ओशन एंड आइस : खतरा, इस सदी के अंत तक पिघल जाएगा हिन्दू कुश हिमालय के ग्लेशियर का दो तिहाई हिस्‍सा

नई दिल्ली, 26 सितंबर 2019. इस सदी के अंत तक एशिया के ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में स्थित ग्लेशियर्स का करीब 64 फीसद हिस्सा पिघल जाएगा, लेकिन अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सका तो यह नुकसान करीब 36 प्रतिशत तक ही सीमित रहेगा, जो एशिया महाद्वीप के …
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ओशन एंड आइस : खतरा, इस सदी के अंत तक पिघल जाएगा हिन्दू कुश हिमालय के ग्लेशियर का दो तिहाई हिस्‍सा

नई दिल्ली, 26 सितंबर 2019. इस सदी के अंत तक एशिया के ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में स्थित ग्‍लेशियर्स का करीब 64 फीसद हिस्‍सा पिघल जाएगा, लेकिन अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सका तो यह नुकसान करीब 36 प्रतिशत तक ही सीमित रहेगा, जो एशिया महाद्वीप के लिये जल सुरक्षा के लिहाज से बड़ा फर्क पैदा करेगा। यह जानकारी यूएन क्‍लाइमेट एक्‍शन समिट के समापन के एक दिन बाद (25 सितम्‍बर  दोपहर 1:30 बजे) दोपहर में जारी आईपीसीसी की महासागर और क्रायोस्‍फेयर क्षेत्रों पर ध्‍यान केन्द्रित करते हुए- ओशन एंड आइस (IPCC report focusing on ocean and cryosphere areas – Ocean and Ice) नामक रिपोर्ट में उजागर हुई।

एशिया पर पड़ेगा जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव – Asia will have the most impact of climate change

इस रिपोर्ट के मुताबिक एशिया जलवायु परिवर्तन के कई बड़े प्रभावों के अभूतपूर्व दबावों का सामना करेगा। इनमें जल सुरक्षा में कमी, खाद्य उत्‍पादन और खाद्य सुरक्षा पर मंडराते जोखिम, तटीय और सामुद्रिक तंत्रों पर बढ़ता दबाव और बाढ़ तथा नदी के प्रवाह पर असर का कारण बनने वाली चरम मौसमी स्थितियों की तीव्रता में वृद्धि शामिल हैं। इनसे खेती का मिजाज अप्रत्‍याशित हो जाएगा।

ग्लेशियर पिघलने का भारत पर प्रभाव : Impact of glacier melting on India :

  • हिन्दू कुश हिमालय क्षेत्र में स्थित ग्‍लेशियर इस इलाके के रहने वाले 24 करोड़ लोगों को पानी की आपूर्ति करने में बेहद महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें 8 करोड़ 60 लाख भारतीय भी शामिल हैं।

मोटे तौर पर देखें तो यह आबादी भारत के पांच सबसे बड़े शहरों की जनसंख्‍या के बराबर है।

हिमालय के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित लाहौल-स्‍पीति जैसे ग्‍लेशियर 21वीं सदी के शुरू से ही पिघल रहे हैं और अगर इनमें कमी नहीं आयी तो हिन्दू कुश हिमालय के ग्‍लेशियर्स का दो तिहाई हिस्‍सा पिघल जाएगा।

  • भारतीय समुद्रों में कोरल रीफ प्रणालियां, मन्‍नार की खाड़ी, कच्‍छ की खाड़ी और अंडमान तथा लक्षयद्वीप के समुद्र पानी के गर्म होने और महासागरों के अम्‍लीय होने के कारण गम्‍भीर दबावों का सामना कर रहे हैं। वर्ष 1989 से भारत के कोरल रीफ को बड़े पैमाने पर ब्‍लीचिंग की 29 घटनाओं का सामना करना पड़ा है और वर्ष 1991-2011 के बीच हिन्‍द महासागर के पीएच यानी अम्लीयता में वैश्विक स्‍तर में सबसे ज्‍यादा गिरावट आयी है। इसका समुद्री मत्‍स्‍य प्रजातियों पर गहरा असर पड़ा है क्‍योंकि कोरल रीफ( मूंगे की चट्टानें) भारत में कुल सामुद्रिक मत्‍स्‍य उत्‍पादन में 25 प्रतिशत का योगदान करता है।

देश की पोषण सम्‍बन्‍धी सुरक्षा, कम से कम 40 लाख लोगों की आमदनी और रोजगार तथा विदेशी विनिमय से होने वाली आय के लिहाज से समुद्री मत्‍स्‍य प्रजातियां बेहद महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वर्ष 2030 और 2040 के बीच लक्षद्वीप क्षेत्र में कोरल बनाने वाली रीफ के गायब हो जाने का अंदेशा है। वहीं, 2050 और 2060 के बीच भारत के अन्‍य समुद्री क्षेत्रों में भी यही हालात पैदा होने की आशंका है।

  • करीब 7517 किलोमीटर के तटीय क्षेत्रों वाले भारत को समुद्रों के बढ़ते जलस्‍तर के गम्‍भीर खतरों का सामना करना पड़ेगा। एक अध्‍ययन के मुताबिक अगर समुद्र का जलस्‍तर 50 सेंटीमीटर तक बढ़ता है तो भारत के छह तटीय शहरों- चेन्‍नई, कोच्चि, कोलकाता, मुम्‍बई, सूरत और विशाखापट्टनम में 2 करोड़ 86 लाख लोगों पर तटीय क्षेत्रों की बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। इससे करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की सम्‍पत्ति को भी नुकसान पहुंच सकता है। निम्‍नांकित नक्‍शे में भारत के उन क्षेत्रों को दिखाया गया है जो समुद्र के जलस्‍तर में बढ़ोत्तरी होने पर करीब एक मीटर नीचे होंगे (इसमें बाढ़ से बचाव के मौजूदा उपायों को शामिल नहीं किया गया है)।
  • उच्‍च वृद्धि के लिहाज से देखें तो भारत में निचले इलाकों में रहने वाली आबादी वर्ष 2000 में 6 करोड़ 40 लाख से बढ़कर 2060 में 21 करोड़ 60 लाख हो जाएगी। भविष्‍य में आबादी में होने वाली बढ़ोत्तरी और शहरी बसावट का दायरा बढ़ने से निचले क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों पर समुद्र जलस्‍तर में बढ़ोत्तरी और तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा सबसे ज्‍यादा होगा।
  • पिछले करीब 1000 साल में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना डेल्‍टा में बसे खासी आबादी वाले क्षेत्र हर साल 6 से 9 मिलीमीटर की दर से डूब रहे हैं। ऐसा सबसे ज्‍यादा तो कोलकाता में हुआ है। समुद्र का जलस्‍तर बढ़ने के कारण भूतल पर मौजूद पानी के खारा होने से पेयजल की आपूर्ति पर बुरा असर पड़ सकता है, साथ ही इस क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास कार्यों और आबादी में बढ़ोत्तरी से भूजल संसाधनों पर दबाव और भी बढ़ेगा। यह पाया गया है कि गंगा डेल्‍टा के खारेपन में बदलाव से हैजा फैलाने वाले बैक्‍टीरिया वाइब्रियो कॉलरा के विस्‍तार और खतरे की तीव्रता में बढ़ोत्तरी होगी।
  • जलवायु और भू-उपयोग के कारण अपस्‍ट्रीम में बदलाव की वजह से महानदी डेल्‍टा में जमा होने वाले तलछट में उल्‍लेखनीय गिरावट आने का अनुमान है। इससे हो सकता है कि डेल्‍टा समुद्र के जलस्‍तर के सापेक्ष अपनी मौजूदा ऊंचाई को बरकरार न रख सके। इससे पानी के खारेपन, कटान, बाढ़ के खतरे और अनुकूलन सम्‍बन्‍धी मांगों का खतरा बढ़ जाएगा।
  • मछली पकड़ने के मामले में भारत दुनिया में छठे स्‍थान पर है लेकिन एफओए के अनुमानों के मुताबिक अगले 30 सालों में भारत की मत्‍स्‍य आखेट क्षमता में 7-17 प्रतिशत की गिरावट आयेगी। अगर प्रदूषण में इसी तरह बढ़ोत्तरी जारी रही तो इस सदी के अंत तक भारत में मछली पकड़ने की क्षमता में 27 से 44 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।

अंतर्राष्‍ट्रीय संकट का भारत पर असर कैसे पड़ेगा :

भारत न सिर्फ अपनी सरहद के अंदर होने वाली गतिविधियों से प्रभावित होगा बल्कि बाहरी हलचलों का भी उस पर असर पड़ेगा। दुनिया के महासागरों, ध्रुवों और ग्‍लेशियरों पर होने वाली कुछ विनाशकारी घटनाओं के बेहद दूरगामी प्रभाव होंगे, जिनसे दुनिया का कोई भी देश बच नहीं सकेगा।

1.पहाड़ मीठे पानी को बर्फ के रूप में सहेजते हैं और वह बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर पहाड़ी क्षेत्रों और भौगोलिक रूप से सम्‍बद्ध अन्‍य इलाकों में रहने वाले लोगों को पानी मुहैया कराती है। जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है, ग्‍लेशियर पिघल रहे हैं और 21वीं सदी के दौरान एशिया, यूरोप, दक्षिणी अमेरिका और उत्‍तरी अमेरिका में ग्‍लेशियरों से होने वाली जलापूर्ति में गिरावट होने की आशंका है। एंडीज, क्विटो, लीमा और ला पाज खासतौर से खतरे के साये में हैं। हिन्दू कुश हिमालय क्षेत्र में स्थित ग्‍लेशियर इस विशाल इलाके में रहने वाले 24 करोड़ लोगों को जलापूर्ति करते हैं। यह क्षेत्र गंगा और यांगत्‍सी समेत उन 10 नदियों के जल का स्रोत भी है, जो 1.9 अरब लोगों को पानी उपलब्‍ध कराती हैं। मगर ये ग्‍लेशियर खात्‍मे की कगार पर हैं। अगर प्रदूषण में कमी नहीं लायी गयी तो वर्ष 2100 तक इस क्षेत्र के ग्‍लेशियर्स का दो-तिहाई हिस्‍सा पिघल जाएगा। इसका वैश्विक स्‍तर पर असर पड़ेगा।

  1. बड़े पैमाने पर कार्बन को खुद में समेटे पर्माफ्रॉस्‍ट और जमी हुई मिट्टी अब पिघल रही है और अगर प्रदूषणकारी तत्‍वों के उत्‍सर्जन में कमी नहीं की गयी तो इनके पिघलने की रफ्तार और बढ़ जाएगी। पर्माफ्रास्‍ट और जमी हुई मिट्टी के पिघलने से उसमें जमी रही कार्बन डाई ऑक्‍साइड और मीथेन फिजा में घुलेगी, जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा और भी बढ़ जाएगा। अगर प्रदूषण में कमी नहीं लायी गयी तो वर्ष 2100 तक कम से कम 30 प्रतिशत और अधिकतम लगभग सभी नियर सरफेस पर्माफ्रॉस्‍ट विलुप्‍त हो सकते हैं। पर्माफ्रॉस्‍ट के पिघलने से अगली सदियों के दौरान वातावरण में सैकड़ों अरब टन कार्बन घुल जाएगा।
  2. अंटार्कटिका और आर्कटिक में हो रहे बदलावों से वैश्विक स्‍तर पर जलवायु परिवर्तन में बढ़ोत्तरी का खतरा और बढ़ जाएगा। इन क्षेत्रों में जमी बर्फ की चादरें और जमा हुआ समुद्री जल भी सूरज की गर्मी को परावर्तन के जरिये वापस अंतरिक्ष में भेजकर धरती के तापमान को कम करने में मदद करते हैं। इस बर्फ को नुकसान पहुंचने से धरती की सतह का रंग गहरा हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि इससे धरती पर ज्‍यादा ऊर्जा पहुंचेगी। ध्रुवीय बर्फ का पिघलना भी वैश्विक स्‍तर पर समुद्र जल स्‍तर में बढ़ोत्तरी की एक बड़ी वजह है।

Sea level rise a major global threat

  1. समुद्र के जलस्‍तर में बढ़ोत्तरी एक बड़ा वैश्विक खतरा है। अगर प्रदूषण के स्‍तर में कमी नहीं लायी गयी तो वर्ष 2100 तक समुद्र के जलस्‍तर में करीब एक मीटर की वृद्धि हो जाएगी। प्रदूषण के उत्‍सर्जन में अगर समय के साथ तेजी लायी जाए तो समुद्र के जलस्‍तर में इस वृद्धि को 50 सेंटीमीटर से नीचे रखा जा सकता है। इससे वैश्विक स्‍तर पर होने वाली तबाही को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

समुद्र के जलस्‍तर में तेजी से हो रही बढ़ोत्तरी के कारण करोड़ों लोगों को मजबूरन अपना घर छोड़ना पड़ेगा, जिससे बेहद गहरी आर्थिक क्षति भी होगी। निचले इलाकों में बसे देशों के विशाल इलाके समुद्र के बढ़ते जलस्‍तर की भेंट चढ़ जाएंगे और अगर प्रदूषण को कम नहीं किया गया तो कुछ मुल्‍क पूरी तरह डूब जाएंगे।

अगर समुद्र का जलस्‍तर एक मीटर बढ़ा तो बांग्‍लादेश का करीब 20 फीसद हिस्‍सा डूब जाएगा और तीन करोड़ से ज्‍यादा लोगों को दूसरी जगह आसरा खोजना पड़ेगा।

इस सदी के अंत तक मिस्र में नील नदी डेल्‍टा का 30 प्रतिशत हिस्‍सा डूब जाएगा। इससे 53 लाख लोगों के साथ-साथ बहुत बड़े पैमाने पर कृषि भूमि भी प्रभावित होगी। समुद्र के बढ़ते जलस्‍तर के कारण जिन शहरों को सबसे ज्‍यादा खतरा है उनमें मुम्‍बई, शंघाई, न्‍यू यॉर्क, मियामी, लागोस, बैंकॉक और टोक्‍यो शामिल हैं। अगर समुद्र का जलस्‍तर मात्र 50 सेंटीमीटर भी बढ़ा तो दुनिया के सबसे ज्‍यादा खतरे वाले 20 तटीय शहरों में 26.9 ट्रिलियन डॉलर की सम्‍पत्ति को खतरा होगा।

  1. कार्बन डाई ऑक्‍साइड के घुलने से समुद्र का पानी गर्म और अम्‍लीय हो रहा है, और अगर प्रदूषण को कम नहीं किया गया तो वर्ष 2100 तक सभी समुद्री जैव प्रजातियों की कुल तादाद में 17 प्रतिशत की गिरावट आयेगी। खासतौर से कोरल रीफ में 70 से 90 प्रतिशत तक की गिरावट आने का अनुमान है, वह भी तब जब वैश्विक तापमान में वृद्धि डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रहे। अगर यह बढ़ोत्तरी 2 डिग्री सेल्सियस हुई तो कोरल पूरी तरह विलुप्‍त हो जाएंगे। उष्‍ण कटिबंधीय महासागरों में मछलियों की तादाद में भी तेजी से गिरावट होने का अनुमान है।

इस वक्‍त दुनिया की 10 से 12 प्रतिशत आबादी प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से मत्‍स्‍य आखेट पर निर्भर करती है और उस पर पारिस्थितिकियों में परिवर्तन के गम्‍भीर प्रभाव पड़ेंगे।

Two-thirds of the glacier of the Hindu Kush Himalaya will melt

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