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क्या यूएस-सऊदी रिश्ते में दरार पैदा करेगा अरामको पर हमला और जमाल खशोगी की निर्मम हत्या ?

हालाँकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा सऊदी अरब में सेना की अतिरिक्त तैनाती करने के निर्णय (US President Donald Trump’s decision to deploy additional troops in Saudi Arabia) को अमेरिका-सऊदी गठबंधन (US-Saudi Alliance) को ठीक करने के लिए देर से किए गए प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

एम. के. भद्रकुमार

न्यूयॉर्क स्थित काउंसिल ऑफ़ फॉरेन रिलेशंस (New York-based Council of Foreign Relations) जिसने 2020 में होने जा रहे चुनाव में राष्ट्रपति ट्रम्प का विरोध करने वाले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के इंटरव्यू लिए जिनसे पता चला कि वाशिंगटन में यूएस-सऊदी संबंधों के बारे में धारणाएं नाटकीय रूप से बदल गई हैं।

पिछले एक साल के दौरान दो ऐसे मुद्दे रहे हैं जिन्होंने इस दरार को पैदा किया है – एक, जमाल खशोगी की निर्मम हत्या और दूसरा, यमन में युद्ध जहाँ सऊदी अत्याचार उभर कर सामने आया है।

सऊदी के साथ बेहतर संबंध के प्रति प्रतिबद्ध रहने का ट्रम्प का रुख एक ही मुद्दे पर केंद्रित था, उनके मुताबिक़, सऊदी निज़ाम एक दुधारू गाय है – जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारी निवेश करती है और सैंकड़ों हज़ारों अमेरिकी नौकरियां पैदा करने में मदद करती है जो अमेरिका से बहु-अरब डॉलर के सौदे के हथियार भी ख़रीदती है।

बदले में, सऊदी अरब की रणनीति अमेरिका को एक सहयोगी के रूप में अमेरिकियों पर पैसे बरसा कर उन्हें अपने वश में करने की रही है।

लेकिन ट्रम्प और सऊदी शासन के बीच यह बैक-टू-बैक सौदा डगमगा रहा है। सऊदी नीतियों की वकालत करने वाली शायद ही कोई प्रभावशाली आवाज़ इन दिनों अमेरिका में है।

खशोगी और यमन से भी परे, कुछ अन्य छिपे हुए कारण भी मौजूद हैं। एक महत्वपूर्ण घटना यह भी है कि अमेरिका अब लगातार दुनिया के शीर्ष तेल निर्यातकों में से एक के रूप में उभर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख फ़तह बिरोल ने 13 सितंबर को वाशिंगटन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अमेरिका “अभूतपूर्व” ऊर्जा उछाल के साथ अगले कुछ वर्षों में सऊदी अरब और रूस को “स्पष्ट रूप से” पछाड़ कर दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश बन जाएगा।

जैसा कि बिरोल ने कहा, “वे [यानी अमेरिका, रूस और सऊदी अरब] अगली कुछ तिमाही और वर्षों में तेल निर्यात के मामले में एक दूसरे के बहुत नज़दीक आ जाएंगे, साथ ही यह भी कहा कि यह केवल कुछ ही समय की बात है जब अमेरिका स्पष्ट रूप से दुनिया का शीर्ष तेल निर्यातक बन जाएगा। बिरोल ने कहा कि 2024 में अमेरिका को इस बात का एहसास होगा कि वह तेल के इतिहास में उत्पादन में अब तक की अभूतपूर्व वृद्धि करने वाला देश होगा जो अधिक से अधिक निर्यात के लिए दरवाज़ा खोल देगा।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि न केवल ऊर्जा आयात के मामले में अमेरिका की निर्भरता मध्य पूर्व से ख़त्म होगी बल्कि अमेरिका बाज़ार में अपने माल को बेचने के लिए अधिक से अधिक हिस्सेदारी के लिए भी प्रतिस्पर्धा करेगा जिससे तेल के बाज़ार को लेकर आपसी संबंध और हितों में टकराव होगा और तेल की क़ीमत पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। तेल के लिए वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट है, जो वर्तमान में 62 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है, जो 80- 85 डॉलर से नीचे है और सऊदी अरब को अपने बजट को संतुलित करने की ज़रूरत है। इस मोड़ पर सऊदी अरब को अपने आईपीओ को ध्यान में रखते हुए तेल की क़ीमतों को ऊँचा रखने की बड़ी चुनौती है।

ज़ाहिर है, तेल की भूराजनीति ने सऊदी अरब और रूस को एक क़रीबी साझेदारी में लाकर खड़ा कर दिया है। ओपेक+प्लैटफ़ार्म इसी की एक अभिव्यक्ति है। निश्चित रूप से, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अगले महीने सऊदी अरब की निर्धारित यात्रा एक ऐतिहासिक घटना का संकेत देती है। सऊदी-रूसी संबंध में एक नया आयाम आने वाला है जिसके और ज़्यादा परिपक्व होने की संभावना है।

पिछले हफ़्ते पुतिन की साहसिक टिप्पणी जिसमें उन्होंने एस-400 मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को सऊदी अरब के लिए पेश किया था, वह आपसी साझेदारी और विश्वास को बढ़ाने का संकेत देती है। पुतिन ने निम्न बातें 17 सितंबर को अंकारा में रूसी-तुर्की-ईरानी शिखर सम्मेलन के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में कही थीं:

“हम सऊदी अरब की उनके लोगों की सुरक्षा करने में मदद के लिए तैयार है। उन्हें चतुर निर्णय लेने की आवश्यकता है, जैसा कि ईरान ने हमारे एस-300 को ख़रीदकर कर लिया था, जैसा कि [तुर्की के राष्ट्रपति] ने सबसे उन्नत एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम ख़रीदने का फ़ैसला किया था। इस प्रकार की सुरक्षा प्रणालियाँ सऊदी अरब पर किसी भी तरह के हमले के ख़िलाफ़ हर तरह के बुनियादी ढांचे का बचाव करने में सक्षम हैं।”

इस बीच, रूसी रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ सूत्र ने गुरुवार को आरोप लगाया कि अमेरिकी निर्मित वायु रक्षा प्रणाली सऊदी अरामको प्लांट पर पिछले सप्ताह हुए ड्रोन हमले को विफल करने में नाकामयाब रही क्योंकि वे घोषित मापदंडों से कम थे। ऐसा तास (TASS) समाचार एजेंसी के सूत्रों के हवाले से कहा गया है।

अब “सवाल उठता है कि इतनी मज़बूत वायु रक्षा कैसे दर्जनों ड्रोन और क्रूज़ मिसाइलों को गुज़रने दे सकती है? इसका केवल एक ही कारण हो सकता है: कि विकसित अमेरिकी प्रणाली पैट्रियट और एजिस आधिकारिक तौर पर घोषित मापदंडों से काफ़ी कम हैं जिसका कि काफ़ी प्रचार किया गया था। छोटे हवाई लक्ष्यों या हमलों और क्रूज़ मिसाइलों के ख़िलाफ़ उनकी प्रभावशीलता बहुत कम है।”

ऐसा लगता है कि रूस ट्रम्प के पीछे पड़ा है और रियाद को मनाने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिका के साथ सहयोग करने की तुलना में मॉस्को के साथ काम करना ज़्यादा फ़ायदेमंद सौदा होगा। अमेरिका में इसके लिए पहले से ही कुछ घबराहट है। ब्लूमबर्ग ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि, “कोई भी इसे माफ़िया-शैली के संरक्षण के प्रस्ताव के रूप में देख सकता है: जैसे मैदान में कोई नया और अधिक आक्रामक गैंगस्टर बोली लगा रहा हो क्योंकि सड़कों का वर्तमान राजा अब आलसी हो गया है और जिसके साथ जाना अब ज़्यादा जोखिम भरा है।”

दिलचस्प बात यह है कि अंकारा में प्रेस कॉन्फ़्रेंस के अगले दिन, पुतिन ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को फ़ोन भी किया। क्रेमलिन रीडआउट के अनुसार, “दोनो पक्षों ने ओपेक समझौतों के प्रारूप के कार्यान्वयन सहित वैश्विक हाइड्रोकार्बन बाज़ार की स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने वैश्विक तेल की क़ीमतों को स्थिर करने के उद्देश्य से घनिष्ठ समन्वय को बनाए रखने की पारस्परिक ज़रूरत और दृढ़ संकल्प दोहराया।”

इसमें कोई संदेह नहीं कि, रूस ऐसी स्थिति में अपनी पैठ बना रहा है जब अमेरिका-सऊदी गठबंधन असहनीय हो रहा है और Aramco हमला इसके लिए एक निर्णायक क्षण हो सकता है। इन परिस्थितियों में, यह बहुत ही अनुचित या मुश्किल होगा कि सऊदी अरब एक न्यू यॉर्क आईपीओ का चयन करेगा (जिसे सभी आईपीओ की मां के रूप में पेश किया जा रहा है।) ट्रम्प ने न्यूयॉर्क के आईपीओ को बड़ी ही दृढ़ता से पिच किया था।

मुद्दा यह है कि न्यू यॉर्क स्टॉक एक्सचेंज की तरफ़ मुँह मोड़ने से कुछ मुक़दमेबाज़ी के जोखिम हैं जिनसे फ़िलहाल सऊदी बचना चाहता है। अमरीका में बढ़ती सऊदी विरोधी भावना पर नज़र रखते हुए, सऊदी इस बात के लिए चिंतित है कि कहीं अमेरिकी नागरिक 9/11, 2001 के हमलों के मुआवज़े के लिए रियाद पर मुक़दमा दायर न कर दें, जिसके ज़रिये Aramco आईपीओ को निशाना बनाया जा सकता है।

ज़ाहिर है, कि अमेरिकी कूटनीति रक्षात्मक मुद्रा में आ गयी है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 17 सितंबर को रियाद जाते हुए, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने सार्वजनिक रूप कहा कि सऊदी अरब में तैनात पैट्रियट प्रणाली की विफलता के स्पष्टीकरण की ज़रूरत है: “हमने दुनिया भर में तैनात वायु रक्षा प्रणालियों की मिश्रित सफलता को देखा है। दुनिया के कुछ बेहतरीन लोग हमेशा चीज़ों को इस तरह से नहीं उठाते हैं। हम इस बात को सुनिश्चित करने के लिए काम करना चाहते हैं कि बुनियादी ढांचे और संसाधनों को इस तरह से स्थापित किया जाए ताकि भविष्य में इस तरह के हमलों को कम सफलता मिले जितनी की अब हुए हमले से मिली प्रतीत होती है।”

दूसरी ओर, रियाद में बातचीत के बाद, वाशिंगटन के लिए रवाना होने के दौरान, पोम्पेओ ने सुर बदलते हुए कहा कि: “मैं (रियाद में) कूटनीति के काम के लिए आया था। जबकि ईरान के विदेश मंत्री युद्ध की धमकी दे रहे हैं और अंतिम अमेरिकी से लड़ने की क़सम खा रहे हैं, हम यहां शांति और शांतिपूर्ण समाधान हासिल करने के उद्देश्य से गठबंधन बनाने के लिए आए हैं। यह मेरा मिशन है, निश्चित रूप से राष्ट्रपति ट्रम्प चाहते हैं कि में इस उद्देश्य को हासिल करूं, और मुझे आशा है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान भी इसे इसी तरह से देखता है। उनके बयान में इसका कोई सबूत नहीं है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि मामला कुछ ऐसा ही है।

इस तरह की मार्मिक पृष्ठभूमि में, ट्रम्प द्वारा सऊदी अरब में सेना की अतिरिक्त तैनाती करने के निर्णय को अमेरिका-सऊदी गठबंधन को ठीक करने के लिए देर से किए गए प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। पेंटागन ने कहा कि सेना की यह तैनाती सिमित संख्या में होगी, न कि हज़ारों की संख्या में! और मुख्य रूप से प्रकृति में रक्षात्मक होगी न कि हमलावर। ये क़दम रियाद में भरी निराशा की भावना को दूर करने के लिए काफ़ी कम हैं और शायद इसमें बहुत देर हो चुकी है।

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