दहेज से राजनीतिक मकसद नहीं सधते तीन तलाक से सधते हैं

Triple Talaq ट्रिपल तलाक तीन तलाक

तीन तलाक के बहाने कुछ बातें

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने गुरुवार से ऐतिहासिक सुनवाई शुरू की है। अदालत ने कहा कि वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या तीन तलाक मुसलमानों के मूल अधिकार का हिस्सा है?

भारत के मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि वह यह भी देखेगी कि क्या तीन तलाक लागू किए जाने योग्य मूलभूत अधिकार का हिस्सा है? हालांकि, अदालत ने शुरुआत में ही साफ कर दिया कि वह बहुविवाह के मुद्दे पर विचार नहीं करेगी।

अदालत ने यह भी कहा है कि अगर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि तीन तलाक धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मौलिक अधिकार का हिस्सा है तो हम कोई दखल नहीं देंगे।

यह देखना रोचक है कि इस मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ के पांचों सदस्य- भारत के मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (ईसाई), जस्टिस आर एफ नरीमन (पारसी), जस्टिस यू यू ललित (हिंदू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) अलग-अलग धर्मों से आते हैं। यही भारतीय समाज और लोकतंत्र की खूबसूरती है, जो उसे बाकी देशों से विशिष्ट बनाती है।

बहरहाल, तीन तलाक का मसला एक बार फिर बहस के केंद्र में है और अब न्यायालय के विचाराधीन है।

बात निकली है, तो दूर तलक जाएगी ही और यह उम्मीद रखना चाहिए कि जो भी निर्णय सामने आएगा, वह महिलाओं के लिए हितकारी होगा।

इसमें कोई दो राय नहींहै कि तीन तलाक बोलकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने वाले पुरुषों ने न केवल महिलाओं पर अत्याचार किया है, बल्कि उन्हें अपमानित किया है, उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई है।

1986 में शाहबानो से लेकर अब सायराबानो तक कई महिलाएं इस अनाचार की शिकार हुई हैं। लेकिन यह देखकर दुख होता है कि ऐसे मुद्दे महिलाओं को न्याय दिलाने की मंशा रखने की जगह राजनीतिक लाभ लेने के साधन बन गए हैं।

1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित कर मोहम्मद खान बनाम शाहबानो मामले में सर्वोच्च अदालत द्वारा 23 अप्रैल, 1985 को दिए फैसले को पलट दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने तब अपने फैसले में कहा था कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125, जो परित्यक्त या तलाकशुदा महिला को पति से गुजारा भत्ता का हकदार कहता है, मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 और मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों में कोई विरोधाभास नहीं है। हालांकि तब मुस्लिम धर्मगुरुओं और कई मुस्लिम संगठनों ने अदालत के फैसले को शरिया में हस्तक्षेप कहकर इसका पुरजोर विरोध किया था और सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की थी।

राजीव गांधी को यह समझाने की कोशिशें की गईं कि यदि केंद्र सरकार शाहबानो मामले में हस्तक्षेप नहीं करती है तो पूरे देश में ऐसा संदेश जाएगा कि प्रधानमंत्री मुस्लिम समुदाय को अपना नहीं मानते। लिहाजा फैसले को पलटने के लिए सरकार तैयार हो गई।

पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने पिछले साल अपने एक लेख में लिखा था कि मौजूदा केंद्र सरकार में विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर ही थे, जिन्होंने शाहबानो मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलकर उन्हें अदालत का फैसला पलटवाने के लिए तैयार किया।

 

श्री हबीबुल्लाह उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में निदेशक के पद पर नियुक्त थे और अल्पसंख्यक मुद्दों को देखते थे।

श्री हबीबुल्लाह की इस बात से यह जाहिर होता है कि कैसे मुद्दों को धर्म से जोड़कर उनका राजनीतिकरण किया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो शाहबानो गुजारा भत्ता पाने से वंचित नहीं होती और न अब सायरा बानो अपने हक के लिए लड़तीं।

उत्तराखंड की रहने वाली सायरा बानो को उनके पति ने 2015 में तलाक दिया था, जिसके बाद उन पर दो बच्चों को पालने की जिम्मेदारी आ गई। पिछले साल उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव, एकतरफा तलाक और पहले निकाह के रहते हुए मुस्लिम पुरुषों के दूसरा निकाह करने के मुद्दे पर अदालत से विचार करने को कहा है।

सायराबानो ने पिछले साल याचिका दायर की थी, लेकिन पिछले दिनों चुनावों के वक्त भाजपा ने तीन तलाक के मुद्दे को खूब बढ़ाया। अब टीवी चैनल भी इस मुहिम में साथ आ गए हैं। रोजाना किश्त दर किश्त खबरें पेश की जा रही हैं कि कैसे तीन तलाक के कारण महिलाएं प्रताड़ित हुईं।

अच्छी बात है कि इससे जागरूकता आएगी। लेकिन क्या प्रताड़ना की शिकार केवल मुस्लिम महिलाएं होती हैं? क्या हिंदुओं में स्त्रियों के साथ खूब सम्मान का व्यवहार होता है?

अगर चैनलों में दहेज प्रकरणों पर खबरें आना शुरु होंगी तो शायद 24 घंटे भी कम पड़ेंगे। लेकिन क्यों कभी किसी राजनीतिक दल ने, नेता ने, चैनल ने दहेज को तीन तलाक जैसा बड़ा मुद्दा नहीं बनाया? क्या इसलिए कि दहेज किसी धर्म से जुड़ा मामला नहीं है। दहेज पर तो कानून भी बना है, उसका खुलेआम उल्लंघन होता है। लेकिन अब तक किसी चुनावी घोषणापत्र में, चुनावी रैली में किसी नेता ने यह नहींकहा कि हम दहेज पर सख्ती से प्रतिबंध लगाएंगे।

दहेज से राजनीतिक मकसद नहीं सधते हैं, तीन तलाक से सधते हैं, शायद राजनीतिक दलों का यही नजरिया है।

इस वक्त बहुत सी मुस्लिम महिलाओं ने अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई है, उनका साथ अन्य महिलाओं को भी देना चाहिए और न केवल तीन तलाक या दहेज, बल्कि हर तरह के अत्याचार के विरूद्ध उठ खड़ा होना चाहिए। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन ये मुद्दे राजनीति के लिए सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल नहीं होंगे और सच में महिला सशक्तिकरण होगा।

देशबन्धु का संपादकीय

 

 

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