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मोदी सरकार के तीन साल : प्रजातंत्र सिकुड़ रहा, मीडिया नहीं रहा प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ

राम पुनियानी

इस 26 मई को मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर विभिन्न शहरों में ‘मोदी फैस्ट’ के अंतर्गत धूमधाम से बड़े-बड़े समारोह आयोजित किए गए। इन समारोहों से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश समृद्धि की राह पर तेज़ी से अग्रसर हुआ है और कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल हुई हैं। मोदी को उनके प्रशंसक, ‘गरीबों का मसीहा’ बताते हैं। कई टीवी चैनलों और टिप्पणीकारों ने उनकी शान में कसीदे काढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

असल में पिछले तीन सालों में क्या हुआ है?

एक चीज़ जो बहुत स्पष्ट है, वह यह है कि मोदी सरकार में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है।

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यह तो सभी को स्वीकार करना होगा कि यह सरकार अपनी छवि का निर्माण करने में बहुत माहिर है। नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोज़गार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली में किए गए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन को सरकार के पिछलग्गू मीडिया ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का भी हुआ।

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विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रूपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है। पहले राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया और अब पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है और मुसलमानों के एक बड़े तबके की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी गई है।

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सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रूख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्यों के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र, अपराधियों को सज़ा दिलवाने की बजाए, पीड़ितों को ही परेशान कर रहा है।

सामाजिक स्तर पर पहचान के मुद्दे छाए हुए हैं। पिछली यूपीए सरकार भी अपनी सफलताओं का बखान करती थी परंतु कम से कम यह बखान लोगों के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार संबंधी अधिकारों पर केन्द्रित था। अब तो चारों ओर झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है।

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पाकिस्तान के मुद्दे पर सरकार जब चाहे तब आंखे तरेरती रहती है। सीमा पर रोज़ भारतीय सैनिक मारे जा रहे हैं परंतु आत्ममुग्ध सरकार, सर्जिकल स्ट्राईक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़कों के अलावा अब लड़कियां भी सड़कों पर निकलकर पत्थर फेंक रही हैं। कश्मीर के लोगों की वास्तविक समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। उनसे संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।

हिन्दुत्ववादी देश पर छा गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र का लगभग भगवाकरण हो गया है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर गंभीर हमले हुए हैं। ‘पारंपरिक ज्ञान’ को वैज्ञानिक सिद्धांतों पर तवज्ज़ो दी जा रही है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया जा रहा है। यहां भी अतीत का महिमामंडन करने के लिए केवल ब्राह्मणवादी प्रतीकों जैसे गीता, संस्कृत और कर्मकांड को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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दिखावटी देशभक्ति का बोलबाला हो गया है। पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने यह प्रस्तावित किया था कि हर विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक बहुत ऊँचा खंबा गाड़ कर उस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए। हर सिनेमा हॉल में फिल्म के प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान बजाया जाना अनिवार्य कर दिया गया है। एक अन्य स्वनियुक्त देशभक्त ने यह प्रस्तावित किया है कि हर विश्वविद्यालय में ‘देशभक्ति की दीवार’ हो, जिस पर सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र उकेरे जाएं। समाज के सभी वर्गों का देश की उन्नति में योगदान होता है परंतु प्रचार ऐसा किया जा रहा है, मानो केवल सेना ही देश की सबसे बड़ी सेवा कर रही हो। जो किसान खेतों में काम कर रहे हैं और जो मज़दूर कारखानों में खट रहे हैं, क्या उनकी सेवाओं का कोई महत्व ही नहीं है? लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। यह सरकार केवल जय जवान का उद्घोष कर रही है और किसान को विस्मृत कर दिया गया है।

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देश में प्रजातंत्र सिकुड़ रहा है और बोलने की आज़ादी पर तीखे हमले हो रहे हैं। मीडिया का एक बड़ा तबका शासक दल के साथ हो लिया है और वह उन सब लोगों की आलोचना करता है, जो सरकार की नीतियों के विरोधी हैं। मीडिया ने प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ और सरकार के प्रहरी होने की अपनी भूमिका को भुला दिया है। दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या के साथ देश में असहिष्णुता का जो वातावरण बनना शुरू हुआ था, वह और गहरा हुआ है। मुसलमानों के खिलाफ तो ज़हर उगला ही जा रहा है, दलित भी निशाने पर हैं।

आज देश में जिस तरह का माहौल बन गया है, उसे देखकर यह अहसास होता है कि केवल प्रचार के ज़रिए क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया गया है कि मोदी सरकार देश का न भूतो न भविष्यति विकास कर रही है और आम लोगों का भला हो रहा है।

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परंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई हिस्सों में लोगों ने अपने विरोध, असंतोष और आक्रोष का जबरदस्त प्रदर्शन भी किया है। किसानों के एकजुट हो जाने के कारण, मजबूर होकर, सरकार को अपना भूसुधार विधेयक वापस लेना पड़ा। कन्हैया कुमार, रामजस कॉलेज, रोहत वेम्युला और ऊना के मुद्दों पर जिस तरह देश में वितृष्णा और आक्रोष की एक लहर दौड़ी, उससे यह साफ है कि सरकार की प्रतिगामी नीतियों को चुनौती देने वालों की संख्या कम नहीं है। जहां हिन्दुत्ववादी तत्वों का स्वर ऊँचा, और ऊँचा होता जा रहा है, वहीं देश भर में चल रहे कई अभियानों और आंदोलनों से यह आशा जागती है कि भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित बहुवादी समाज के निर्माण के स्वप्न को हमें तिलांजलि देने की आवश्यकता नहीं है।

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 (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

 (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

 

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