमें से ज्यादातर लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं। कैंसर से जूझते जनपदों का एक कवि लेकिन अब भी कविता …

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कॉरपोरेट राज की मर्यादाओं का उल्ल्ंघन क्यों होना चाहिए?

इस जड़ यथास्थिति का मुरजिम कौन?  पलाश विश्वास   विडंबना तो यह है कि मनुस्मृति बंदोबस्त के धारक वाहक और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रमुख सिपाहसालार सत्ता की दोनों ध्रुवों पर तमाम अनुसूचित, आदिवासी और पिछड़े क्षत्रप हैं, सामाजिक न्याय और समता के सिद्दांतों को अमली जामा पहनाने का एजंडा चुनने के बजाय जिन्होंने आरक्षित राजनीति चुन ली। इसके विपरीत अघोषित …

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भारतीय राष्ट्रीयता के जनक गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर हैं वंदेमातरम् के हिंदुत्व के ऋषि बंकिम नहीं

rabindranath tagore

पलाश विश्वास कल भारत और बांग्लादेश में चंद्रमा के हिसाब से जो बांग्ला कैलेंडर अब भी प्रचलित है, उसके मुताबिक श्रावण महीने की बाइस तारीख थी, जो बंगाल में रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि (Rabindranath Tagore’s death anniversary) की वजह से बाइसे श्रावण पर्व में तब्दील है। बाइसे श्रावण मृणाल सेन निर्देशित बहुचर्चित फिल्म भी है। दुनियाभर में जहां भी बांग्लाभाषी …

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बांग्लादेश में रवींद्र और शरत को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने के इस्लामी राष्ट्रवाद खिलाफ आंदोलन तेज

कट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती कोई लड़ाई। लालन फकीर और रवींद्रनाथ की रचनाओं को पाठ्यक्रम से निकालने के खिलाफ बांग्लादेश में आंदोलन तेज हो रहा है और रवींद्र और प्रेमचंद समेत तमाम साहित्यकारों को पाठ्यक्रम से निकालने और समूचा इतिहास को वैदिकी साहित्य में बदलने के खिलाफ भारत में अभी कोई आंदोलन शुरू नहीं किया जा सका है। रवींद्र का …

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राष्ट्रवाद आस्था का नहीं, राजनीति का मामला है इसीलिए दूध घी की नदियां अब खून की नदियों में तब्दील

rabindranath tagore

रवींद्र का दलित विमर्श-21 पलाश विश्वास पांच अक्तूबर को मैं नई दिल्ली रवाना हो रहा हूं और वहां से गांव बसंतीपुर पहुंचना है। आगे क्या होगा, कह नहीं सकते। कोलकाता में बने रहना मुश्किल हो गया है और कोलकाता छोड़ना उससे मुश्किल तो गांव लौटना शायद सबसे ज्यादा मुश्किल। मैंने जिंदगी से लिखने पढ़ने की आजादी के सिवाय कुछ नहीं …

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लोक की जड़ें जहां मजबूत नहीं, ऐसा साहित्य न कालजयी बन सकता है और न वैश्विक

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

कूपमंडुक आलोचक ही शैलेश मटियानी, रेणु और शानी को आंचलिक बताते हैं तो हार्डी, ताराशंकर, शोलोखोव, गोर्की, कामू या मार्क्वेज आंचलिक क्यों नहीं? ‘मटियानी‘ जी की जयंती 14 अक्टूबर को सभी साहित्यप्रेमी अपने-अपने क्षेत्र में परिचर्चा आयोजित करें …राकेश मटियानी की इच्छा पलाश विश्वास सबसे पहले साफ कर दिया जाये कि हम भाषाओं की दीवारें ढहा देने में यकीन करते …

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