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क्या गोलवलकर रावण के साथ खड़े थे ?  समझिए आरएसएस का हिन्दुत्व कैसे हिदू धर्म का दुश्मन है…

क्या गोलवलकर रावण के साथ खड़े थे ? समझिए आरएसएस का हिन्दुत्व कैसे हिदू धर्म का दुश्मन है…

Was Golwalkar standing with Ravana? Understand how Hindutwa of RSS is an enemy of Hindu …

एक लोकतांत्रिक-मार्क्सवादी नज़रिए से वाराणसी की धर्म-संसद का विश्लेषण !

अमरेश मिश्रा

एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी-सनातनी-डेमोक्रेट के तौर पर मेरी वाम-उदारवादियों से गुजारिश है कि वे वाराणसी में जारी धर्म संसद (Dharm sansad in Varanasi ) का नज़दीक से अवलोकन करें।

इस विशाल आयोजन के सूत्रधार हैं द्वारका पीठ और बद्रीनाथ ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद।

पुरी और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य भी यहाँ विराजमान हैं।

The difference between Hindutva and Sanatan Dharma

यह एक अनूठा आयोजन है। इसमें हिंदुत्व और सनातन धर्म का भेद साफ़- साफ़ तौर पर परिलक्षित हो गया।

सनातन धर्म और हिन्दुत्व को जो झूठी डोर बांधे हुई थी, वो अब टूट गयी है।

सनातन धर्म और हिंदुत्व

Hindutva and Sanatan Dharma

हिंदुत्व और सनातन धर्म के मध्य विवादों/ संघर्ष का इतिहास काफी पुराना है। इसके लिए हमें 1940s से 1950s के कालखंड की तरफ जाना होगा।

सनातन धर्म के प्रमुख विचारक-चिंतक और संत करपात्री जी महाराज ने पचास के दशक में एक पुस्तक लिखी थी: ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू धर्म'। इसमें उन्होंने गोलवलकर की पुस्तक ‘Bunch of Thoughts’ को अधार्मिक व् संशोधनवादी बताते हुए इसकी कटु आलोचना की थी।

उन्होंने कहा कि ‘अपने धर्म’ को इस्लाम और ईसाई धर्म से अलग दिखाने के चक्कर में गोलवलकर ने हिन्दू धर्म में किसी भी एक परम पवित्र पुस्तक के अस्तित्व को सिरे से नकार दिया। गोलवलकर पर वेदों की महत्ता को नकारने का आरोप लगाते हुए उन्होंने आरएसएस को एक धर्मद्रोही/अधर्मी संगठन घोषित किया। करपात्री जी ने 'भगवा ध्वज‘ को सनातन धर्म/हिन्दू धर्म का प्रतिनिधि मानने से भी इनकार कर दिया। स्वामी जी के अनुसार अलग- अलग युग में अलग-अलग प्रकार के ध्वज अस्तित्व में रहे हैं। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का ध्वज रावण के साथ युद्ध में राम के ध्वज से एकदम भिन्न था।

करपात्रीजी ने गोलवलकर के ‘हिन्दू राष्ट्रीयता' के विचार और भारतीय मुसलमानों को ‘मुस्लिम हिन्दू’ कहे जाने की चालों को भी पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू धर्म या तो एक धर्म (सनातन धर्म) हो सकता है या फिर एक गैर-धार्मिक राष्ट्रीयता–दोनों एकसाथ कदापि नहीं।

गोलवलकर द्वारा हिन्दू धर्म को एकसाथ धर्म और राष्ट्रीयता दोनों कहे जाने पर करपात्री जी ने इस संघ विचारक की कटु शब्दों में आलोचना की।

 

उन्होंने कहा कि आरएसएस भारत से इतर राष्ट्रीय पहचान रखने वालों को सनातन धर्म अपनाने से रोकता है। दूसरी तरफ संघ गैर-हिन्दू भारतीयों को भारतीय होने से रोकता है

Religion and nationality two different things

राष्ट्रीयता को धर्म से जोड़ने की संघ के कुत्सित प्रयासों पर करपात्री जी आलोचनात्मक टिप्पणियाँ आज अत्यधिक प्रासंगिक हो चली हैं।

इस मुद्दे पर करपात्री जी जमायत-उलेमा- ए-हिन्द के विचारक मौलाना हुसैन अहमद मदनी के साथ खड़े दिखते हैं, जिन्होंने मुस्लिम लीग और देश विभाजन का विरोध करते हुए कहा था कि धर्म और राष्ट्रीयता दो अलग-अलग बातें हैं।

राष्ट्र का निर्माण धर्म की नींव पर नहीं किया जाता। इस मुद्दे पर करपात्री जी और मौलाना मदनी दोनों ही विशुद्ध लोकतान्त्रिक और मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के नजदीक खड़े दिखाई देते हैं।

हिन्दू देवी-देवताओं को ‘महापुरुष' (गोलवलकर)' माना जाए या ‘दिव्य' (करपात्री जी)–यह करपात्री जी और गोलवलकर के मध्य विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा था।

स्वामी स्वरूपानंद

Swami Swaroopanand

सन 1940 में स्वामी स्वरूपानंद जी, उस समय पोथीराम उपाध्याय, देश के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए।

1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 'क्रांतिकारी' के रूप मे प्रसिद्ध पोथीराम जेल में डाल दिए गए। 1950 में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद  सरस्वती (1941- 53) ने पोथीराम को ‘दंडी स्वामी' होने की दीक्षा दी और स्वामी स्वरूपानंद नाम दिया।

1953 में स्वामी ब्रह्मानंद जी के देहावसान के उपरान्त स्वरूपानंद जी ज्योतिर्मठ के नए शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोध आश्रम ( 1953-73) के शिष्य बन गए।

शीघ्र ही स्वामी स्वरूपानंद करपात्री महाराज द्वारा स्थापित अखिल भारतीय रामराज्य परिषद् के अध्यक्ष बने।

रामराज्य परिषद के अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही स्वामी स्वरूपानंद का गोलवलकर से जोरदार विवाद हुआ। राम एक 'महापुरुष' थे–गोलवलकर के इस दावे का खंडन करते हुए स्वामी स्वरूपानंद ने जो कहा वह एक ऐतिहासिक उक्ति बन गई।

उन्होंने कहा “वह रावण था जिसने राम को अवतारपुरुष नहीं बल्कि एक मानव कहा था। तो क्या मान लिया जाए कि तुम रावण के साथ खड़े हो, गोलवलकर?’’

वैज्ञानिक सिद्धांत और हिंदुत्व के बीच संघर्ष है

There is a conflict between scientific theory and Hindutva

स्वामी स्वरूपानंद ने सरल भाषा और तर्कों के माध्यम से धर्म के नज़रिए से फासीवाद के अन्तर्निहित विरोधाभासों को उभारा।

स्वरूपानंद जी ने विस्तार से समझाया कि किस प्रकार फासीवादी एक तरफ देवी- देवताओं/भगवान के आलौकिक अस्तित्व को नकारते हैं। और वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय पूंजीपतियों और सामाज्यवादियों की गुलामी करते हुए अपनी लोकतंत्र विरोधी, धर्म विरोधी, नास्तिक विरोधी, निरंकुशतावादी, नस्लीय, मजदूर विरोधी, मानवता विरोधी, विचारधारा और रवायतों के पोषण के लिए इन्हीं देवी-देवताओं के नाम का सहारा लेते रहते हैं।

सीधी बात है: राम अगर भगवान हैं, तो फासीवादी उनका राजनीति और पूंजीपतियों-सामंतों के पक्ष मे इस्तेमाल नहीं कर सकते। क्यूंकि भगवान आदर्शों और दिव्यता से जुड़े हैं। फिर भगवान का गलत इस्तेमाल बिना शंकराचार्यों और ब्राहमण पुरोहितों के समर्थन से नही हो सकता।

इसीलिये गोलवरकर भगवान राम को महापुरुष का दर्जा देते हैं। RSS एक अलग पंथ है। वो चाहता है, कि सनातन धर्म समाप्त हो और उसकी जगह 'हिन्दुत्व' स्थापित हो जाये। भगवान को मानव का दर्जा देकर, RSS मन्दिरों पर कब्ज़ा करेगा। योगी का हनुमानजी को दलित कहना भी इसी षड्यंत्र का हिस्सा है।

 

हिटलर से लेकर मुसोलिनी तक और सावरकर से गोलवलकर तक सभी फासिस्ट ताकतें सेक्युलर स्पेस में पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को पोषित करने और नागरिक-अधिकारों को कुचलने के लिए भगवान के पुरुष नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं ताकि खुद जवाबदेही से बचे रहें।

असली सेक्युलर भगवान के नाम का सहारा नहीं लेते। वे अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए तर्क, बहुलतावाद, विज्ञान और लोकतंत्र का सहारा लेते हैं।

1973 मे स्वामी कृष्णबोध आश्रम के देहावसान के उपरांत, ज्योतिर्मठ, बदरीनाथ के शंकराचार्य पद पर स्वामी स्वरूपानंद आसीन हुए। तदुपरांत वह 1982 में द्वारका पीठ के शंकराचार्य भी बने।

1950s से करपात्री जी और स्वामी स्वरूपानंद पर आरएसएस के हमले बढ़ गए। उनके द्वारा आरएसएस पर लिखी गईं पुस्तकें बाज़ार से गायब होने लगीं।

1980 में संघ ने विश्व हिन्दू परिषद के ज़रिए ज्योतिर्मठ बदरीनाथ को हथियाने की कोशिश की और वासुदेवानन्द को शंकराचार्य घोषित कर दिया। मामला अदालत पहुंचा। कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद की शंकराचार्य पदवी को बरक़रार रक्खा।

जब 2014 में भाजपा ने वाराणसी में ‘हर-हर मोदी' का नारा लगाया तो स्वामी स्वरूपानन्द ने ही सबसे पहले इस पर आपत्ति जताई।

2015 में स्वामी स्वरूपानंद ने कहा

"भ्रष्टाचार खत्म करने के मोदी के दावे के बावजूद रिश्वतखोरी बदस्तूर जारी है। समाज में नैतिकता और नैतिक मूल्यों का ह्रास इसका सबसे बड़ा कारण है।"

2016 में आरएसएस पर टिप्पणी करते हुए स्वामी स्वरूपानंद ने कहा,

‘’संघ हिन्दुओं की बात करता है मगर उनके लिए करता कुछ नहीं है। यह और भी खतरनाक बात है कि हिन्दू हित की रक्षा के नाम पर वे लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। आज देश पर भाजपा का शासन है। इससे पहले कांग्रेस थी। मगर दोनों ही सरकारों के दौर में गौहत्या बंद नही हुई। तो फिर भाजपा और कांग्रेस में क्या भिन्नता है? भाजपा ने वादा किया था कि वे राम मंदिर बनाएंगे और धारा 370 को हटाएंगे। अब वे कहते हैं कि इस बारे में दोबारा सोचना पड़ेगा . . . . . .’’

स्वामी स्वरूपानंद ने अमेरिकी साम्राज्यवाद को कटघरे में खड़ा किया और इस्कॉन ISCKON को सीआईए का एजेंट बताया।

फरवरी 2016 में स्वामी स्वरूपानंद ने इस्कॉन को सनातन धर्म का एक अंग मानने से इनकार कर दिया और आरोप लगाया कि यह हवाला कारोबार का अड्डा है जिसका इस्तेमाल भारत से यूएस और अन्य देशों को पैसा भेजने के लिए किया जाता है।

उन्होंने भारत में इस्कॉन के मंदिरों की बढती हुई संख्या पर भी सवाल उठाए और पूछा कि वे आसाम और छत्तीसगढ़ में मंदिर क्यों नहीं बनाते जहां मन्दिरों की भारी कमी हैं।

वाराणसी धर्म-संसद

वाराणसी धर्म-संसद में स्वामी स्वरूपानंद ने कुछ बातें स्पष्ट तौर पर कहीं हैं:

1 – कोई राजनीतिक दल या उनके अनुषांगिक संगठन मंदिर बनाने का अधिकार नहीं रखते। यदि वे ऐसा करते हैं तो यह संविधान का उल्लंघन होगा। केवल अराजनैतिक धर्मगुरुओं को यह अधिकार है कि वे मंदिर निर्माण का बीड़ा उठाएं

2 – इस बात का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि बाबर अयोध्या आया था और उसने राम मन्दिर को ढहाकर उसकी जगह मस्जिद का निर्माण कराया। सच्चाई यह है कि हिन्दू वहां पूजा-अर्चना करते रहे हैं, वहां हिन्दू मन्दिरों जैसे स्तम्भ और मंगल कलश आदि मौजूद हैं तो इससे उलटे यह प्रमाणित होता है कि 6 दिसम्बर, 1992 को कारसेवकों ने एक मस्जिद नहीं बल्कि हिन्दू मंदिर को ढहाया था!

3 – राममन्दिर निर्माण के लिए आरएसएस पर कतई भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि वे राम को भगवान नहीं बल्कि मात्र एक ‘महापुरुष' मानते हैं। मुस्लिम नेता वहां बाबरी मस्जिद के अस्तित्व के न होने के बारे में स्वामी स्वरुपानंद के तर्कों को सुनने के लिए तैयार हो गए थे, मगर आरएसएस ने उन्हें विवादित स्थल पर नहीं जाने दिया।

4 – अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति/ पुतला नहीं बनाया जा सकता क्योंकि पुतले महापुरुषों के बनाए जाते हैं, भगवान् के नहीं। राम भगवान हैं और उनको मंदिर में ही विराजमान किया जा सकता है।

 

5 – हनुमान इत्यादि देवताओं को किसी जाति विशेष से सम्बद्ध करना अपराध की श्रेणी में आता है।

6 – मस्जिद के सामने मंदिर नहीं बनाया जाना चाहिए वरना रोज़ का झगड़ा रहेगा। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अधिग्रहीत भूमि का एक हिस्सा मुसलमानों को दिया था। आरएसएस के वकीलों ने इसका विरोध नहीं किया क्योंकि वे मंदिर का निर्माण नहीं, झगड़ा जारी रखना चाहते हैं।

7 – स्वामी स्वरूपानंद रामजन्मभूमि मामले में एक वादी हैं। यह उनका ही वकील था जिसने ‘नमाज़ के लिए मस्जिद ज़रूरी' केस को उच्चतर बेंच में जाने से रुकवाया। जिससे झगड़ा आगे नहीं बढ़ पाया।

स्वामी स्वरूपानंद और उनके पट्टशिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सनातन धर्म के 'ज्ञान मार्ग' का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये दोनों धर्म और राजनीति का घालमेल करने वाली धर्मान्धता और अंधभक्ति के खिलाफ एक मजबूत कवच की तरह खड़े हुए हैं। दोनों ही धर्मशास्त्रों के प्रकांड विद्वान हैं। दोनों ने ही उत्तर भारत में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाई।दोनों ही ‘मोदी संक्रमण' से लड़ रहे हैं।

स्वामी स्वरूपानंद और उनके ज्ञानवर्धक प्रवचनों को सुनिए। यूरोप ने भी कट्टरवादी धर्म और फासीवाद के बीच खूब वाद-विवाद देखे हैं। लेकिन प्रोटेस्टेंट हो या कैथोलिक, दोनों ही ईसाई संगठनों ने हिटलर और मुसोलिनी के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार नहीं किया।

सौभाग्य से भारत में हम सनातन धर्म के गुरुओं को फासीवादी ताकतों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए देख-सुन रहे हैं।

स्वामी स्वरूपानंद ने हाल ही विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित अयोध्या की धर्मसभा की हवा निकलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न्यायालय के फैसले से इतर स्वामी स्वरूपानंद ही एकमात्र ऐसी शख्सियत हैं जो अयोध्या विवाद का शांतिपूर्ण हल निकाल सकते हैं।

अनुवाद: Sadhvi Meenu Jain

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, इतिहासकार व फिल्म लेखक हैं।)

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