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क्या सचमुच पूँजीवाद के विरोधी थे लोहिया?

लोहिया, आंबेडकर और गाँधी (भाग-2) | Lohia, Ambedkar and Gandhi

लोहिया न जाति से ऊपर उठे थे और न धर्म से

(यह आलेख रोशन प्रेमयोगी के उपन्यास ‘आजादी: टूटी फूटी’ की समीक्षा नहीं हैं, पर उसके बहाने लोहिया के समाजवाद की आलोचना है।)

लोहिया के विचारों को लेकर कुछ सवाल उभरते हैं। मसलन, यह सच है कि सिर्फ संसद में लड़ने से देश में क्रान्ति नहीं होती है। इसके लिए जनता के बीच जाना पड़ता है। लोहिया जनता के बीच गए भी थे, पर नतीजा क्या निकला? क्या वे काँग्रेसवाद और पूँजीवाद का खात्मा कर सके? सच यह भी है कि अपने को लोहिया का उत्तराधिकारी मानने वाले दल भी केन्द्र में काँग्रेस की सरकार का ही समर्थन करके उसकी जनविरोधी आर्थिक नीतियों को ही मजबूत करते रहे। पूँजीवाद ने निजी पूँजीवाद का रूप ले लिया, न जातिवाद खत्म हुआ और न साम्प्रदायिकता की आग ठण्डी हुई। क्या इस विफलता के लिए खुद लोहिया और उनके विचार ही जिम्मेदार नहीं थे?

लोहिया का समाजवाद किस तरह का था?

आइए देखते हैं कि उनका समाजवाद किस तरह का था? लेकिन पहले मैं इस भ्रम को दूर करना जरूरी समझता हूँ कि संसद में लड़ने से क्रान्ति नहीं होती। क्रान्ति होती है, संसद से ही क्रान्ति होती है। पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि संसद में किस तरह के लोग जाते हैं। अगर संसद में क्रान्ति की चेतना रखने वाले व्यक्ति चुनकर जाते हैं, तो वे निश्चित रूप से देश में गरीबों, मजदूरों और आम जनता के हित में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के ही कानून बनाएंगे। लेकिन अगर संसद पर पूँजीवादी, सामन्तवादी, जातिवादी और साम्प्रदायिक शक्तियों का प्रभुत्व रहेगा, तो उस संसद में कुछ भी चीखने-चिल्लाने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

लोहिया नेहरू के घोर विरोधी थे और विरोधी इसलिए थे, क्योंकि नेहरू का झुकाव कम्युनिज्म की ओर था। इस अर्थ में लोहिया नेहरू के नहीं, वरन् नेहरू के कम्युनिज्म-प्रेम के विरोधी थे। इसका अर्थ है कि लोहिया को सबसे ज्यादा नफरत कम्युनिज्म से थी।

उपन्यास यह भी बताता है कि नेहरू ने कभी गाँधी का विरोध नहीं किया, पर वे उनके कभी समर्थक भी नहीं रहे थे। सम्भवतः लोहिया इसी बिना पर नेहरू के विरोधी थे। अतः उपन्यास के अनुसार, गाँधी और कम्युनिज्म, ये दो चीजें थीं, जिसने लोहिया को नेहरू का विरोधी बनाया था।

शायद आंबेडकर के प्रति भी लोहिया के झुकाव का कारण आंबेडकर का तथाकथित कम्युनिस्ट-विरोध ही हो सकता है। इस पर आगे चर्चा करेंगे। अभी नेहरू पर ही कुछ चर्चा…।

सम्भवतः 1925 में नेहरू रूस गए थे, जहाँ उन्होंने तीन साल रहकर 1917 की क्रान्ति के बाद के रूस को देखा था। उन्होंने वहाँ सरकारी और सहकारी कृषि फारमों को देखा था, सबके लिए अनिवार्य, समान और निःशुल्क शिक्षा-व्यवस्था को देखा था और किस तरह वहाँ की सरकार ने सब को रोजगार, मकान और चिकित्सा-सुविधा उपलब्ध कराई थी, इसे देखा था। रूस की समाजवादी व्यवस्था ने उन्हें प्रभावित किया था। रूस से लौटकर उन्होंने अपने अनुभवों पर एक किताब लिखी थी, जो हिन्दी में ‘आँखों देखा रूस’ नाम से प्रकाशित हुई थी।

जब देश को स्वतन्त्रता मिली और नेहरू प्रधानमन्त्री बने, तो उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया। उन्होंने सहकारी और सरकारी क्षेत्रों का विस्तार किया, जिसने देश के लाखों नौजवानों को रोजगार दिया, और रिटायरमेंट के बाद उनकी सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी की। सवाल पैदा होता है कि लोहिया उस नेहरू को क्यों नकार रहे थे, जिसने रेल, सड़क परिवहन, बाँध, विद्युत, मिल, विश्वविद्यालय सबका सरकारी क्षेत्र में विकास किया था। आज यही सरकारी क्षेत्र तहस-नहस हो गया और बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुँच गई। जो बैंक पहले प्राइवेट सेक्टर में थे, उनका भी इन्दिरा गाँधी ने एक झटके में राष्ट्रीयकरण कर दिया था। अब उन पर भी निजी क्षेत्र का संकट मंडरा रहा है।

पूँजीवाद के मुखर विरोधी माने जाने वाले लोहिया क्या सचमुच पूँजीवाद के विरोधी थे? क्या था उनका समाजवाद?

जब वे यह कहते हैं कि उन्हें अमीर की रसोई में पनीर पकने से एतराज नहीं है, वह खूब पनीर खाए, पर गरीब को भी नमक के साथ रोटी खाने का हक मिलना चाहिए, तो लोहिया अमीर और गरीब की खाई पाटना नहीं चाहते थे, वरन् वे अमीर को भी बनाए रखना चाहते थे और गरीब को भी। अमीर माल-पुआ खाने के लिए कितना ही शोषण करे, चोरी करे, लूट करे, करता रहे, पर गरीब को भी रोटी मिलती रहे, पनीर के साथ नहीं, तो नमक के साथ। लोहिया का समाजवाद यदि यही था, तो माफ कीजिएगा, यह पूँजीवाद का ही उदार चेहरा है। लेकिन क्या गरीब की जरूरत सिर्फ रोटी-नमक है? उसे शिक्षा, चिकित्सा, कपड़ा और मकान नहीं चाहिए? क्या उसकी रसोई में पनीर नहीं पकना चाहिए? क्या वह अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनाने का सपना नहीं देख सकता? उपन्यास में लोहिया की दृष्टि से इसमें कोई बात नहीं कही गई है।

सवाल यह नहीं है कि ‘नेहरू का शीशमहल समाजवाद की आँधी में चूरचूर हो गया’, वरन् सवाल यह है कि समाजवाद भी कहाँ कायम हो सका? अगर इस बात पर तालियाँ बजाई जा सकती हैं कि बंगाल में ममता बनर्जी ने कम्युनिस्टों को राजमहल से निकालकर बाहर कर दिया, तो क्या यह खुशी राजमहल के अन्दर पूँजीवादियों के दाखिल हो जाने की नहीं है?

डॉ. आंबेडकर के बारे में लोहिया का यह कहना कि अगर आंबेडकर का अचानक निधन न हुआ होता, तो वे काँग्रेस पार्टी की मजार बनाकर गाँधी का सपना पूरा करते, हास्यास्पद ही लगता है। यह सच है कि गाँधी ने काँग्रेस पार्टी को खत्म करने की बात कही थी, लेकिन चुनावों में हराकर नहीं, वरन् वे काँग्रेस को भंग करके किसी दूसरी पार्टी का निर्माण चाहते थे। लेकिन लोहिया आंबेडकर के साथ गठजोड़ करके काॅग्रेस के खिलाफ माहौल बनाकर उसे चुनावों में हराना चाहते थे। क्या इससे काँग्रेस की मजार बन जाती? 2014 में अकेले नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में काँग्रेस के खिलाफ माहौल बनाकर संसद में लगभग उसका सफाया ही कर दिया। वह एक मजबूत विपक्ष की भूमिका में भी नहीं रह गई, तो क्या यह मान लिया जाए कि काँग्रेस की मजार बन गयी, उसका वजूद मिट गया?

हाँ, इतिहास में यह दर्ज है कि लोहिया और आंबेडकर के बीच संवाद और पत्राचार हुआ था, यह भी कि लोहिया आंबेडकर के साथ एक साझा मंच बनाकर काँग्रेस को दफन करना चाहते थे, पर, अचानक आंबेडकर का निधन हो जाने से उनका सपना बिखर गया। और यह सपना था गाँधीवाद को स्थापित करना। सवाल यह है कि अगर आंबेडकर की मृत्यु न हुई होती, तो क्या वह साझा मंच बनता?

क्या आंबेडकर लोहिया के साथ जाते?

यद्यपि, डॉ. आंबेडकर की आकस्मिक मृत्यु के साथ ही वह प्रसंग भी समाप्त हो गया, पर मेरा अपना मत है कि लोहिया के साथ आंबेडकर कभी मंच नहीं बनाते। इसका कारण है लोहिया की गाँधी-भक्ति, जो आंबेडकर को पसन्द नहीं थी।

आंबेडकर गाँधीवाद के धुर विरोधी थे और उसे समाजवादी व्यवस्था के लिए घातक मानते थे। लोहिया राम और रामायण में भी जनता की आस्था बनाए रखना चाहते थे, जो आंबेडकर की दृष्टि में हिन्दू अस्मिता को उभारने का साम्प्रदायिक उपक्रम था।

लोहिया राम को मर्यादा पुरुष मानते थे, जिनके बारे में वे कहते थे कि  उन्होंने अपनी पत्नी का निर्वासन करके भी मर्यादा का पालन किया था। यही मर्यादा-आदर्श वे गाँधी में देखते थे। इसीलिए वे गाँधी को राम का महान वंशज मानते थे। गाँधी में उनकी अटूट आस्था हर समस्या का समाधान गाँधीवाद में देखती थी।

सच तो यह है कि आंबेडकर के प्रति भी लोहिया के अच्छे विचार नहीं थे। वे उन्हें अंगे्रजी साम्राज्य के समर्थक के रूप में ही देखते थे। उन्होंने ‘समाजवादी आन्दोलन का इतिहास’ में लिखा है कि डॉ. आंबेडकर विद्वान व्यक्ति थे और हिन्दुस्तान में विद्वान व्यक्ति के लिए थोड़ा आदर हो ही जाता है, चाहे वह वाहियात विद्वान हो या राक्षस।

इसी किताब में वे काँग्रेस द्वारा आंबेडकर की आरती उतारे जाने की भी निन्दा करते हैं।

इसी किताब में यह भी दर्ज है कि लोहिया रामास्वामी नायकर का समर्थन लेने के लिए उनसे मिलने तमिलनाडु जाते हैं, तो 10-15 लाख ब्राह्मण उनसे नाराज हो जाते हैं, और वे तुरन्त नायकर से अलग हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति क्रान्ति करेगा?

एक जगह लोहिया कहते हैं कि अगर वे भी चमार या अहीर होते तो तीन-चार करोड़ लोग उनके साथ भी खड़े होते। यह उनका आंबेडकर पर कटाक्ष था।

इस प्रकार लोहिया न जाति से ऊपर उठे थे और न धर्म से। ऐसे लोहिया से आंबेडकर का गठजोड़ हो ही नहीं सकता था। अगर आंबेडकर जीवित रहते तो गाँधीवाद और राम-रामायण की बुनियाद पर लोहिया से गठजोड़ करना तो दूर, वे उन्हें समाजवादी ही मानने से इनकार कर देते।

कॅंवल भारती

………जारी

लोहिया का समाजवाद और ‘आज़ादी टूटी-फूटी’


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