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Anand Patwardhan

वे हमें राष्ट्रविरोधी कहते हैं, जिन्होंने मुस्लिम लीग की ही तरह अंग्रेजों का साथ दिया था !

They call us anti-nationals, who supported the British like the Muslim League!

वे हमें राष्ट्रविरोधी कहते हैं !

उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुस्लिम लीग की ही तरह अंग्रेजों का साथ दिया था।

आनंद पटवर्द्धन

उनके पूर्वज सर्वाधिक अनुदार ब्राह्मण जाति से थे, जिनका उस संस्कृति में बहुत ज्यादा विश्वास था, जिसने उन्हें ताकतवर बनाया।

उन्होंने देश की मुख्यधारा के धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया और 20 वीं सदी के प्रारंभ से धार्मिक आधार पर लोगों का धुव्रीकरण प्रारंभ किया।

उन्होंने हिटलर की खुली प्रशंसा की और कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के साथ नाजी तरीके से पेश आने पर देश को लाभ होगा।

उन्होंने कहा कि उनके तीन शीर्ष शत्रु हैं (1) मुसलमान (2) ईसाई और (3) कम्युनिस्ट।

वे तर्क देते हैं कि हिन्दू और मुसलमान परस्पर कभी एक हो ही नहीं सकते। उन्होंने द्विराष्ट्र के सिद्धान्त को जन्म दिया, ठीक वैसे ही जैसे उनके ठीक विपरीत उतनी ही कट्टर मुस्लिम लीग ने दिया था। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुस्लिम लीग की ही तरह अंग्रेजों का साथ दिया था। देश के विभाजन के दौरान उन्होंने मुस्लिम लीग की ही तरह भयंकर रक्तपात को भड़काया था।

उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को ही अस्वीकार कर दिया था

उन्होंने 1947 में स्वतंत्रता के सूर्योदय से पूर्व राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को ही अस्वीकार कर दिया था और सिर्फ अपना भगवा ध्वज फहराया था।

1948 में उन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या कर दी और उसके बाद मिठाइयाँ बाँटी। उन्होंने 1950 में भारतीय संविधान के विरूद्ध जहर बुझे शब्दों का इस्तेमाल किया और संविधान की बजाय मनुस्मृति को प्राथमिकता दी।

उन्होंने 1951 में तत्कालीन कानून मंत्री डॉ.अम्बेडकर के हिन्दू कोड बिल का विरोध किया, जिसमें हिन्दू महिला को हिन्दू पुरूषों की भांति समान अधिकार दिये गये थे। डॉ. अंबेडकर ने व्यथित होकर त्यागपत्र दे दिया। इसी वजह से उनके अगले लक्ष्य ‘समान नागरिक संहिता’ का कार्य कभी पूरा नहीं हो सका।

1956 में उन्होंने उन सभी लोगों का विरोध किया, जिन्होंने डॉ. अंबेडकर के साथ जातिवाद के बोझ से लदे हिन्दू धर्म को छोड़कर जाति विहीन बौद्ध धर्म को अपनाया। दलितों के विरूद्ध निरंतर घृणित अत्याचार के बावजूद उन्होंने उन धार्मिक ग्रन्थों पर भी सवाल उठाने का विरोध किया जिनमें जाति व्यवस्था को प्रतिष्ठापित किया गया था। और वे दुनिया के सामने यह दिखावा जारी रखते हैं कि उनका धर्म इस पृथ्वी का सबसे सहिष्णु धर्म है !

कश्मीर में धारा 370, जो उस क्षेत्र को स्वायत्ता देती है, का उन्होने इतना भयंकर विरोध किया जिसके परिणामस्वरूप वहाँ आतंकवाद को बढ़ावा मिला।

1987 में उन्होंने चुनावी लाभ हासिल करने के लिये राजस्थान में सती हुई एक महिला का महिमामण्डन किया।

उन्होंने दलितों और पिछड़ों के लिये आरक्षण नीति का तब तक जोरदार विरोध किया जब तक कि अन्ततः उन्हें इसके कारण चुनावी नुकसान महसूस नहीं हुआ।

1992 में उन्होंने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया और हिन्दू और मुसलमानों के बीच नाजुक रही एकता को नष्ट कर दिया।

उन्होंने आदिवासियों की शिक्षा और चिकित्सकीय जरूरतों के लिये काम करने वाले ईसाइयों को निशाना बनाया तथा उनकी हत्या की।

1988 में उन्होंने अणु बम को बढ़ावा दिया और यहां तक कि वे उस पर मंदिर बनाना चाहते थे। उन्होंने बम को हथियार बनाना शुरू किया और पाकिस्तान के साथ आणविक हथियारों की दौड़ प्रारंभ की जिसके कारण समूचा उपमहाद्वीप आणविक विनाश के कगार पर आ खड़ा हुआ।

आजादी के बाद के पूरे काल में अनगिनत साम्प्रदायिक दंगे कराने के बाद उन्होंने 2002 में गुजरात में मुसलमानों का सामूहिक नरसंहार प्रारंभ किया। इसके बाद मुजफ्फरनगर और अन्य स्थानों पर चुनावी अनिवार्यता के कारण उन्हे जहां जैसी जरूरत महसूस हुई, उन्होंने दंगे करवाये।

उनके द्वारा तीस्ता सीतलवाड़ और उनकी टीम के व्हिसलब्लोअर्स के खिलाफ अभियान प्रारंभ किया गया ताकि दंगों के बाद पीड़ितों को न्याय न मिले और दंगों के अपराधियों को बचाया जा सके।

उन्होंने मेधा पाटेकर और अरूणा रॉय जैसी राष्ट्रीय हस्तियों पर शारीरिक हमला किया।

उन्होंने गोआ, थाणे, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद और अन्य स्थानों पर आतंकी हमले और बम विस्फोट किये और इसके आरोप मुसलमानों पर थोपने की तब तक कोशिश करते रहे जब तक कि उनके इस खेल का एक बहादुर पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे ने भण्डाफोड़ नहीं कर दिया।

कर्नाटक में उन्होंने देश के सर्वोत्तम लौह अयस्क को अपने आर्थिक प्रतिद्वंदी चीन को अवैध रूप से बेचा।

मध्य प्रदेश में उन्होंने व्यापम घोटाले से जुड़े हुये अपने 50 से अधिक लोगों की हत्या कर दी।

राजस्थान में उनके मुख्यमंत्री ने फरार हुये आई.पी.एल. के पूर्व अध्यक्ष ललित मोदी को सहयोग किया और उसके अपराध को बढ़ावा दिया जिसकी आर्थिक अपराधों के संबन्ध में देश को तलाश है। उन्होंने कुख्यात संत आसाराम बापू के खिलाफ गवाह देने वाले लोगों की हत्या कर दी। उन्होंने 2013 के बाद से 3 प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों और अनेक अनजान बुद्धिजीवियों की हत्या कर दी और अनेक को धमकियाँ दीं।

आज वे, और कुकुरमुत्तों की भाँति तेजी से बढ़ रहे उनके संगठन गौमांस और लव जिहाद के नाम पर मुसलमानों पर हमले करने के लिये दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में अपने समूहों को हथियारों का प्रशिक्षण दे रहे है। उनकी तेजी से बढ़ रही युवा कमान ग्रामीण और शहरी भारत में शैक्षणिक परिसरों में छात्र संगठनों, धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक, गांधीवादी, वामपंथी, दलित या इनमें से किसी के भी संयोजित समूह को आतंकित कर रही है।

वे उन सभी विरोधी समूहों या व्यक्तियों का हिंसक रूप से विरोध या उन्हें बदनाम कर रहे हैं जो उनके प्रभाव को चुनौती देते हैं। चाहे वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. संदीप पाण्डे से लेकर कबीर कला मंच के शीतल साठे हों। एफ.टी.टी.आई. के छात्रों से लेकर चेन्नई के अंबेडकर पेरियार ग्रुप के और हैदराबाद के अंबेडकर छात्र संघ के सदस्य हों, सभी को निशाना बना रहे हैं।

वे ईस्ट इंडिया कंपनी के आज आधुनिक अवतार हैं।

उनकी विचारधारा मुक्त बाजार वाले आर्थिक ढाँचे के साथ मध्यकालीन संस्कृति से मिलती है जो राष्ट्रीय संप्रभुता और प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समक्ष समर्पित कर देती है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के आज आधुनिक अवतार हैं।

और वे अपने ताजा शिकार रोहित वेमुला को, जो उसी समाज का है जिसका उन्होने हजारों साल तक दमन किया, आज राष्ट्रविरोधी कहते हैं!

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