Home » अच्छे दिन के तीन साल : सच छुपाने के लिए शोर

अच्छे दिन के तीन साल : सच छुपाने के लिए शोर

राजेंद्र शर्मा

दी सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर, सरकार ने और सत्ताधारी भाजपा ने, धुंआधार प्रचार की विराट योजना तैयार की है।

सरकार की उपलब्धियों के बारे में बताने के नाम पर, देश के पूरे 900 शहरों में आयोजन होना है। इसमें केंद्रीय योजनाओं से लाभान्वित होने वालों के साथ केंद्रीय मंत्रियों के भोज के आयोजन भी शामिल हैं।

सरकार का अभियान ‘न्यू इंडिया’ के नाम से चलाया जाएगा, जबकि असाधारण मोदी-भक्ति का प्रदर्शन करते हुए भाजपा के अभियान के लिए ‘मेकिंग ऑफ डेवलपिंग इंडिया’ का नारा चुना गया है क्योंकि हिंदी में उसका संक्षिप्त रूप बनता है, ‘मोदी’।

यह भी पढ़ें – आ गए अच्छे दिन, खादी उद्योग के कैलेंडर व डायरी से गांधीजी गायब, मोदी विराजमान

बेशक, दो साल पूरे होने पर भी कमोबेश, ऐसी ही प्रचार की आंधी उठायी गयी थी। लेकिन, तीन साल पूरे होने पर किया जा रहा प्रचार उद्यम, पिछले साल के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा बड़ा हो गया है।

क्यों न हो, अपनी विफलताओं को ढ़ांपने के लिए प्रचार की मोदी सरकार की जरूरत भी तो पिछले साल से दोगुनी हो गयी है।

कहने की जरूरत नहीं है कि नोटबंदी को भुनाने में और उत्तर प्रदेश के चुनाव में कामयाबी के बाद, अपने प्रचार अंधड़ की कामयाबी पर मोदी और उनकी भाजपा का भरोसा भी, पिछले साल से दोगुना हो गया है। आखिर, गोयबल्स ने कहा ही था कि बड़ा झूठ बोलो, सौ बार बोलो, तो लोग सच मानने लगते हैं!

यह भी पढ़ें –आधा कार्यकाल बीत गया, कहां हैं अच्छे दिन

बहरहाल, प्रचार के सचाई को ढांपने-नहीं ढांप पाने में तो संदेह हो सकते हैं, इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी सरकार का तीसरा साल पूरा होने के मौके पर, देश के हालात किसी भी तरह से कामयाबी का जश्न मनाने लायक नहीं हैं। खेती, जिस पर देश की जनता का सबसे बड़ा हिस्सा निर्भर है, उसका संकट न सिर्फ बना हुआ है बल्कि और गहरा हो गया है। इसका सबूत मोदी राज के तीन साल में देश में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होना है।

वास्तव में परोक्ष रूप से इसी का सबूत उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा का किसानों के लिए ऋण माफी के वादे से वोटों की अच्छी कमाई करना भी है, जिस वादे को इस संकट के दबाव में ही चुनाव के बाद मुख्यमंत्री योगी ने आंशिक रूप से पूरा भी किया है।

यह भी पढ़ें –आ गए अच्छे दिन : 80 करोड़ की मामूली कीमत पर बिक गया एम्बेसडर कार का ब्रांड

लेकिन, बढ़ता संकट सिर्फ कृषि के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। औद्योगिक क्षेत्र भी भारी संकट में है और औद्योगिक वृद्धि दर महीनों से शून्य से कुछ ऊपर, कुछ नीचे के झूले पर झूल रही है। इसके ऊपर से नोटबंदी की मार, जिसने खुद सरकार की स्वीकृति के अनुसार, कम से कम अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर, जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था का 80 फीसद हिस्सा है, घातक प्रहार किया था।

यह भी पढ़ें –बजरंगी संवाद, देवभाषा का जलवा और आरएसएस फौज के फतवे हमारे खिलाफ

और तो और पिछले कुछ समय से प्रगति का इंजन बना रहा सेवाओं का क्षेत्र भी संकट के दौर से गुजर रहा है। चमकदार सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र, खासतौर पर अपने निर्यातों में कमी के चलते भारी संकट में है। जाहिर है कि टं्रप निजाम की एचबी-1 वीसा नीतियों से और आम तौर पर पश्चिम में चल रही आउटसोर्सिंगविरोधी संरक्षणवादी हवा से, यह संकट और गहरा हो गया है।

इसी सब का नतीजा है कि हर साल दो करोड़ नये रोजगार जुटाने का वादा कर के सत्ता में आयी मोदी सरकार, लाखों का आंकड़ा भी मुश्किल से छू पा रही है, जबकि संगठित औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार लगातार घट रहे हैं।

यह भी पढ़ें –अच्छे दिन – भाजपा की दलित विधायक के साथ थाने में मारपीट !

इसी संकट की एक विस्फोटक सामाजिक अभिव्यक्ति के तौर पर गुजरात में पटेल, महाराष्ट्र में मराठा और हरियाणा में जाट, जैसे परंपरागत रूप से ताकतवर माने जाने वाले, मंझले कृषक समुदायों के, आरक्षण की मांग के आंदोलन उठे हैं, जो वास्तव में अपने लिए आरक्षण की मांग के आंदोलन उतने नहीं हैं, जितने कि दलित व अन्य पिछड़ों के लिए आरक्षण के विरोध के आंदोलन हैं। इसी में इन आंदोलनों की विस्फोटक क्षमता छुपी हुई है। बड़े पैमाने पर इन अंदोलनों का उठना इसका जीता-जागता सबूत है कि सबके विकास का नरेंद्र मोदी का वादा, अपेक्षाकृत समर्थ सामाजिक समुदायों तक को अच्छे दिन आने का भरोसा दिलाने में असमर्थ रहा है और वास्तव में हालात उन्हें आंदोलन के रास्ते पर धकेल रहे हैं।

यह भी पढ़ें –अच्छे दिन : छत्तीसगढ़ में 17 हजार लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर, एक लाख लोगों पर 21 नर्स

इसी संकट की अभिव्यक्ति के तौर पर समाज के दूसरे छोर पर, रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या से लेकर, गुजरात में उना के दलित उत्पीडऩ कांड तक के प्रसंगों में, अनुसूचित जातियों की अकल्पनीय रूप से बड़ी तथा लड़ाकू गोलबंदियां सामने आयी हैं।

एक और सिरे पर बढ़ते मौजूदा संकट के खिलाफ और बहुत बार सरकार की ही नीतियों व कदमों के खिलाफ, विभिन्न स्तरों पर मजदूरों तथा अन्य मेहनतकशों की गोलबंदियां भी उतनी ही उल्लेखनीय हैं।

यह भी पढ़ें –मोदी का नया भारत : कितना नया, कितना पुराना और कितना जुमला

यह सब अगर तीन साल बाद भी मोदी सरकार के खिलाफ एक सुसंगत पुकार का रूप नहीं ले पाया है, तो इसके लिए विपक्ष की कमजोरी तथा विफलता जितनी जिम्मेदार है, उतनी ही अपने गिर्द के वास्तविक हालात से लोगों का ध्यान बंटाने में सरकार की और उससे बढक़र भाजपा-आरएसएस की कामयाबी जिम्मेदार है।

 उत्तर प्रदेश के चुनाव में विकास के नारे के साथ, एक ओर श्मशान बनाम कब्रिस्तान की दुहाई तथा दूसरी ओर जाटव तथा यादवविरोधी जातीय गोलबंदी का योग, न तो कोई संयोग था और न अपवाद।

अच्छे दिन :  विप्रो ने एक झटके में 600 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया

आरएसएस के नेतृत्व में भाजपा के लिए बड़े सचेत रूप से ऐसा सामाजिक आधार खड़ा किया जा रहा है अपने स्वभाव में ही अल्पसंख्यकविरोधी है और निचली जातियों के अपेक्षाकृत सबल हिस्सों का भी विरोधी है, जिनसे ऊंची जातियों के वर्चस्व के लिए खतरा पैदा होता है। हिंदुत्व की अल्पसंख्यकविरोधी तथा सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से प्रतिगामी मुहिम, इसका मुख्य हथियार है। यह मुहिम बहुसंख्यकों की बढ़ती सांप्रदायिक तथा सवर्ण वर्चस्ववादी गोलबंदी के जरिए, अपने हितों के वास्तविक मुद्दों पर आम लोगों की आवाज को कमजोर करने तथा निष्प्रभावी बनाने का काम करती है। मीडिया पर और खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया पर कसता शिकंजा, इस गोलबंदी के प्रसार का काम करता है। और पड़ोसी देशों, खासतौर पर पाकिस्तान से लेकर, घरेलू तौर पर कश्मीर तक के मामले में छाती ठोकू राष्ट्रवाद, इस हिंदुत्ववादी मुहिम को किंचित सम्मानजनक चोगा ओढ़ाने का काम करता है।

यह भी पढ़ें –अच्छे दिन : 2014 के बाद भारत सरकार ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में भारी कटौती कर दी

अचरज नहीं कि मोदी के राज के तीन साल सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, नेपाल से लेकर श्रीलंका व चीन तक, आम तौर पर निकट पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों के रसातल में जा लगने के साल हैं। और कश्मीर को तो खैर तीस साल पीछे धकेल ही दिया गया है। अंधाधुंध भगवाकरण की कोशिश में तमाम संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है और विज्ञान समेत विभिन्न क्षेत्रों की उच्च शिक्षा संस्थाओं की प्रतिष्ठï गिराकर, दुनिया की नजरों में उन्हें हंसी का पात्र बना दिया गया है।

यह भी पढ़ें –गिद्ध की नजर हमेशा मरघट पर गढ़ी रहती है – अच्छे दिनों के वादे से बड़ा झूठ मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि

आइसीएसएसआर के नये अध्यक्ष की नियुक्ति और अब ‘‘उत्तम संतति’’ के लिए ‘‘गर्भ विज्ञान संस्कार’’ को बढ़ावा, भारतीय मेधा की हंसी उड़वाने के ताजातरीन बहाने हैं। इसी सब को छुपाने के लिए प्रचार की आंधी का शोर चाहिए और पिछले साल से ज्यादा शोर चाहिए। और चूंकि मोदी सरकार चौतरफा संकट बढ़ाने वाले विकास के नवउदारवादी रास्ते पर ही और तेजी से बढऩे जा रही है, हिंदुत्ववाद के रास्ते से जनता के असंतोष को दिशाहारा बनाने की और इसलिए, प्रचार के शोर की भी उसे अगले साल और ज्यादा जरूरत पड़ेगी। मोदी की भाजपा बढ़ते शोर से सच को छुपाने के इसी रास्ते पर चलने के लिए अभिशप्त है। यह दूसरी बात है कि यह प्रचार के शोर का पर्दा भी सच को हमेशा तो छुपाए नहीं सकता है।                                         

 

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: