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जजों का संवाददाता सम्मेलन : बटरफ्लाई एफेक्ट… बच नहीं पायेगा हत्याओं की इस श्रृंखला का अपराधी

सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने शुक्रवार को राजधानी दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन किया। सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। ये चार जज हैं- जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़। अपने आवास पर आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सर्वोच्च न्यायालय के नंबर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा, "हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो इस देश में या किसी भी देश में लोकतंत्र ज़िंदा नहीं रह पाएगा। पूरी घटना की समीक्षा कर रहे हैं

अरुण माहेश्वरी

किसी भी सजायी गई पूरी कथा के परिवेश से जब एक मामूली तितली की हवा भी गुजर जाती है तो उसके दबाव का इतना गहरा असर होने लगता है कि अंत में पूरी कहानी ही मुंह के बल गिर कर किसी दूसरे ही, बिल्कुल भिन्न अर्थ का संदेश देने लगती है। गणित के क्षेत्र में कहते हैं कि इस बटरफ्लाई एफेक्ट के कारण ही एक बड़ा समीकरण अंत में जाते-जाते इतनी बुरी तरह चरमरा जाता है कि समीकरण का समाधान अपेक्षा से बिल्कुल उलटा और गड्ड-मड्ड हो जाता है। आईंस्टीन की क्वांटम थ्योरी में कहते है कि जो ईश्वर कभी भूल नहीं करता, अर्थात प्रकृति निश्चित तौर पर अपने नियमों का ही पालन करती है, वही ईश्वर कई इर्द-गिर्द के छोटे दोलनों से धोखा खा जाता है। अर्थात ईश्वल भूल नहीं करता लेकिन खुद धोखा जरूर खा जाता है।

ये सारी बातें आज और भी अच्छी तरह से समझ में आ रही है जब हम मुख्य न्यायाधीश के मनमानेपन पर सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों के संवाददाता सम्मेलन से सबसे प्रमुख तौर पर किसी चमत्कार की तरह उभर कर सामने आ गये जस्टिस लोया की हत्या अथवा रहस्यमय मौत, कुछ भी क्यों न कहे, के मामले को देखते हैं।



इस मामले की किसी भी गहन जांच से सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौशर बी और तुलसी प्रजापति के फेक एनकाउंटर के तल तक पहुंच जाने की आशंका के कारण हमारे समय के आज के भगवानों ने इसे दफना देने के आज तक इतने जतन कियें, लेकिन बटरफ्लाई की हवा वाला अदृश्य झोंका हर बार इस पर से पर्दा उठा ही देता है !

मुख्य न्यायाधीश को भ्रष्टाचार के एक मामले में दबाव में लेकर ऐन सर्वोच्च न्यायालय के जरिये इस पूरे विषय पर मिट्टी डालने की जो कोशिश हुई, अब लगता है, वह भी अब उतना आसान नहीं होगा। उल्टे इस चक्कर में मुख्य न्यायाधीश पर ही महाअभियोग लगाने की सरगर्मियां शुरू हो गयी हैं। अब से उनकी प्रत्येक गतिविधि को हर कोई शक की निगाह से देखेगा। यह उनके रहते तक सर्वोच्च न्यायालय के सुचारु ढंग से काम करने में बाधा डालेगा तो साथ ही इस खास विषय को यूं ही दबा देने की कोशिश को भी असंभव बना देगा।

बारह साल पहले 26 नवंबर 2005 और 28 नवंबर 2005 को हुई सोहराबुद्दीन और कौसर बी की हत्या के मामले को दबाने के लिये इन भगवानों ने क्या-क्या जतन नहीं किये, लेकिन धरती-आकाश सबको फाड़ कर यह मामला घूम-घूम कर फिर से खड़ा हो ही जाता है। इसी मामले को कथानक बना कर मनु जोसेफ ने अपने उपन्यास ‘Miss Laila armed and dangerous’ (मिस लैला हथियारबंद और खतरनाक) का अंत इन शब्दों से किया है —

"गणतंत्र एक विशाल खेल है। यह सबको इस यकीन का लालच देता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और बच सकते हैं। और वे बहुत कुछ बच भी जाते हैं। लेकिन तभी एक दिन, अनिवार्यत:, चमत्कार होता है।”

(The republic is a giant prank. It lures all into believing that they can do anything and get away. And they get away with a lot. But then one day, inevitably surprise.)

क्या है सोहराबुद्दीन दंपत्ति का फेक एनकाउंटर मामला



इस मामले को इतिहास को देखिये।

नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन दंपत्ति का फेक एनकाउंटर हुआ, जिसकी एक जांच अधिकारी ने गुजरात की आईजी सीआईडी (क्राइम) को 2006 की जुलाई में रिपोर्ट पेश की। इसके बाद ही तुलसीराम प्रजापति का एक और फेक एनकाउंटर हुआ। इसकी रिपोर्ट 23 अप्रैल 2007 को गुजरात के डीआईजी रजनीश राय ने पेश की और उसने मई 2007 में आईपीएस वी डी वंजारा और उसके साथ और दो पुलिस के लोग, एम एन दिनेश और राजकुमार पांडियन को गिरफ्तार कर लिया।

उसी समय यह साफ हो गया था कि गुजरात पुलिस में शासक दल की शह पर बाकायदा हत्यारों का एक गिरोह तैयार हो गया है जिसका नेतृत्व पुलिस में वंजारा करता था।

मजे की बात है कि वंजारा आदि की गिरफ्तारी के चंद दिनों के बाद ही गुजरात की मोदी सरकार ने डीआईजी रजनीश राय का सीआरपीएफ में तबादला कर दिया। इसके बाद जनवरी 2010 में केन्द्र सरकार ने इस मामले की जांच के लिये इसे सीबीआई को सौंपा।

सीबीआई ने जांच के बाद 23 जुलाई 2010 के दिन गुजरात के तत्कालीन डीआईजी अभय चुड़ास्मा को गिरफ्तार कर लिया। इसके अलावा अमित शाह पर भी 25 जुलाई 2010 के दिन इस मामले के एक प्रमुख अपराधी के रूप में चार्जशीट दाखिल की।

इसके तीन महीने के बाद 29 अक्तूबर 2010 के दिन अमित शाह को जेल से जमानत मिल गई।

इस पूरे विषय में गुजरात सरकार की भूमिका को देखते हुए 27 सितंबर 2012 के दिन सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को गुजरात से हटा कर मुंबई में सेशन कोर्ट के हवाले कर दिया।

8 अप्रैल 2013 को फिर सर्वोच्च न्यायालय ने तुलसी प्रजापति के मामले के साथ ही सोहराबुद्दीन के मामले को भी जोड़ दिया और यह भी निर्देश दिया कि एक ही जज इस पूरे मामले की सुनवाई करेगा।

इसी बीच मई 2014 के आम चुनाव में केंद्र में नरेन्द्र मोदी की जीत हो गई और 14 जून 2014 के दिन मुंबई सेशन कोर्ट के जज उत्पत का ठीक उस दिन तबादला कर दिया गया जिसके दूसरे दिन उनकी अदालत में अमित शाह को उपस्थित होना था। उनकी जगह जज लोया आए।

अक्तूबर महीने में महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बन गई। जज लोया ने मामले को हाथ में लेने के बाद इस पर जांच को आगे बढ़ाने के लिये अदालत में अमित शाह की उपस्थिति पर जोर देना शुरू किया, तभी नागपुर में एक शादी में गये 48 वर्षीय जज लोया की 1 दिसंबर 2014 के दिन अचानक दिल के दौरे से मृत्यु हो गई। उनके स्थान पर आए जज एम बी गोसावी।



जज गोसावी ने 30 दिसंबर को सिर्फ पंद्रह मिनट की सुनवाई के बाद बारह हजार पन्नों की सीबीआई की चार्जशीट पर फैसला सुनाते हुए इस मामले से अमित शाह को पूरी तरह मुक्त कर दिया। सीबीआई ने भी इस पर आगे कोई अपील नहीं करने का निर्णय ले लिया। इसके बावजूद इस मामले को हमेशा के लिये खत्म कर देने के लिये 1 अगस्त 2016 के दिन सर्वोच्च न्यायालय में सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ एक याचिका दायर हुई, जिसे उसी समय सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज करके इस पूरे मामले पर एक प्रकार से मिट्टी डाल दी थी।

लेकिन यह चमत्कार नहीं तो और क्या है कि सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय के साल भर बाद, 1 सितंबर 2017 के दिन अचानक ही 'कैरावन' पत्रिका में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें जज लोया के परिजनों के इंटरव्यू के साथ ही वे सारे परिस्थितिगत साक्ष्य विस्तार से पेश किये गये जिनसे पता चलता है कि जज लोया की मृत्यु कोई स्वाभाविक मृत्यु नहीं थी, इसके पीछे निश्चित तौर पर हत्या की साजिश थी।

इसमें यह भी सामने आया कि किस प्रकार मुंबई हाईकोर्ट के ही चीफ जस्टिस ने जज लोया को एक सौ करोड़ की घूस और मुंबई में बंगला आदि देने की पेशकश की थी ताकि वे इस मामले को दफना दे। लेकिन जब जज लोया ने इसे नहीं स्वीकारा तभी नागपुर में उनकी संदिग्ध ढंग से मृत्यु हो गई।

जजों ने भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व के लिये क्यों बताया बड़ा खतरा



'कैरावन' की इस रिपोर्ट ने पूरे राष्ट्र को सकते में ला दिया। न्यायपालिका के हलके में भी इससे भारी हलचल मची। जजों को घूस देने और न लेने पर हत्या तक कर देने का यह मामला न्यायपालिका के लिये अस्तित्व के संकट की तरह है। इसीलिये कई पूर्व जजों तक ने इस पूरे मामले की सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ जज की देख-रेख में जांच कराने की मांग उठाई।

यही विषय कल, 11 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय में उठा था। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ जज चाहते थे कि इस विषय की गंभीरता को देखते हुए इसे किसी वरिष्ठ जज की अदालत में सुनवाई के लिये भेजा जाए और इसके लिये उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से मिल कर भी उनसे अनुरोध किया था। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से मुख्य न्यायाधीश ने उनकी एक न सुनी और उसे उस जज की अदालत के सुपुर्द कर दिया जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह भाजपा के नेताओं के बहुत करीब का व्यक्ति है।

मुख्य न्यायाधीश के ऐसे और भी कुछ निर्णयों को देखते हुए कल तत्काल सर्वोच्च न्यायालय के इन सबसे वरिष्ठ जजों ने बाकायदा संवाददाता सम्मेलन करके इसे भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व के लिये एक बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि यदि हम आज इस खतरे के प्रति लोगों को आगाह नहीं करते हैं तो आगत पीढ़ियां उन्हें अपना जमीर बेच देने के लिये कोसेगी।

कुल मिला कर, आज अब यही लग रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय तक में अपने प्रभाव का प्रयोग करके आज का शासक दल जिस प्रकार सोहराबुद्दीन, कौसर बी, तुलसी प्रजापति और अंत में जज लोया की हत्या के मामलों को दबा देने की कोशिश कर रहा है, आगे इसे दबाना उतना आसान नहीं होगा। इनकी अगर यही कोशिश चलती रही तो घटनाओं की इस श्रृंखला का जो बटरफ्लाई एफेक्ट अंत में सामने आयेगा, उसकी आंच से मोदी सरकार और भाजपा का अस्तित्व तक बच नहीं पायेंगे।

इसे कहते हैं गणतंत्र का महाखेल !

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