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मुसलमानों को जेएनयू या कश्मीर पर बयान नहीं देना चाहिए, पुलिस से ज्यादा भय गोरक्षकों का है

बहुसंख्यक तुष्टीकरण सब सरकारों की नीति रही है, चाहे हिंदुत्व की हिंदू सरकार हो या धर्मनिरपेक्ष हिंदू सरकार

बेतरतीब 15

ईश मिश्र

पहली बार विवि गेस्टहाउस की बजाय इलाहाबाद में होटल में रुका। पारिवारिक कार्यक्रम (भतीजी की शादी) इमा (बेटी) और सरोजजी (पत्नी) के साथ कल आया। आज मैं 62 साल का हो गया। सरोजजी और इमा मेंहदी के रिवाज के लिए रुके हैं, मैं कमरे पर आ गया और सोचा यह जन्मदिन सिर्फ अपने साथ बिताऊं,  अपने एकांत (सॉलीच्यूड) में। सोचा कुछ लिखूं, लेकिन मन में आया कि ऐसे ही, निरर्थक गलियों-सड़कों पर घूमूं, शहर की नब्ज़ महसूस करूं, जैसा 45 साल पहले करता था, जब 17 साल पहले यहां इवि में पढ़ने आया। इलाहाबाद प्रवास के 4 सालों में याद करने लायक कोई घटना-परिघटना याद ही नहीं। तर्कशील दिमाग तो बचपन से ही था लेकिन एक्सपोजर के अभाव में ज्ञान सीमित था। इतिहासबोध तथ्यपरक कम कही-सुनी पर आधारित ज्यादा। नास्तिक बनने के बाद अनजाने में सांप्रदायिक बन गया, खैर जल्दी ही सांप्रदायिकता का राजनैतिक अर्थशास्त्र समझ में आने लगा और सोच ऐतिहासिक भौतिकवादी बनने लगी। इन सब पर फिर कभी, क्योंकि अतीत दुबारा नहीं जिया जा सकता, जिए अतीत का मूल्यांकन किया जा सकता है, जो फिर कभी।

सिर्फ सिविल लाइंस वैसी ही है बस कई ऊंची-ऊंची बिल्डिंग्स बन गयी हैं और बहुत सारे होटल बन गए, मॉल और बिगबजार। पटरी पर चाय और पान की दुकानों में इजाफा। साइकिल रिक्शा की जगह ई-रिक्शा ने ले लिया है, साइकिल रिक्शा भी चलते हैं क्योंकि अतीत के अवशेष भविष्य में काफी दिन तक घिसटते रहते हैं।

 कल दोपहर साकेत होटल से निकलकर कॉफी हाउस चला गया। सिविल लाइंस की ऐतिहासिकता अब भी शहर के अतीत को ज़िंदा रखने की नामुमकिन कोशिस करता दिखता है। इस कॉफी हाउस में बहुत अड्डेबाजी की है घंटों-घंटों, लेकिन लगता है कि सारी बहसें साधारण, समकालिक और परिप्रेक्ष्यविहीन होती थीं, इसलिए न तो मुद्दे याद हैं। बातें सब राजनैतिक ही होतीं थीं।

खैर जो बात लिखने के लिए कॉफी हाउस का जिक्र कर रहा हूं वह मुल्क के माहौल में फासीवादी हवा की बात कर रहा हूं। मैं किनारे की कतार की खाली मेजों में से एक पर बैठ वेटर की प्रतीक्षा में अतीत की यादों को खंगालने लगा कि कॉफी के प्यालों में हमने कितनी चम्मच क्रांतियां की थी और सिगरेट के धुंए हरकारे बन कॉफी हाउस जीतने का ऐलान करते। तभी देखा कि बिल्डिंग बेमरम्मत जरूर थी लेकिन बैरों की वर्दियां वैसे ही चुस्त-दुरुस्त। कुकुरमुत्तों की तरह तरबीब से उगे मॉलों और होटलों,  मल्टीप्लेक्सों के बीच इंडियन कॉफी हाउस भी साइकिल रिक्शा की तरह भविष्य में अतीत की याद बरकरार रखने की कोशिस करता लगा। नेमप्लेट लगाए एक वेटर मुस्कराते हुए पास आकर खड़ा हुआ, काली कॉफी का ऑर्डर देकर कुछ पूछता कि कॉफी हाउस में बैठे लोगों पर ध्यान गया नवजवान कोई नहीं। शाम जैसे जैसे करीब आ रही थी, धीरे-धीरे कॉफी हाउस में कनिष्ठ और वरिष्ठ बुजुर्गों से आबाद होने लगा। लगा, कुर्ता-जीन्स वाला जमाना अब इतिहास बन चुका है।

     तभी एक सौम्य सी शक्ल-सूरत के एक सज्जन दाखिल हुए और उनकी निगाह मुझ पर पड़ी, मुझे लगा उम्र में मुझसे छोटे होंगे लेकिन पता चला कि वे शिक्षा विभाग से कई साल पहले रिटायर हो चुके थे और 1966 में इवि से अंग्रेजी में एमए कर लिया था यानि लगभग 73-75 साल के होंगे। 3-4 मिनट एक अलग मेज पर बैठकर मेरे पास गए और मजाकिया लहजे में मुझसे पूछा कि मैं किसी गोदो का इंतजार तो नहीं कर रहा था। उन्होंने मुझे इस कॉफी हाउस का अजनबी समझा। हम लोगों ने अलग-अलग समय इवि के स्टूडेंट के रूप में परिचय किया और अपने अपने महान प्रोफेसरों की बातें करने लगे। उनकी फेहरिस्त लंबी थी।

फिराक़ रिटायर हो गए थे फिर भी गेस्ट लेक्चर्स के लिए आते थे, मेरे पास ले-देकर शिक्षकों की महानता की सूची में बनवारीलाल शर्मा थे।

खैर फुटनोट लंबा होता जा रहा है, उनका नाम नसीम है और जब उनके समूह के लोग आ गए, जाते वक्त मेरे साथ थोड़ा समय बिताने का आभार व्यक्त कर उनसे हाथ मिलाया। फिर उन्होंने अपने ग्रुप में बात कर मुझे अपनी मेज पर बुला लिया।

उस ग्रुप में सबसे उम्रदराज रिजवी साहब थे जो 1955-59 में इवि में पढ़ाई किए थे। इस बीच हाथ में कलावा बांधे कुछ लोग और शरीक हुए। मैंने अपने को फिर आश्वस्त किया कि धार्मिकता का सांप्रदायिकता से साधा संबंध नहीं है, हां धार्मिकता और उससे जुड़ी सवालों से परे आस्था, सांप्रदायिकता की रोटी-पानी है।

बातचीत में राजनीति, गोरक्षा और मोदी-योगी राज के उपद्रव की बात चली तो रिजवी साहब नाराज हो गए और बोले तमाम मुद्दे हैं, 2-2 क्रिकेट मैच हो रहे हैं वगैरह वगैरह। 

परवेज साहब ने पूछा यह गोरक्षा अभियान कब तक चलेगा? मैंने कहा जब तक गोभक्तों के दिमाग में गोमाता का पवित्र गोबर भरा रहेगा। मना करने पर भी हम ज्ञान-शिक्षाके अंतरविरोधों और गोरक्षकी राष्ट्रवाद पर बात-चीत करते रहे।

रिजवी साहब थोड़ा दूर जाकर बैठ गए। वैसे यह कहने पर कि आप डर गए हैं, वापस अपनी सीट पर आते हुए (शायद खिसियाहट मिटाने के लिए, मैं गलत भी हो सकता हूं) बकैती के लहजे में बोले कि उन्होंने डरना सीखा ही नहीं, बस सियासत पर बात नहीं करना चाहिए। सियासत से परे कुछ है ही नहीं, न कला, न संस्कृति। हर बात में किसी-न-किसी रास्ते सियासत घुस ही आती है।

वैसे बिना राय दिए रिजवी साहब हमारे विमर्श में शरीक थे और, मुझे लगा, मन-ही-मन आश्वस्त हो रहे थे। बीच-बीच में अपने छात्र जीवन के कुछ उपाख्यान (अनेक्डॉट) सुना देते थे।

तभी मुझे 7-8 महीने पहले परवेज (करारी) से बात-चीत याद आ गयी। पिछले 35-36 साल की जान-पहचान में मुझे वह किसी बात से डरने वाला नहीं लगा। एकाएक वह डरने लगा है और अकेले के लिए नहीं, सारे मुसलमानों के लिए, ऐसे जैसे भांति-भांति के मुसलमानों का कोई एक समरस समुच्चय हो जो किसी हिंदुओं के कल्पितल समरस (होमोजीनियस) समुच्चय का अंतरविरोधी हो? भिन्नताओं को छोटे-बड़े या परस्पर-विरोधी अर्थों में परिभाषित कर, गोल-मटोल तर्कों से उसी परिभाषा से भिन्नता को असमानता साबित करना, हर तरह की गैरबराबरी के पैरोकारों की ऐतिहासिक चाल रही है। इलाहाबाद में ही रहता है और काफी हद तक कॉफीहाउसी भी है।

परवेज और मेरे मित्र, उसके बड़े भाई प्रो. अली जावेद(दिवि) तथा जफर-कमर आगा पत्रकार बंधुओं को वे सब जानते थे।

मौजूदा कश्मीर आंदोलन के शुरुआती दिनों की बात है। परवेज किसी बात से नहीं डरता, लेकिन उस समय डरा हुआ था। वह इस लिए डरा हुआ था कि उसका नाम अजादार अब्बास रिजवी है। कश्मीर में पत्थर-बनाम-पैलेट की लड़ाई चरम पर थी। मैंने एक लेख में कश्मीर और हरयाणा जाट आंदोलनों से निपटने के दोहरे मानदंड का ज़िक्र किया था जिस पर मुझे ऑन-ऑफ लाइन बहुत गालियां/धमकियां मिली थीं। मिलते ही परवेज ने उस लेख के हवाले सावधानी बरतने की हिदायत दी कि दिन बुरे हैं। जब बात डर-डर के जीने की व्यर्थता पर बात तो बोला, ‘ठीक है तुम लिख-बोल सकते हो लेकिन भाईजान को इस वक्त कश्मीर पर नहीं बोलना चाहिए’। यानि मुसलमान नाम के किसी को भी कश्मीर पर नहीं बोलना चाहिए?

कश्मीर पर प्रो. गिलानी के प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए प्रेस क्लब का हॉल बुक करने के लिए दो दिन प्रो. अली जावेद को संसद मार्ग थाने बुलाकर बैठाए रखा गया था।

परवेज ने पूरी संजीदगी से जोर देकर दुबारा कहा था कि मुसलमानों को जेएनयू या कश्मीर पर बयान नहीं देना चाहिए, पुलिस से ज्यादा भय गोरक्षकों का है।

मैंने उससे पूछा कि फिर तो कश्मीर आदि मुद्दों पर अनिर्बन को बोलना चाहिए, उमर को नहीं?

उसका जवाब सकारात्मक था।

यही तो ये दक्षिणपंथी, अतिवादी चाहते हैं कि डर डर कर रहो, सिर झुका कर जियो। क्रांतिकारी न डरना जानता है, न झुकना जानता है न टूटना, वह लड़ता-बढ़ता है। एक फिक्रमंद जेएनयूआइट होने के नाते जहां भी जाता हूं और सोसल मीडिया पर लोग मुझसे उमर खालिद के ‘देशद्रोह’ का हिसाब मांगते हैं. मैं उनसे कहता हूं कि उमर और अनिर्बन, दोनों ही उदीयमान इतिहासकार मेरे अजीज हैं और सरकार ने दोनों पर एक से ही आरोप लगाए; दोनों साथ-साथ बंद थे; दोनों ही नास्तिक हैं तथा सभी मुद्दों पर लगभग एक सी राय रखते हैं एवं एक से वाचाल हैं, आप मुझसे अनिर्बन के ‘देशद्रोह’ का हिसाब क्यों नहीं मांगते, उमर का ही क्यों?

परवेज से बात करते समय बटला हाउस कांड याद आया। हम पीयूडीआर और जनहस्तक्षेप की फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य के रूप में जिस भी मुसनमान नामा साथी से बात की, सब बोलने में ‘सावधानी’ बरत रहे थे और सरकार मनमोहन की थी। यहां बहुसंख्यक तुष्टीकरण सब सरकारों की नीति रही है, चाहे हिंदुत्व की हिंदू सरकार हो या धर्मनिरपेक्ष हिंदू सरकार

एक दिन एक सरकारी अधिकारी मित्र, अनिल विल्सन ने मजाक में कहा था “यार सोच रहा हूं कि विलसन की जगह वालसन लिखना शुरू कर दूं”।

खैर मज़ाक की बात और, यह काफी चिंताजनक सरोकार का विषय है।

क्या वाकई हम सावरकर के हिंदू राष्ट्र के सपने के साकार होने की प्रक्रिया के गवाह बन रहे हैं?

सावरकर के हिंदूराष्ट्र में अहिंदू (जिनकी पित्रृ व पवित्र भूमि हिंदुस्तान से बाहर हो, वैसे तो इस परिभाषा से उनके संघी चेले अहिंदू हो जाएंगे क्योंकि उनकी पवित्र भूमि जर्मनी में है) दोयम दर्जे के इंसान के रूप में रह सकते हैं, गोलवल्कर के हिदू राष्ट्र में वह भी नहीं, दीनदयाल के अनुसार, उनका ‘भारतीयकरण’ यानि हिंदुत्वकरण होगा, यानि व्यंजना में कहें भारत में ग़र रहना है तो बंदे मातरम् कहना होगा।

कॉफीहाउस की चर्चा पर वापस आते हुए, अच्छा लगा कि रिज़वी साहब की बेरुखी के बावजूद गो-राष्ट्रवाद और क्रिकेट-राष्ट्रवाद पर रोचक विमर्श हुआ। धार्मिक अल्पसंख्यकों के मन में ऐसा ख़ौफ पहले कभी नहीं था, यही हाल तर्कवादियों में खौफ का है। यह माहौल हिटलर की जर्मनी की याद दिलाता है और प्रकाश करात कहते हैं कि यह फासीवाद नहीं है

मैं कहा करता हूं कि इतिहास की गाड़ी में रिवर्सगीयर नहीं होता, लेकिन गाड़ी यू टर्न ले सकती है। इतिहास की गाड़ी खतरनाक यू टर्न लेकर एक लंबी, अंधेरी टनल में है। कांवर यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले गूलर के पेड़ अपशकुन होने के नाते काट दिए जाएंगे, ऐसी राजाज्ञा जारी हुई है। आधुनिक राष्ट्र-राज्य का यह वीभत्सतम रूप है।

 

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