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Shri Ram Tiwari श्रीराम तिवारी
श्रीराम तिवारी Maarg Darshak at Janwadi lekhak sangh Indore Convener at Jan Kavya Bharti Former Former -C T S at Bharat Sanchar Nigam Limited

तीसरी दुनिया बनाम साम्राज्यवाद का चारागाह ……..

Third World Vs Imperialism’s Pasture ……..

Whether fish or humans die due to consumption of polluted substances. Leaders in advanced countries feel that this is a cheap deal because death in these advanced countries is expensive.

श्रीराम तिवारी

विगत दिनों मुंबई पोर्ट से दो समाचार एक जैसे आये। एक – विदेशी आयातित प्याज बंदरगाहों पर सड़ रही थी। कोई महकमा या सरकार सुध लेने को तैयार नहीं; परिणामस्वरूप देश में निम्न आय वर्ग की थाली से प्याज लगभग गायब ही हो चुकी थी।

दूसरा समाचार ये था कि पश्चिमी विकसित राष्ट्रों का परमाण्विक कचरा भारतीय बंदरगाहों से; रातों रात ऐसे उतारवा लिया कि किसी को भी कानों कान भनक भी नहीं लगी। वह खतरनाक परमाणुविक रेडिओ-धर्मी कूड़ा करकट कहाँ फेंका गया? मुझे नहीं मालूम, उसके नकारात्मक परिणामों का सरकार और जनता ने क्या निदान ढूँढा वह भी मुझे नहीं मालूम। जिस किसी भारतीय दिव्य-आत्मा को मालूम हो, सो सूचित करे।

Foreign industrial waste is being discharged at the ports of the INDIA

यह नितान्त सोचनीय है कि एक ओर देश के बन्दरगाहों पर विदेशी औद्योगिक कचरे को उतारा जा रहा है, दूसरी ओर खुले आम कहा जा रहा है कि तीसरी दुनिया के देशों को प्रदूषण-निर्यात से अमेरिका को तो भारी लाभ होगा ही, आयातक राष्ट्रों को भी विकसित राष्ट्रों G-20 से आधुनिकतम तकनालॉजी और विश्व बैंक की कम ब्याज दरों पर ऋण उपलब्धि की गारंटी का प्रलोभन।

विश्व बैंक के आर्थिक सलाहकार सामर्स का कहना है कि ‘हमें तीसरी दुनिया को प्रदूषण निर्यात करने की जरूरत है’।

Cruel mentality of capitalist western nations

यह पूँजीवादी पश्चिमी राष्ट्रों की क्रूरतम मानसिकता और उद्योग-जनित प्रदूषण  संकट को विस्थापित करने की साम्राज्यवादी  दादागिरी नहीं तो और क्या है ? उनका तर्क है कि तीसरी दुनिया के अधिकाँश देश अभी भी औद्योगीकरण से कोसों दूर हैं, उनके समुद्रीय किनारों पर यदि किसी तरह का परमाणु कचरा फेंका जाता है तो इससे होने वाला वैश्विक पर्यावरण प्रदूषण उतना घातक नहीं होगा जितना कि उस सूरते-हाल में सम्भावित है; जब वो उन्नत राष्ट्रों की सरजमीं पर ही पड़ा रहे या यूरोप अमेरिका के सामुद्रिक तटों पर दुष्प्रभावी विकिरणों से धरती को नष्ट करता रहे।

Death costs are lower in the third world

उनका एक तर्क और भी है कि तीसरी  दुनिया में मौत की लागत कम है यानी जिन्दगी सस्ती सो विषाक्त कचरा तीसरी दुनिया के देशों की सर-जमीन पर उनके समुद्र तटों पर भेजना युक्तिसंगत है।

प्रदूषित पदार्थों के सेवन से चाहे मछलियाँ मरें या इंसान, उन्नत देशों के रहनुमाओं को लगता है कि यह सस्ता सौदा है क्योंकि इन उन्नत देशों में मौत महंगी हुआ करती है।

पूँजीवादी मुनाफाखोरों की सभ्यता के निहितार्थ स्पष्ट हैं। 200 सालों से यह सिलसिला जारी है। ये तब भी था जब अधिकाँश तीसरी दुनिया गुलाम थी। ये तब भी है जबकि लगभग सारी दुनिया आजाद है।

प्रारम्भ में तो व्यापार और आग्नेय अस्त्रों की बिना पर यह पूँजीवादी निकृष्ट रूप सामने आया था; बाद में निवेश, कर्ज और अब प्रौद्योगिकी हस्तान्तरण ने विकासशील देशों को पूँजीवादी सबल राष्ट्रों का लगभग गुलाम ही बना डाला है- यही नव्य उदारवाद की बाचिक परिभाषा हो सकती है।

तीसरी दुनिया को एक ओर तो आउटडेट तकनीकी निर्यात की जाती है, दूसरी ओर जिन नकारात्मक आत्मघाती शर्तों पर विकासशील राष्ट्रों में औद्योगीकरण थोड़े हीले-हवाले से आगे बढ़ा उनमें ये शर्तें भी हैं कि आप तीसरी दुनिया के लोग अपने जंगलात, नदियाँ, पर्वत स्वच्छ रखें ताकि हम पश्चिम के उन्नत राष्ट्र तुम्हारे देश में आकर उसे इसलिये गन्दा कर सकें कि हमारे हिस्से के विषाक्त कचरे का निस्तारण हो सके और पर्यावरण संतुलन की जन-आकाँक्षा के सामने हमें घुटने न टेकने पड़ें।

विकासशील देशों के पर्यावरण संगठन जंगल बचाने या विकसित देशों के कचरे आयात करने से रोकने के अभियान को मजबूत बनाने के लिये विश्व-व्यापार संगठन पर न तो दबाव डाल रहे हैं और न ही इसमें निहित असमानता, अन्याय एवं खतरनाक आर्थिक- राजनैतिक दुश्चक्र के खिलाफ कोई क्रांतिकारी सांघातिक प्रहार कर पा रहे हैं।

यह विडम्बना ही है कि विकसित देशों के पर्यावरण संगठन (Environmental Organization of Developed Countries) अपनी सरकारों पर बेजा दबाव डालते हैं कि वे उनके देशों की जिजीविषा की खातिर विकासशील राष्ट्रों से अमुक-अमुक आयात बंद करें। उनके लिये कोस्टारिका, भारत या बंगला देश की शक्कर और शहद भी कड़वी है, सो इन गरीब देशों के कपड़ों से लेकर खाद्यान्न तक में उन्हें जैविक-प्रदूषण (Organic pollution) नज़र आता है। ये पर्यावरणवादी पाश्चात्य संगठन ये भूल जाते हैं कि तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों के पिछड़ेपन, अशिक्षा और तमाम तरह के प्रदूषण के लिये सम्पन्न और विकसित राष्ट्र ही जिम्मेदार हैं; उन्हीं के राष्ट्र हितैषियों की करतूत से तीसरी दुनिया में कुपोषण, भुखमरी, जहालत और प्रदूषण इफरात से फैला पड़ा है।

विकाशशील देश इस भ्रम में हैं कि उनके यहाँ प्रौद्योगिकी आ रही है, उनका आर्थिक उत्थान होने जा रहा है किन्तु वे प्रदूषण- समस्या के साथ- साथ बेरोजगारी और विषमता ही आयात कर रहे हैं।

विकासशील देशों को ऐसा रास्ता ढूँढना होगा जो इस परिवर्तन की प्रक्रिया को न केवल रोजगार मूलक बनाए अपितु धरती के स्वरूप को और ज्यादा हानि न पहुँचाये। तब अमेरिका में इंसानी-जिन्दगी महँगी और भारत में इतनी सस्ती न होगी कि भोपाल गैस काण्ड की 25 वीं वर्षगाँठ पर असहाय अपंगता को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करनी पड़े।

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