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वाल्मीकि क्रांतिकारी लेखक थे तो उनके द्वारा रचित रामायण भी क्रान्तिकारी ग्रन्थ है 

उदय चे

आज वाल्मीकि जयंती (Maharishi Valmiki Jayanti Kab hai,) है। पूरे देश मे सरकार इसे धूमधाम से मना रही है। जगह-जगह सरकार कार्यक्रम कर रही है। पिछले 2-3 दिनों से वाल्मीकि जयंती की बधाइयों व कार्यक्रमों के सन्देश भी सोशल मीडिया पर अलग-अलग दलित संगठनों की तरफ से भी आ रहे थे। कार्यक्रम का जो पोस्टर उन्होंने जारी किया है, वो बहुत खतरनाक है। ये खतरनाक क्यों है, भविष्य में इसके क्या दुष्परिणाम आएंगे इस पर जरूर प्रगतिशील तबके को सोचना चाहिए।

इन प्रोग्रामों के पोस्टरों पर क्रांतिकारी निर्गुण विचारधारा के सन्तों, जिनका सम्बन्ध दलित समुदायों के साथ रहा है सन्त कबीर, सन्त रविदास, दलितों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले डॉ भीम राव अम्बेडकर, शिक्षा की अलख जगाने वाले महात्मा फूले, ज्योतिबा फुले व महात्मा बुद्ध के फोटो के साथ वाल्मीकि का फोटो लगाया गया है।

सन्त वाल्मीकि को आज निर्गुण क्रांतिकारी सन्तों के साथ जोड़ना, उनके साथ दिखाना, उनके साथ खड़ा करना क्रांतिकारी सन्त धारा के साथ गद्दारी करना है।

सन्त रविदास, कबीर, नानक जिन्होंने पाखंड, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी। समाज मे बराबरी हो इसके लिए लड़ाई लड़ी। कोई भूखा न सोये इसके लिए लड़ाई लड़ी।

“ऐसो चाहू राज मैं जहां मिले सबन को अन्न,

ऊंच नीच सब साथ बसे रविदास रहे प्रसन्न” रविदास

लेकिन वाल्मीकि ने कोई ऐसा क्रांतिकारी काम नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने राजा राम का गुणगान किया। अपनी कलम राजा के गुणगान में लगाई। उस समय की आम जनता के हालात क्या थे उनके बारे में कुछ नहीं लिखा। गैर बराबरी के खिलाफ कुछ नही लिखा। राम राज्य जिसमें क्षूद्र को शिक्षा का अधिकार नही था। राजा राम ने सन्त शम्बूक को इसलिए मार दिया क्योंकि वो शिक्षा ले भी रहा था और क्षूद्र समाज को दे भी रहा था। ऐसे घिनौने कृत्य की वाल्मीकि ने कही भी निंदा या विरोध नहीं किया है। इस असमानता के खिलाफ वाल्मीकि ने एक शब्द भी नहीं लिखा। राम ने जब सीता को घर से निकाल दिया उस समय उसके पेट में बच्चा था। राम के इस अमानवीय फैसले के खिलाफ वाल्मीकि ने कलम नहीं चलाई।

लेकिन आज कुछ राजनीतिक स्वार्थी लोग व उनकी पार्टियां  सन्त वाल्मीकि को क्रांतिकारी सन्तों के साथ खड़ा करने पर तुली हुई हैं। एक तरफ तो ऐसे लोग राम राज्य का बहिष्कार करते हैं। हिंदुइज्म की खिलाफत करते हैं वही राजनीतिक स्वार्थ के लिए हिन्दू धर्म के आधार राम और उसका राज्य रामराज्य पर ग्रन्थ लिखने वाले वाल्मीकि को क्रांतिकारी साबित करने पर तुले हुए हैं। अगर इनकी नजर से वाल्मीकि क्रांतिकारी लेखक या सन्त थे तो उनके द्वारा लिखी गयी रामायण भी क्रान्तिकारी ग्रन्थ है। रामराज्य की अवधारणा भी फिर तो सही है।

एक तरफ तो आप राम और उसके राज्य रामराज्य का विरोध करते हो दूसरी तरफ रामराज्य को जस्टिफाई करने वाले लेखक को आप क्रांतिकारी की श्रेणी में लाना चाहते हो। ये दोनों विपरीत होते हुए एक कैसे हो सकती हैं। अगर वाल्मीकि क्रांतिकारी कवि होते तो सन्त रविदास, कबीर, नानक की वाणियो में मिलते, महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर उनको आदर्श के रूप में बोलते हुए या लिखते हुए कोट करते।

इसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ किसके जुड़े है। ये जानना भी बहुत जरूरी है। इसके पीछे सबसे बड़ा स्वार्थ हिंदूवादी विचारधारा की पार्टियों और उनके संगठनों का है।

1920 के दौर में जब अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक विभाजन को हवा दी और देश में हिन्दू और मुस्लिम गोलबंदी होनी शुरू हो गई थी। तब देश मे अम्बेडकर साहब भी दलितों को एकजुट कर रहे थे, तब हिन्दू खडपंचों के कान खड़े हो गए कि अगर दलित भी हिंदुओं (तथाकथित स्वर्ण जातियों) के खिलाफ खड़े हो गए तो स्वर्ण जातियां अल्पसंख्यक हो जाएंगी और देश से ब्राह्मणवादी सामन्तवाद का खात्मा हो जाएगा। इसलिए उस समय दलितों को ब्राह्मणी खेमे में बनाये रखने के लिए उन्हें कुछ प्रतीकों के पीछे समेटने की साजिशें शुरू हुई जिसके तहत सफाई कर्म करने वाली जातियों को वाल्मीकि का वंशज दिखाया गया। जरा सोचिए कि वाल्मीकि ने हमेशा राम का ही गुणगान किया। जैसे रविदास ने जातिप्रथा और ब्राह्मणी पाखण्डों का विरोध किया वैसा जबरदस्त विरोध वाल्मीकि लेखन में कहीं नहीं मिलता केवल दो जगह निषाद द्वारा राम को नदी पार कराते और भूखे राम द्वारा जान बचाने के लिए शबरी के झूठे बेर खाते हुए जातीय सहयोग उसमें दिखाया गया है। इसलिए हिंदूवादी तो चाहते ही है कि दलित समुदाय वाल्मीकि को अपना क्रांतिकारी सन्त मान ले। जिस दिन आप वाल्मीकि को क्रांतिकारी सन्त का दर्जा दे दोगे तो आप उसकी लिखी हुई रामायण और रामायण के हीरो राजा राम व उसके रामराज्य को सही मानने लग जाओगे। असमानता के खिलाफ, ऊंच-नीच के खिलाफ, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता के खिलाफ जो लड़ाई क्रांतिकारी सन्तो, महापुरुषों ने लड़ी थी वो खत्म हो जाएगी।

दूसरा स्वार्थ बसपा और उसके सांझेदार संगठनों का है। क्योकि बसपा ओर इन संगठनों पर दलितो में खास एक जाति का प्रभाव रहा है। वाल्मीकि जाति कभी भी इनके पक्ष में नही आई। अब वाल्मीकि जाति को साथ लाने के लिए ये रविदास, कबीर, वाल्मीकि, डॉ अम्बेडकर को एक साथ खड़ा करना चाहते हैं। जो आने वाले समय मे खतरनाक साबित होगा।

इस बारे में दलितो के लिए लड़ने वालों का तर्क भी अजीब है कि वाल्मीकि समुदाय को दलित-पिछड़ो की एकता में साथ लाना है तो उनके आराध्य वाल्मीकि जिसके साथ इस समुदाय कि भावनाएं जुड़ी हुई है। इनकी भावनाओ को ठेस कैसे पहुंचाई जा सकती है। ये ऐसा कुतर्क है जो इन्होंने अपने फायदे के लिए इसको बनाया है। इस कुतर्क को इस्तेमाल करके भविष्य में ये किसी को भी साथ ले आएंगे।

जो दलित तबका आज सबसे ज्यादा भेदभाव और शोषण का शिकार है। आज उसके उत्थान और विकास के बारे में कोई क्रांतिकारी एजेंडा न लाकर उसे हिन्दू धर्म के जाल में उलझाए रखने के लिए ही उसे वाल्मीकि जयंती व वाल्मीकि सत्संगों में धकेला जा रहा है।

आज सालाना हजारों सफाईकर्मी बिना आधुनिक मशीनों के गटर में काम करते हुए जहरीली गैसों से मरते हैं लेकिन इस देश मे उस पर कोई चर्चा नहीं होती क्योंकि हमें भाग्यवाद और भगवान में ही धक्का दिया जा रहा है ताकि हम बुनियादी सवालों को न उठा सके। शासक वर्गों के इस कार्य मे ऋषि वाल्मीकि काफी सहायक हैं।

आपको अगर दलितों को एकजुट करना है उस एकजुटता में वाल्मीकि समुदायों को भी साथ लाना है तो उनकी जो समस्याएं हैं उन पर बात की जानी चाहिए, मैला ढोने, गटर के अंदर जाकर सफाई के खिलाफ, हर साल गटर में मरने वाले सफाई कर्मचारियों के लिए लड़ना चाहिए,  उनकी सैलरी के लिए, काम पर सुरक्षा, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए लड़ना चाहिए। दलित उत्पीड़न के खिलाफ, दलितों की सांझी समस्याओं, भूमि बंटवारे, आरक्षण, रोजगार की समस्याओं पर बात करके ही दलितो व पीड़ितों की एकता स्थापित की जा सकती है व  इस एकता में वाल्मीकि समुदाय को साथ लाया जा सकता है।  सफाई कर्म करने वाले मजदूर भाइयों को इस जाल से निकल कर क्रांतिकारी राह पर चलना चाहिए।

ये लड़ाई का रास्ता भविष्य में मुक्ति के रास्ते की तरफ ले जाएगा।

हस्तक्षेप मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। आप भी मदद करके इस अभियान में सहयोगी बन सकते हैं।

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