वीरेनदा से मिलकर लगा कि कविता लिखने की नहीं, कविता जीने की चीज होती है

Viren Dangwal The Poet Of Life

वीरेनदा (Viren Dangwal) से मिलकर फिर यह यकीन पुख्ता हुआ नये सिरे से कि कविता में ही रची बसी होती है मुकम्मल ज़िन्दगी जो दुनिया को खत्म करने वालों के खिलाफ बारुदी सुरंग भी है।

सवा बजे रात को आज मेरी नींद खुल गयी है। गोलू की भी नींद खुली देख, उसकी पीसी ऑन करवा ली और फिर अपनी रामकहानी चालू।

जो मित्र अमित्र राहत की सांसें ले रहे थे, नींद में खलल पड़ने से बचने के ख्याल से बचने के लिए, उनकी मुसीबत फिर शुरू होने वाली है अगर मैं सही सलामत कोलकाता पहुँच गया तो, यानि आज से फिर ऑनलाइन हूँ।

कल सुबह आठ बजे निकला था और नोएडा सेक्टर बारह, इंदिरापुरम, कला विहार मयूर विहार होकर प्रगति विहार हास्टल रात के नौ बजे करीब लौटा।

आनंद स्वरूप वर्मा (Anand Swaroop Verma) के वहाँ गहन विचार विमर्श, वीरेनदा से गहराई तक मुलाकात और पंकज बिष्ट के साथ उनके घर में बिताये कुछ अनमोल अंतरंग क्षणों के साथ दिल्ली की यह यात्रा इस बार बहुत अनोखी बन निकली है और थकान से चूर-चूर होकर दस बजे ही घोड़े बेचकर सो गया था, लेकिन दिमाग के सेल दुरुस्त होते ही आंखें फिर उनींदी हैं।

अपने राजीव कुमार तो दिल्ली में आकर सन्नाटा जी रहे हैं बाकी गपशप तो गोलू, पृथू और मीना भाभी के साथ हो रही है और लग रहा है कि राजीव नये सिरे से कुछ बनाने की सोच रहा होगा।

इस बार वीणा और अरुण को खूब शिकायतें होंगी और अपने परिवार के बच्चों को भी कि मैं इस बार सिर्फ दोस्तों से मिला हूँ, परिजनों से नहीं।

मयूर विहार गया लेकिन झिलमिल नहीं गया वीणा के घर और न जहाँगीर पुरी गया, जहाँ अरुण के बच्चे कृष्णा और तरुण को शायद अपने ताT और ताई का इंतजार रहा है।

उनसे हम लोग मार्च तक मिलेंगे जरूर। नई दिल्ली के सीमेंट के जंगल में नहीं, अपने घर बसंतीपुर में। इसी उम्मीद के साथ आज दुरंतो से कोलकाता लौट रहा हूँ।

गनीमत है कि कोलकाता के बड़ा बाजार में धूल और ट्रैफिक जाम में फंसे 14 अक्तूबर को सविता की तबियत इतनी खराब भी नहीं हुई और बसंतीपुर से होकर नैनीताल, देहरादून, बिजनौर होकर दिल्ली तक दौड़-दौड़कर कल रात बुलेट दौड़ से हम थक कर कब सो गये, पता ही नहीं चला और अबकी यात्रा की किस्त पूरी हो गयी और सविता मेरे साथ लगातार दौड़ती रहीं। उनका भी आभार।

पता नहीं कि ऐसी रात फिर कभी नसीब होगी या नहीं।

दिल्ली में अब भी एक बेचैन कवि आत्मा ज़िन्दगी जीने का हुनर सिखा रही हैं हमें।

उन्हीं के साथ आज की सी कोई पूस की रात को नैनी झील के किनारे हम लोगों ने कड़कड़ाती सर्दी में आखिरी बार ऊधम मचाया था और उस कवि ने कहा था कि पलाश, तुम सिर्फ गद्य लिख सकते हो, कविता हरगिज नहीं लिख सकते और तब मैंने कहा था कि दा, जरूर लिख सकता हूँ।

उस रात हमारे साथ एक और कवि थे पहाड़ और तराई में दीवानगी की हद तक काव्यधारा में बहने वाले, हमारे वजूद का हिस्सा जो अब भी बने हुए हैं, हमारे गिरदा।

साथ थे, राजीव लोचन साह जैसे नख से शिख तक भद्रपुरुष और वैकल्पिक मीडिया की लड़ाई शुरू करने वाले हमारे सुप्रीम सिपहसालार आनंद स्वरूप वर्मा भी।

शमशेर सिंह बिष्ट भी शायद आधी रात बाद बीच झील की तन्हा नैनीताल की उस रात के गवाह रहे हैं। शायद शेखर पाठक भी थे और हरुआ दाढ़ी भी। ठीक से याद नहीं है।

जाहिर है कि वह रात अब कभी नहीं लौटेगी, गिरदा के बिना वह रात लौटेगी नहीं। आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा भी कि गिरदा के बिना नैनीताल सूना अलूना है और अब वहाँ जाना सुहाता नहीं है। पहाड़ों में गिरदा का न होना हमारे यकीन के दायरे से बाहर है।

आज की इस रात की सुबह तो यकीनन होगी ही और सुबह की न सही, शाम की गाड़ी से उस कोलकाता जरूर पहुँचकर फिर धूनी रमानी है, जहाँ इन्हीं कवि आत्मीय अग्रज ने मुझे सन् 1991 को जबरन भेज दिया था कि कोलकाता को बदले बिना दुनिया नहीं बदलेगी और तबसे मैं कोलकाता को बदलने में लगा हूँ।

क्योंकि कवि हूँ नहीं मैं फिर भी, एक अति प्रिय कवि मित्र बड़े भाई के जुनूनी यकीन को सच में बदलने का जिम्मा मुझ पर है कि दुनिया के गोलाकार वजूद की पूंछ वहीं से पकड़कर उस ऐसी पटखनी दूँ कि सारी कविताएं सच हो जायें एकमुश्त।

मुझे कविताओं में रमने का मौका नहीं मिला तो क्या हमारे वीरेनदा और हमारे गिरदा कवि बतौर याद किये जाएंगे और देश भर के कवियों से लगातार मेरा दोस्ताना और दुश्मनी का रिश्ता जीने का मौका भी लगता है।

बाकी तो बिजनौर के पास सविता के मायके गांव धर्मनगरी में एक युवा अति कुशाग्र बुद्धि के बीटेक इंजीनियर तापस पाल की राय में हमारी पीढ़ी के लोग कुल मिलाकर घंटा हैं। उससे मुठभेड़ के बारे में बाद में फिर।

इंदिरापुरम में जयपुरिया सनराइज (Jaipuria Sunrise Green in Indirapuram Ghaziabad) शायद उस बहुमंजिली इमारत का नाम है, जिसमें हमारे समय के सबसे शानदार, सबसे जानदार कवि का बसेरा है इस वक्त। आठवीं मंजिल में। जहाँ आनंदजी के वहाँ से हम लेट पहुँचे और वीरेनदा इंतजार में थके भी नहीं। परिवार में सिर्फ रीता भाभी से मुलाकात हो पायी। वे जस की तस हैं साबुत। लेकिन बच्चों से इस दफा मुलाकात हुई नहीं है।

कम से कम वीरेनदा से मिलने फिर इस शहर को आऊँगा, जिसे मैं कभी प्यार नहीं कर सका ,क्योंकि वह लगातार लगातार जनपदों को चबाता जा रहा है और सारी सत्ता यहीं केंद्रित हैं और सारी साजिशें जनता के खिलाफ यही से शुरू होती हैं।

मन ही मन मैं शायद मणिपुरी हूँ या तामिल या बस्तर दंतेवाड़ा का कोई सलवा जुड़ुम दागा आदिवासी क्योंकि मैं जख्मी हिमालय भी हूँ।

अबकी बार वीरेनदा से मिलकर लगा कि कविता दरअसल लिखने की कोई चीज होती नहीं है, कविता जीने की चीज होती है और कवि जब तक कविता में जीता है, तब तक ज़िन्दगी बची होती है और तभी तक बनती बिगड़ती रहती है दुनिया।

कविता के बिना न सभ्यता होती है और न मनुष्यता।

यह सिरे से संवेदनाओं का ही नहीं, सरोकार का मामला है।

संवेदनाओं और सरोकार में जीने वाली कविता की मौत होती नहीं है उसी तरह जैसे दुनिया को बदलने वाली जब्जे की मौत होती नहीं है

और बदलाव की फल्गुधारा कविता की ही तरह हमारी रगों में बहती रहती है।

और हजारों रक्तनदियों की धार उसकी दिशा नहीं बदल सकती है।

न उसकी मंजिल कभी बदल सकती है भले भटक जाये या बदल जाये हमारे दिलो दिमाग, हमारे सरोकार लखटकिया करोड़पतिया कारोबार में।

सोलह मई के बाद की कविता के अन्यतम आयोजक रंजीत जी, अपने युवा भविष्य अभिषेक और अमलेंदु दोनों आज दिन भर हमारे साथ रहे जो आनंद स्वरूप वर्मा, वीरेनदा और हमारे सान्निध्य में अब तक हमारा किया धरा को जारी रखने वाले सबसे काबिल लोग हैं।

अभिषेक, अमलेंदु, रियाज, सुबीर गोस्वामी, पद्दो लोचन, एक्सकैलिबर, शरदिंदु और आने वाली पीढ़ियों के सहारे और उन तमाम युवा दिलोदिमाग जो आज की युवा स्त्रियों के खाते में भी हैं, हम छोड़ जायेंगे एक बेहतर दुनिया, साबूत सकुशल पृथ्वी, इसी तमन्ना में अटकी है हमारी जान जहाँ।

युगमंच का सिसिला अभी जारी है।

नैनीताल समाचार निकल रहा है।

समकालीन तीसरी दुनिया को बेहतर बनाने की तैयारी है और राजतंत्र फिर वापस नहीं लौटेगा और न फासीवाद मनुष्यता और सभ्यता का नाश कर सकता है।

पंकज दा हमें मयूर बिहार एक्सटेंशन तक पैदल छोड़कर फिर समयांतर के ताजा अंक को तराशने में लगे हैं, इससे बेहतर तस्वीरें हमारे लिए दूसरी हैं ही नहीं और न हो सकती हैं।

जैसे कि कविताएं सोलह मई के बाद अभी भी लिखी जा रही है चाहे गंगा के घाट बदले हों, पहाड़ में लालटेन जलती न हो और न कोई पौधा बंदूक बन पाया हो और न कविता ने शहरों की घेराबंदी की हो। ये तस्वीरें बदलाव के यकीन को मजबूत बनाती हैं।

जिनके साथ पीढ़ियां भी कई हैं उतने ही प्रतिबद्ध, जितनी हमारी पीढ़ियां रही हैं और मकबरों के इस शहर से शायद जीने का शऊर सिखाने वाले एक कवि की कविता में बेहद कैजुअल, आलसी कस्बाई जनपदीय ज़िन्दगी रूप रस गंध के लोक में जीने की तमीज और कैंसर को हराने वाली कविता की औकात से मुखातिब होकर अब हमको पूरा यकीन है कि हम रहे न रहें, बची रहेगी ज़िन्दगी फिर भी और हमेशा कि तरह बदलती रहेगी यह हमारी पृथ्वी भी।

जिसे गोलक बनाकर खेल रहे हैं दुनिया भर के आदमखोर लोग।

फिर भी यकीन है कि प्रकृति पर्यावरण, मनुष्यता, सभ्यता और लोक में बसे भिन्न-भिन्न भाषा, अस्मिता और पहचान के लोग न उन्हें, उन आदमखोरों और मानवताविरोधी युद्धअपराधियों को बख्शेंगे और न इस दुनिया को खत्म करने की कोई इजाजत देंगे।

यह तंत्र मंत्र यंत्र का तिलिस्म हम न तोड़ सकें तो क्या, नईकी फौजें आवल वानी और जइसा कि अपन गोरखवा कभी कहिलन, सच होइबे करें।

इस उपमहादेश में सर्वत्र आतंक के खिलाफ अमेरकिका के युद्ध के खिलाफ कोई शहबाग आंदोलन भी है और यादवपुर के छात्र अब भी सड़कों पर हैं और बाकी छात्र युवा भी कभी भी सड़कों पर उतर सकते हैं।

जैसे फिर कभी न कभी सड़कों पर उतर सकता है समूचा मेहनतकश तबका इस अबाध पूंजी के मुक्तबाजार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध में।

कविता में आस्था यही सिद्ध करती है।

कविता धर्मांध राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति तो हरगिज नहीं हो सकती।

हर कविता की शक्ल वाल्तेअर जरूर है जिस के लिए मौत की सजा तय है।

सच वह भी अंतिम नहीं है जो तुलसी दास जी कहल वानी कि होइहिं सोई जो राम रचि राखा। राम जो रचि राखा, उसी को पलटने वाले कवि रहे हैं तमाम अगिनखोर।

बाकी दुनिया की तमाम कविताएं दरअसल बदलाव की नीयत की कविताएं हैं, जिनमें जीते जीते गोरख ऊबकर चल दिये, पाश आतंकवादियों के हाथों मारे गये, नवारुणदा कैंसर से जूझते जूझते चल दिये और पहाड़ों को हुड़के से जगाते रहे हमारे गिरदा और दिल्ली के मकबरों के बीच मुकम्मल ज़िन्दगी का शापिंग माल हाईराइज खोल बैठे हैं हमारे वीरेनदा।

हमारे लिए कोई कवि महान नहीं होता।

हमारे लिए कोई कवि अच्छा या बुरा नहीं होता।

नाम देखकर दाम तय करते हैं सौदागर मानुख और हम यकीनन सौदागर जमात के नहीं हैं। कविता लिख सकूं हूँ या नहीं, हूँ उसी गोरख, गिर्दा, पाश, नवारुण, चे, मायाकोवस्की वगैरह-वगैरह के गोत्र का ही हूँ और मेरे खून में भी डीएनए वहीं मूलनिवासी।

जिनके लिए कविता सौंदर्यबोध और व्याकरण नहीं है, न निहायत ध्वनियों का सिनेमाघर है, न भाषायी करतबी चमत्कार है, न जादुई यथार्थ है, न बंधी बंधायी कोई कैद गंगा है पवित्रतम सड़ांध।

बल्कि जिनके लिए एक मुकम्मल ज़िन्दगी है और दुनिया को उसकी धुरी पर चलते देने का गुरिल्ला युद्ध है निरंतर।

हम हर कविता में जनता का मोर्चा खोजते हैं।

हम हर कविता में जनसुनवाई खोजते हैं।

हम हर कविता में मुक्त बयार, उत्तुंग शिखर, अनबंधी नदियां और खिलते हुए बारूद के की देह में माटी की खुशबू के साथ एक मुकम्मल गुरिल्ला युद्ध प्रकृति पर्यावरण मनुष्यता और सभ्यता के हक में चाहते हैं।

ऐसी हर कविता के कवि हमारे वजूद में शामिल होते हैं और चाहे कविता वह रचे न रचे, असली कवि वही होता है जो माटी से गढ़ सके वह मुक्म्मल दुनिया रोज रोज, जिसे रोज रोज परमाणु विध्वंस के मुक्तबाजारी हीरक चतुर्भुज के विकास सूत्र में तबाह करने लगे हैं तमाम रंग बिरंगे अमानुष युद्ध अपराधी और जो मनुष्यों की दुनिया को ग्लोब बनाकर अपनी ही शक्लोसूरत वाली क्लोन रोबोट रिमोट नियंत्रित डिजिटल पुतलियों की नई सभ्यता रच रहे हैं।

हम हर पल सोलह मई के बाद की कविता में वह कविता खोज रहे हैं जिसे हमारे तमाम प्रियकवि रचते रहे हैं और जिसे पाश नवारुण गिरदा सुकांत चेराबंडुराजू और गोरख आखिरी सांस तक जीते रहे हैं और जिसे जीते हुए हम सबसे ज्यादा जिंदा हैं अब भी हमारे वीरेनदा।

हमारे हिसाब से हर कवि को कवि चाहे हो या न हो वह, कविता चाहे वह रचे न रचे, आखिरी सांस तक चेराबंडू, पाश, गिरदा और वीरेनदा की तरह दुनिया को बदल देने के इरादे के साथ एक मुकम्मल इंसान भी होना चाहिए।

हमारे हिसाब से कवि होंगे बहुत सारे श्रेष्ठ, शास्त्रीय और कालातीत महान, लेकिन ज़िन्दगी में कविता जीने वाले कवि कोई कोई होते हैं और खुशकिस्मत हैं हम कि वे सारे कवि हमारे ही वजूद में शामिल हैं।

[dropcap]वीरेनदा[/dropcap] से मिलकर इस रात के बीतने के बेचैन इंतजार को जी रहा हूँ फिलहाल और कहने की जरूरत नहीं कि इसबार दिल्ली आना बेहद अच्छा लग रहा है।

वीरेनदा से मिलकर फिर यह यकीन पुख्ता हुआ नये सिरे से कि कविता में ही रची बसी होती है मुकम्मल ज़िन्दगी जो दुनिया को खत्म करने वालों के खिलाफ बारूदी सुरंग भी है।

पलाश विश्वास

[author image=”https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSD_Jo0EyzC-_V8xGBjC_ijNo1ruhcPFFy7Bo-fRkLBQR-nQfk_NMMNrUshttps://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcSD_Jo0EyzC-_V8xGBjC_ijNo1ruhcPFFy7Bo-fRkLBQR-nQfk_NMMNrUs” ]पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।[/author]

Viren Dangwal was a renowned Hindi poet and recipient of the Sahitya Akademi Award 2004 in Hindi language for his book ‘Dushchakra Mein Srista’. He was a journalist and an academician.

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पलाश विश्वास
पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।