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मनोरंजन व शिक्षा दोनों में संतुलन बना कर चलती है Toilet एक प्रेमकथा

 

Toilet एक प्रेमकथा (फिल्म समीक्षा)

अलका रानी श्रीवास्तव

Toilet एक प्रेमकथा ऐसी फिल्म है जो मनोरंजकता के माध्यम से ही आगे बढ़ती है और साथ ही समाज को सोचने पर मजबूर करती है कि समाज जिन रूढ़ियों, विचारों को लेकर जी रहा है वो कितनी खोखली हैं। स्त्री को एक ओर तो पर्दे में रखा जाता है, लेकिन सिर्फ सिर ढकने तक, मुंह ढंकने तक। स्त्री को ढंक के रखने के हिमायती समाज को तब लज्जा नहीं आती जब कितनी ही निगाहों का सामना करती हुई स्त्री बाहर अंधेरे में शौच के लिये जाती है। घर में पंडिताई निभाते हैं, लेकिन खुद कहीं भी नाली में लघुशंका त्यागते हुये बेशर्म रहते हैं। यह फिल्म इस विडम्बना पर हंसती है कि मांगलिक दोष का निवारण एक पशु के साथ विवाह से हो सकता है। एक पशु घर के आंगन में गोबर कर सकता है लेकिन घर की इज्जत, बहू के लिये घर में शौच की जगह नहीं।

फिल्म का कथानक प्रेम से शुरू होकर विवाह के बाद घर आई बहू की शौच के लिये बाहर जाने से उत्पन्न परेशानियों से आगे बढ़ती है। उसका पति अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता है कि उसकी पत्नी को तकलीफ न हो और उनका विवाह बना रहे। यहां तक कि उसने रेलगाड़ी तक में शौच के लिये उसे ले जाने का निर्णय लिया और यहीं से फिल्म नया मोड़ लेती है। रेलगाड़ी के टॉयलेट के दरवाजे के पास सामान लदा होने से दरवाजा खुल नहीं पाता और उसकी ट्रेन छूट जाती है। केशव बहुत दूर तक जया को पुकारता रहता है लेकिन वो आधुनिक लड़की तब तक निर्णय कर चुकी थी कि जब तक घर में शौचालय नहीं बनता वो वापस नहीं आएगी।

केशव बहुत कोशिश करता है कि इस समस्या का कोई हल निकले। पंचायत में गुहार लगाता है, लेकिन रूढ़ियों से बंधे गांव वाले उसका विरोध ही करते रहते हैं। तब गांव का प्रधान सरकारी योजनाओं में शौचालय निर्माण जैसी योजनाओं की बात बताता है। सरकारी विभागों के कमजोर रवैये के कारण यहां भी सफलता नहीं मिलती और अंत में केशव स्वयं ही घर में शौचालय निर्माण का फैसला करता है, और बनाता भी है, परन्तु उसका पिता पंडितवाद दिखाते हुये उसे तुड़वा देता है। अंत में जया तलाक का निर्णय ले लेती है।

परिस्थितियां व्यक्ति में बदलाव लाती हैं। केशव की दादी सीढ़ियों से गिर जाती है और मजबूरन उसे उसी TOILET में जाना पड़ता है, जो केशव ने बनवाया था और यही कारण बनता है कि पंडित जी का हृदय परिवर्तन हो जाता है।

केशव व जया के तलाक का मामला मीडिया इतना उछालता है कि सरकारी विभाग को भी मुस्तैद होना पड़ता है और केशव की अर्जी मंजूर हो जाती है। कोर्ट में जब जया-केशव तलाक के लिये पहुंचे तभी उनकी अर्जी की मंजूरी की फाइल भी पहुंची और तलाक रूक गया। कोर्ट में ही पंडित जी भी बहू को वापस ले जाने के लिये आते हैं और इस प्रकार फिल्म समाप्त होती है।

निर्देशक श्री नारायण सिंह ने फिल्म के जरिये समाज को आइना दिखाने की कोशिश की है, लेकिन कोरा उपदेशवाद के बजाय फिल्म हास्य व्यंग्य जनित मनोरंजन, नाटकीयता और स्वाभाविक फिल्मांकन के जरिये जहां संदेश देने में भी कामयाब रहती है, वहीं बांधे भी रहती है। अंधविश्वासी ग्रामीणों, आलसी प्रशासन व भ्रष्ट नेताओं की पूरी पोल खोलते हुये समाज की विद्रूपताओं को दिखाती चलती है।

पूरी फिल्म अक्षय कुमार के कंधों पर है। अक्षय ने पिछले कुछ समय से अपनी फिल्मों के माध्यम से एक साधारण इंसान को अभिव्यक्त करने की छवि निर्माण किया है, जो मासूमियत, सहज, हास्य और लड़ाकू प्रवृत्ति का मिला-जुला व्यक्तित्व है।

दोनों के मध्य जो प्रेम है, उसे हास्य बोध के साथ ही दर्शाया गया है, जो कि मध्यवर्गीय चेतना और ग्रामीण परिवेश में मेल भी खाता है। बाद में पति-पत्नी के बीच के रिश्ते को भी भारतीय परिवेश के अनुसार सहयोग और सामंजस्य के आधार पर ही दिखाया गया है। तलाक का मसला उठना भी इसी परिवेश में रखा गया है न कि कोई ठोस मतभेद के आधार पर। भूमिका भी जया के किरदार को प्रामाणिकता के साथ व्यक्त कर पाती है।

2 घंटा 35 मिनट की फिल्म एक्टिंग, हास्य, गम्भीरता, संवाद, सभी बिन्दुओं पर सशक्त है। पूरी फिल्म दर्शकों को बांधे रखती है। फिल्म का संगीत अलग से थोपा नहीं लगता। ये फिल्म मनोरंजन व शिक्षा दोनों में संतुलन बना कर चलती है। हंस मत पगली, गोरी तू लठ मार जैसे गाने अच्छे हैं। अगर बीवी चाहिये, तो घर में संडास चाहिये और लोगों ने मोहब्बत के लिये ताजमहल तक बनवा दिया और हम एक शौचालय तक न बनवा सके।

 

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