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भारतीय सिनेमा जगत को यह आभास ही नहीं है कि वह एक चूहेदानी में कैद हो चुका है

बीनू मैथ्यू

एलीप्पथायम (चूहेदानी),1981 का, Adoor Gopalakrishnan (अडूर गोपालकृष्णन)
द्वारा लिखित तथा निर्देशित एक मलयालम फिल्म (Malayalam movie) है। यह एक ऐसे आदमी की कहानी दर्शाता है जो स्वयं में इतना अधिक फंस के रह गया है कि अपने आस पास हो रहे परिवर्तनों को भी समझ नहीं पा रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारतीय सिनेमा भी एक चूहेदानी में कैद होकर रह गया है। नहीं, भारतीय सिनेमा के लिए चूहेदानी के रूपक का प्रयोग करना थोड़ा प्रशंसापूर्ण हो जाएगा।

चूहेदानी में फंसा हुआ चूहा अत्यंत आवेग से इधर उधर दौड़ेगा ताकि उसको बाहर निकलने का मार्ग मिल सके। भारतीय सिनेमा जगत यह भी नहीं कर रहा। उन्नी (जो कि एलीप्पथायम का नायक है) की तरह, भारतीय सिनेमा जगत को यह आभास ही नहीं है कि वह एक चूहेदानी में कैद हो चुका है!

सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा 48वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (48th Indian International Film Festival) के भारतीय चित्रमाला अनुभाग से ‘एस. दुर्गा’ और ‘न्यूड’, इन चलचित्रों को हटा देने से, जो विवाद उत्पन्न हुआ है, उस संदर्भ में चूहेदानी का रूपक उभर कर सामने आता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 13 सदस्यों की जूरी को चित्रमाला अनुभाग के लिए 20 चलचित्रों का चयन करने के लिए कहा था। जूरी ने 20 चयनित चलचित्रों की सूची मंत्रालय को 13 अक्तूबर को दी थी। मंत्रालय ने 9 नवम्बर को अंतिम सूची सार्वजनिक की जिसमे से ‘एस. दुर्गा’ और ‘न्यूड’ को हटा दिया गया था।

यह एकपक्षीय अस्वीकृति उस जूरी का अपमान था जिसने इन चलचित्रों का चयन किया था।

जूरी के अध्यक्ष, फ़िल्म निर्माता सूजोय घोष ने 14 नवम्बर को अपना त्यागपत्र दे दिया। आने वाले दो दिनों में दो और जूरी सदस्यों ने भी अपने-अपने त्यागपत्र दे दिये। कथानक-लेखक अपूर्व असरानी ने कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हे गोवा में नवम्बर 20 से 28 तक होने वाले भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सम्मिलित होने की अनुमति नहीं दे रही। फ़िल्म-निर्माता ज्ञान कोररेया त्यागपत्र देने वाले तीसरे जूरी सदस्य थे। शेष जूरी सदस्य भी मंत्रालय के निर्णय से नाराज़ हैं।

सनल कुमार ससिधरण की मलयालम फ़िल्म ‘एस. दुर्गा’, घर से भाग गए एक युगल की कठिनाइयों से भरी हुई यात्रा को दर्शाते हुए केरल के पुरुष-प्रधान समाज पर एक टिप्पणी करती है।

फ़िल्म में राजश्री देशपांडे तथा कन्नण नायर ने नायिका और नायक की भूमिकाएँ निभाई हैं। दुर्गा एक उत्तर-भारतीय लड़की है जो केरल के एक लड़के, कबीर, के साथ भाग जाती है।

अक्तूबर में यह फ़िल्म पहले भी विवाद में रही जब सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफिकेशन (सी. बी. एफ़. सी) ने ‘सेक्सी दुर्गा’ नामक इस फ़िल्म का नाम बदलने का सुझाव दिया था और इसका नाम ‘एस. दुर्गा’ कर दिया गया था। इस फ़िल्म ने बहुत से अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किए हैं: रोटर्डम, नीदरलैंड्स के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म होने के लिए हिवोस टाइगर सम्मान; येरेवान,आर्मेनिया में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म होने के लिए गोल्डेन अप्रीकोट सम्मान; गुयानाजुयातो, मेक्सिको में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फ़िल्म होने का सम्मान; जेनेवा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म होने का सम्मान; एशिया-पैसिफिक स्क्रीन अवार्ड्ज़ में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के सम्मान के लिए नामांकन; इटली के पेसारो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म होने का यंग जूरी सम्मान; सिनेमा-जोव, वेलांशिया, स्पेन में संगीत और निर्देशन के लिए विशेष जूरी सम्मान; रूस के जेरकालों, टरकोसकी फ़िल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ छायांकन के लिए सम्मान; तथा स्टार 2017 के साथ जियो मामी 19वें मुंबई फ़िल्म महोत्सव में जूरी द्वारा विशेष उल्लेख।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक रवि जाधव द्वारा निर्देशित है मराठी फ़िल्म ‘न्यूड’

मराठी फ़िल्म ‘न्यूड’, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक रवि जाधव द्वारा निर्देशित है, यह फ़िल्म एक ऐसी महिला की कहानी दर्शाती है जो मुंबई में, गुप्त रूप से, एक न्यूड मोडेल का काम करती है। यह फ़िल्म इस महिला के अपने परिवार तथा पुत्र से यह सत्य छुपाए रखने के लिए किए हुए संघर्ष को दर्शाती है। इस फ़िल्म में कल्याणी मुले, छाया कदम तथा मदन देओधर ने कार्य किया है। इंडियन एक्सप्रेस के माध्यम से यह सामने आया है कि पहले भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की जूरी का यह एकमत से निर्णय था की इस महोत्सव के चित्रमाला अनुभाग में प्रसारित की जाने वाली पहली फ़िल्म ‘न्यूड’ ही होगी।

जब से दक्षिणपंथी हिन्दू राष्ट्रीय भा. ज. पा. सत्ता में आई है, तभी से वह फ़िल्म जगत पर आक्रमण कर रही है।

सत्ता में आने के कुछ समय पश्चात ही भा. ज. पा. ने एक टी.वी. कलाकार गजेंद्र चौहान को एफ़.टी.आई.आई. के अध्यक्ष के रूप में स्थापित करने की चेष्टा की। छात्रों ने 139 दिनों की हड़ताल कर दी। भा. ज. पा. ने लड़ाई जीत ली और अपने प्रतिनिधि को अध्यक्ष के रूप में स्थापित कर दिया। तथापि, छात्रों के आंदोलन तथा देश में बुद्धिजीवियों तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ रही असहिष्णुता के विरोध में अनेक फ़िल्म निर्माताओं ने अपने पहले से अर्जित राष्ट्रीय पुरस्कारों को लौटा दिया।

मैं ये बहुत स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रसारित होने से अस्वीकृत कर दिया जाना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एफ़.टी.आई.आई. हड़ताल से बड़ा हमला है। मतभेद को काटने के लिए तथा संस्कृति की एकपक्षीय परिभाषा को सब पर थोपने का यह फासिस्ट शासकों का नवीनतम प्रयास है। जूरी अध्यक्ष तथा दूसरे दो सदस्यों ने त्यागपत्र देकर अनुकरणीय साहस का प्रदर्शन किया है। भारतीय सिनेमा जगत के बाकी दिग्गज कहाँ है जब उनके बौद्धिक अभिव्यक्ति तथा जीविका के साधनों पर ही हमला किया जा रहा है? कुछ ने भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव स्थल पर प्रतीकात्मक विरोध करने का निर्णय लिया है। परंतु यह काफी नहीं है। प्रतीकात्मकता से अब बात नहीं बनेगी। हमें ठोस क्रिया की आवश्यकता है।

यहाँ पे चूहेदानी का रूपक फिर से सामने आता है। भारतीय फ़िल्म निर्माता चूहेदानी में कैद चूहे की प्राकृतिक प्रवृत्ति का प्रदर्शन क्यूँ नहीं कर रहे? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि एलीप्पथायम के नायक उन्नी की तरह वे भी अपनी सुस्त ज़िंदगी में कैद हो के रह गए हैं और उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि भारत के राजनीतिक क्षेत्र में क्या हो रहा है। उन्हे यह भी नहीं मालूम कि वे चूहेदानी में कैद हो चुके हैं। भारतीय फ़िल्म निर्माताओं को स्वयं द्वारा निर्मित इस चूहेदानी से निकलने की तीव्र इच्छा प्रकट करनी चाहिए। उन्हे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव तथा सब सरकारी परियोजनाओं का बहिष्कार कर देना चाहिए। उन्हे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को कथाकथित राष्ट्रीय सम्मान के लिए भी (जो कि आजकल हिन्दी फ़िल्म सम्मान बनकर रह गए हैं) फिल्मों को भेजना बंद कर देना चाहिए।

एफ़.टी.आई.आई. हड़ताल के दौरान एक भित्ति चित्र, अल्बर्ट कामुस का यह उद्धरण था,‘एक गैर-मुक्त दुनिया में जीने का एकमात्र तरीका यही है कि आप इतने मुक्त हो जाएँ कि आपका अस्तित्व ही विद्रोह का एक चिन्ह बन जाये।‘ फासिस्ट ताक़तें कैम्पसों में से बाहर आ गयी हैं और आपकी फिल्मों का शिकार कर रही हैं। समय आ गया है कि जिन फ़िल्म निर्माताओं ने एफ़.टी.आई.आई. हड़ताल का समर्थन किया था, वे अब भी साहस दिखाएँ। मैं तो यह कहूँगा कि उतना नहीं बल्कि उससे अधिक साहस दिखाएँ। बहिष्कार करना, छीनना तथा अनुमोदित करना, इस रणनीति ने रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका की सरकार को गिरा दिया था। यह वो सफल रणनीति है जो इसराएली सरकार के विरोध में इस्तेमाल की जा रही है। सरकार द्वारा समर्थित सिनेमा के लिए भारत में इस रणनीति को अपनाने की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए, फ़िल्म निर्माताओं को स्वयं द्वारा निर्मित एलीप्पथायम (चूहेदानी) में से बाहर आने की आवश्यकता है।

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पुनश्च : एलीप्पथायम के निर्देशक, फालके सम्मान द्वारा सम्मानित अदूर गोपालकृष्णन ने भारतीय सिनेमा पर हुए सबसे बड़े हमले के विरोध में एक शब्द भी नहीं कहा है। लगता है वह अपने ही एलीप्पथायम में कैद हैं।

यह लेख मूलरूप से Countercurrents.org. पर प्रकाशित हुआ है। अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद निवेदिता द्विवेदी ने किया है।

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