Home » समाचार » हां, हां ! यह अघोषित इमर्जेंसी ही है

हां, हां ! यह अघोषित इमर्जेंसी ही है

हां, हां ! यह अघोषित इमर्जेंसी ही है

0 राजेंद्र शर्मा

हिंदी के एक प्रमुख खबरिया चैनल, एबीपी न्यूज में जो कुछ हुआ है, उसे तख्तापलट कहा जा सकता है या नहीं इस पर तो बहस हो सकती है। लेकिन, इतना तय है कि जो हुआ है और जिस तरह से हुआ है, न सिर्फ असाधारण है बल्कि डराने वाला भी है। बेशक, प्रकटत: सिर्फ इतना हुआ है कि पहले अचानक यह खबर आयी कि चैनल के वरिष्ठ संपादक मिलिंद खांडेकर ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद, यह खबर आयी कि चैनल के चर्चित प्राइम टाइम शो, ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’ के प्रस्तोता पुण्य प्रसून वाजपेयी ने चैनल छोड़ दिया है। इसके साथ ही नौ बजे के अपने निर्धारित समय पर चैनल से वाजपेयी का शो गायब हो गया। इसी बीच यह खबर आयी कि चैनल के एक और वरिष्ठ प्रस्तोता, अभिसार शर्मा को दो हफ्ते के लिए कोई भी कार्यक्रम प्रस्तुत करने से मना कर के घर बैठाल दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि उसी शाम से खासतौर पर ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’ के समय पर प्रसारण में कई दिनों से नियमित रूप से हो रही ‘तकनीकी गड़बड़ी’ का भी अंत हो गया।

            बेशक, संबंधित चैनल ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण देना जरूरी नहीं समझा है। लेकिन, किसी से छुपा हुआ नहीं है कि वास्तव में क्या हुआ है?

किसी भी सत्ताधारी को पसंद नहीं आती सवाल करने वाली आवाजें

अभिसार शर्मा की प्रस्तुतियां और पुण्य प्रसून वाजपेयी का ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’, न सिर्फ इस खबरिया चैनल के मौजूदा सत्ताधारियों से बेबाक सवाल करने वाले मुख्य कार्यक्रम थे बल्कि हिंदी के खबरिया चैनलों में आम तौर पर भी, सत्ता से सवाल करने वाले प्रमुख कार्यक्रम थे। बेशक, ऐसे सवाल करने वाली आवाजें किसी भी सत्ताधारी को पसंद नहीं आती हैं। पर जनतंत्र में सत्ता में बैठे लोगों को ऐसे आलोचनात्मक स्वरों को चाहे-अनचाहे बर्दाश्त करना पड़ता है। लेकिन, आज जो लोग केंद्र में सत्ता में बैठे हुए हैं, उन्हें अपनी आलोचना उसी तरह बर्दाश्त नहीं है, जैसे इमर्जेंसी में इंदिरा गांधी को बर्दाश्त नहीं थी। और उन्होंने इमर्जेंसी वाला ही काम किया और इन आवाजों को ही बंद करा दिया। पहले ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’ के प्रसारण में तकनीकी बाधाएं पैदा करने के जरिए और अंतत: कार्यक्रम ही बंद कराने के जरिए। हां! इसके लिए उन्हें इमर्जेंसी जैसी प्रकट सेंसरशिप का सहारा लेने की भी जरूरत नहीं पड़ी। चैनल मालिकान को धमकाना ही काफी साबित हुआ। कानों-सुनी के अनुसार इस ‘पवित्र’ काम में खुद देश के वित्त मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का हाथ लगा है।

पीएम पर सवाल उठाना महंगा पड़ा

            लेकिन, यह मामला और ऊपर तक यानी सत्ता के एकदम शीर्ष तक जाता है। व्यापक रूप से ऐसा माना जा रहा है कि ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’ की जिस स्टोरी ने सत्ताधारी दल को अपना अंतिम हथियार चलाने के लिए तत्पर कर दिया, वह सीधे प्रधानमंत्री के दावों की सत्यता पर सवाल उठाती थी। मोदी सरकार के ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की आय बढ़ाने के कार्यक्रमों के लाभार्थियों के साथ, प्रधानमंत्री मोदी की इंटरनैट के जरिए बहुप्रचारित-प्रसारित, प्रायोजित मुलाकात में, छत्तीसगढ़ में कांकेर की ग्रामीण महिला चंद्रमणी ने, अपनी आमदनी दोगुनी होने की बात कही थी। खुद प्रधानमंत्री की ओर से अपने ग्रामीण कार्यक्रमों की सफलता के साक्ष्य के रूप में, इसका खूब प्रचार भी किया गया था। लेकिन, एबीपी न्यूज  की फौलो अप स्टोरी ने इस दावे की पोल खोल दी और यह दिखा दिया कि कृषि से आय दोगुनी होने का दावा पूरी तरह से हवाई था और वास्तव में चंद्रमणी को ऐसा दावा करने के लिए दिल्ली आए अधिकारियों द्वारा सिखाया-पढ़ाया गया था। सीधे प्रधानमंत्री मोदी के दावे को चुनौती देने की जुर्रत कोई पत्रकार करे, यह मौजूदा निजाम कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वास्तव में अभिसार शर्मा का भी अपराध कुछ ऐसा ही था। अपने एक प्रसारण में उन्होंने उत्तर प्रदेश में योगी राज में उत्तर प्रदेश में कानून व व्यवस्था में सुधार के प्रधानमंत्री के दावे पर, इस दावे के अगले ही रोज सुल्तानपुर में तथा अन्य जगह पर हुई सरे-आम हत्या की दो दुस्साहसपूर्ण घटनाओं के संदर्भ में, सवाल उठाया था।

डेविल्स एडवोकेट-एन अनटोल्ड स्टोरी

            मुख्यधारा के मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी की किसी भी आलोचना को ही नहीं, नरेंद्र मोदी को पसंद न आने वाली किसी भी आवाज को दबाने के लिए मौजूदा शासन किस तरह अपने सारे हथियार लेकर टूट पड़ता है, इसका खुलासा जाने-माने टीवी पत्रकार तथा संभवत: भारत के सबसे गंभीर तथा बेबाक साक्षात्कारकर्ता, करण थापर ने अपनी नयी किताब, ‘डेविल्स एडवोकेट-एन अनटोल्ड स्टोरी’ में किया है। 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी, 2002 के गुजरात के नरसंहार पर सवालों से नाराज होकर, तीन मिनट में ही थापर के साक्षात्कार से उठकर चले गए थे। उसके सात साल बाद, प्रधानमंत्री बनने पर नरेंद्र मोदी के इशारे पर न सिर्फ भाजपा के नेताओं व प्रवक्ताओं ने थापर का बहिष्कार कर दिया बल्कि इस अघोषित किंतु अचूक बहिष्कार को खत्म कराने की कोशिश में जब थापर ने सत्ताधारी पार्टी में शीर्ष स्तर तक संपर्क किया, उन्हें स्पष्ट इशारों में बता दिया गया कि यह बहिष्कार खुद प्रधानमंत्री के संकेत पर हो रहा था, जो उस अप्रिय लगे साक्षात्कार के लिए थापर को माफ करने को तैयार नहीं थे। अचरज नहीं कि खबरों अनुसार, संसद भवन में पत्रकारों की मौजूदगी में खुद भाजपा अध्यक्ष ने चंद्रमणी प्रकरण के बाद, एबीपी न्यूज को ‘सबक’ सिखाने की बात कही थी। उसके चंद दिनों में ही भारी उलट-फेर हो चुका था।

            वास्तव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मौजूदा भाजपा निजाम शुरू से ही समूचे मुख्यधारा के मीडिया को अपने पाले में हांकने की कोशिशों में लगा रहा है। और नरेंद्र मोदी तथा उनके निजाम को कार्पोरेट जगत का जैसा पूर्ण समर्थन हासिल रहा है, उसे देखते हुए यह बहुत मुश्किल भी नहीं रहा है। और एनडीटीवी की तरह जिन एकाध चैनल लाइनों के मामले में यह मुश्किल नजर आया है, उनके खिलाफ मोदी सरकार ने विभिन्न उपायों से तथा विभिन्न एजेंसियों के जरिए, पहले दिन से ही युद्घ जैसा छेड़े रखा है। उनके मीडिया को नाथने की इस प्रक्रिया में एक बड़ा मील का पत्थर था, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले से, रिलायंस ग्रुप का सीएनएन आइबीएन/न्यूज 18 ग्रुप में सीधे हस्तक्षेप कर संपादकीय नीति को मोदी-अनुकूल कराना और अंतत: मोदी के प्रधानमंत्री बनने के फौरन बाद, इस चैनल को खड़ा करने वाली राजदीप सरदेसाई-सागरिका घोष जोड़ी का विदा किया जाना। उसके बाद से टाइम्स ग्रुप तथा जागरण ग्रुप जैसी मीडिया हाउसों ने हिंदुत्व के एजेंडा को जिस तरह अपने कारोबारी लाभ के लिए गले से लगाया है, उसकी एक झलक कोबरापोस्ट के हाल के रहस्योद्घाटनों में दिखाई दी है। फिर भी इनके अलावा जी  तथा रिपब्लिक जैसे चैनलों ने जिस तरह सत्ताधारी पार्टी की खुली वकालत को अपना पैशन बनाया है, उस सबके बाद से मुख्यधारा के मीडिया से मौजूदा शासन की मांगें और आक्रामक हो गयीे हैं।

            इसी के एक महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन, शोभना भारतीया के साथ प्रधानमंत्री मोदी की एक मुलाकात के बाद, जो प्रकटत: इस समूह के महत्वाकांक्षी आयोजन, ‘लीडरशिप समिट’ के सत्तापक्ष द्वारा संभावित बहिष्कार को टालने के लिए थी, अखबार के संपादक, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के पत्रकार बॉबी घोष को हटा दिया गया था। 2015 में उन्होंने जो ‘हेट ट्रैकर’ शुरू कराया था, वह खासतौर पर संघ परिवार की आंख की किरकिरी बना हुआ था। संकेत स्पष्ट है।

इमर्जेंसी की तरह आलोचना के हर स्वर को कुचल देना चाहते हैं मौजूदा सत्ताधारी

मुख्यधारा के मीडिया के बड़े हिस्से को अपनी गोदी में बैठाने पर भी मौजूदा सत्ताधारी संतुष्ट नहीं हैं और इमर्जेंसी की तरह आलोचना के हर स्वर को कुचल देना चाहते हैं। एबीपी न्यूज प्रकरण इसी जंग का एलान है। ज्यों-ज्यों मोदी एंड कंपनी को 2019 का चुनाव अपने हाथ से फिसलता लग रहा है, यह हमला और तीखा हो रहा है। आखिरकार, मीडिया जनता के आंख-कान का विस्तार है। सत्ता में बैठे लोगों को लगता है कि इस आंख-कान को बंद करा देंगे तो जनता उनकी सचाई जान ही नहीं पाएगी। लेकिन, इमर्जेंसी का एक सबक यह भी तो है कि मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण भी जनता को सचाई जानने से रोक नहीं पाता है।        

article on attack on critical voices in media
                                       0

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: