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फेफड़े में पानी का जमाव : कारण, पहचान और निदान

अक्सर आपने रिश्तेदारों, मित्रों व पड़ोसियों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान यह सुना होगा कि उनके या उनके किसी जान पहचान वाले के फेफड़े में या छाती के अन्दर पानी इकट्ठा हो गया था और डॉक्टर का लम्बा इलाज चला तथा सुई या इन्जेक्शन के जरिये पानी निकाला गया।

कभी यह भी सुनने में आया होगा कि छाती में नली डलवाकर पानी पूरा निकलवाना पड़ा क्योंकि सुई से पानी पूरा निकल नहीं पाया था या फिर पानी; इकट्ठा हुआ तरल पदार्थ काफी गाढ़ा हो गया था जो पतली सुई के जरिये बाहर नहीं आ सकता था।

कभी यह भी सुनने में आया होगा कि किसी मरीज की छाती से एक बार पानी पूरा निकलवा देने के बाद भी दोबारा से पानी भर गया जिसे फिर से निकलवाना पड़ा।

कभी यह भी सुनने में आया होगा कि किसी व्यक्ति की छाती में बार-बार पानी का जमाव हो जाता है और फेफड़े पर दबाव की वजह से साँस फूलने लगती है।

आखिर यह छाती में पानी का जमाव है क्या?

What is it the accumulation of water in the chest?

छाती के अन्दर फेफड़े के चारों ओर पानी के जमाव को मेडिकल भाषा में ‘प्ल्यूरल इफ्यूजन’ या ‘हाइड्रोथोरेक्स’  कहते हैं।

जब पानी की जगह खून का जमाव होता है तो इसे ‘हीमोथोरेक्स’ कहते हैं।

जब ‘लिम्फ’ नामक तरल पदार्थ का जमाव होता है तो इसे ‘काइलोथोरेक्स’ कहते हैं।

फेफड़े और छाती की दीवार के बीच खाली जगह होती है जिसमें फेफड़ा स्वतंत्र रूप से साँस लेने के वक्त नियमित रूप से फैलता और सिकुड़ता है। इस खाली जगह को मेडिकल भाषा में ‘प्ल्यूरल स्पेस’ कहते हैं।

सामान्यत: फेफड़े की ऊपरी सतह से पानी नियमित रूप से रिसता रहता है, कभी-कभी पानी पेट से भी छेदों के जरिये छाती के अन्दर पहुँचता रहता है।

साधारणत: एक नार्मल व्यक्ति में यह खाली जगह में रिसा हुआ पानी को छाती की अन्दरूनी दीवार लगातार सोखती रहती है जिसके परिणामस्वरूप इस ‘प्ल्यूरल स्पेस’ में कभी पानी इकट्ठा हो ही नहीं पाता।

छाती की अन्दरूनी दीवार में लगभग बीस गुना फेफड़े के ऊपरी सतह से रिसते पानी को सोखने की क्षमता होती है। इस वजह से पानी रिसने व सोखने के बीच एक संतुलन बना रहता है। पर जब किसी वजह या बीमारी के कारण फेफड़े के ऊपरी सतह से पानी रिसने की मात्रा प्रचंड हो जाए या छाती की दीवार की सोखने की क्षमता में भारी कमी आ जाए तो यह सूक्ष्म संतुलन बिगड़ जाता है और फेफड़े के चारों ओर छाती के अन्दर पानी या तरल पदार्थ इकट्ठा होना षुरू हो जाता है। यहीं से ‘प्ल्यूरल इफ्यूजन’ की भूमिका बन जाती है।

क्यों होता है यह फेफड़े के चारों ओर पानी का जमाव?

Why is it the setting of water around the lungs?

अपने भारतवर्श में छाती में पानी के इकट्ठा होने का सबसे बड़ा कारण ‘टयूबरक्युलर प्ल्युराइटिस’ यानी छाती में टी.बी. का इन्फेक्शन है।

टी.बी. के इन्फेक्षन की वजह से फेफड़े की ऊपरी सतह में तेज प्रतियिा हाती है जिसके परिणामस्वरूप दीवार से तेज गति से पीला पानी रिसने लगता है जिसको छाती की अन्दरूनी दीवार तीव्र गति से सोख नहीं पाती और छाती में फेफ ड़े के चारों ओर पीला पानी इकट्ठा होने लगता है।

अगर समय रहते इस टी.बी. इन्फेक्शन वाले पीले पानी के जमाव को रोका नहीं गया तो फेफड़े के नष्ट हो जाने के साथ-साथ गंभीर परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं।

छाती में तरल पदार्थ के जमाव होने का दूसरे बड़े मुख्य कारण न्यूमोनिया का इन्फेक्शन, फेफड़े में मवाद, व ब्रानकियक्टेसिस नामक रोग है। इन सब अवस्थाओं में इकट्ठा हुआ पानी बड़ी जल्दी मवाद यानी पस में परिवर्तित हो जाता है। इस अवस्था को मेडिकल भाषा में ‘पायोथोरेक्स’ कहते हैं। इस अवस्था में बरती गई लापरवाही जानलेवा हो सकती है। छाती में पानी के जमाव का अपने देश में एक ओर मुख्य कारण कैंसर का रोग है। छाती में कैंसर की वजह से पानी जमा होने में तीन तरह के कैंसर प्रमुख भूमिका अदा करते हैं। एक फेफड़े का कैंसर, दूसरा स्तन यानी ब्रेस्ट का कैंसर तथा तीसरा गिल्टी का कैंसर यानी लिम्फोमा। इन सब के अलावा दूसरे अन्य कारण भी छाती में पानी के जमाव के होते हैं जैसे जिगर की बीमारी यानी लिवर सिरोसिस, पेट में पानी यानी असाइटिस, या फिर दिल की बीमारी। कुछ मरीजों में छाती के अन्दरूनी दीवार का टयूमर यानी मीजोथीलियोमा भी जिम्मेदार होता है।

छाती में पानी के जमाव के लक्षण symptoms of Water logging in the chest :-

बुखार जो पसीने के साथ प्रतिदिन षाम को तेज़ हो जाता हो

वज़न में गिरावट

साँस फूलना या साँस लेने में छाती में दर्द होना

बलगम का आना

शरीर को हिलाने में छाती में गढ़ गढ़ की आवाज़ होना

छाती के बाँयी या दाहिनी ओर भारीपन का अहसास होना

अगर इलाज में लापरवाही करें तो क्या होगा?

अगर फेफड़े के चारों ओर इकट्ठे हुए पानी को ऐसे ही छोड़ दें तो इसके दुष्परिणाम मरीज को भुगतने पड़ते हैं।

समय बीतते इस इकट्ठे हुए पानी के चारों ओर झिल्ली का निर्माण हो जाता है। यह झिल्ली एक तरफ तो पानी को सोखने नहीं देती है तो दूसरी तरफ निकट स्थित फेफड़े के हिस्से को दबाती है जिससे फेफड़े की कार्यप्रणाली में बाधा पड़ती है। कभी-कभी पानी तो सूख जाता है पर उसकी जगह एक मजबूत ऊत्तकों का जाल बन जाता है जो फेफड़े के हिस्से को चारों ओर से जकड़ लेता है। इस दशा को मेडिकल भाषा में ‘फाइब्रोथोरेक्स’ कहते हैं। इसमें आपरेशन के माध्यम से जकड़े हुए फेफड़े को छुड़ाना पड़ता है। कभी-कभी यह इकट्ठा हुआ पानी मवाद ; पस में परिवर्तित हो जाताा है। इसे जल्दी से जल्दी अगर निकाला नहीं गया तो खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है।

कभी-कभी इस इकट्ठे हुए पानी से फेफड़े के अन्दर से साँस नली का हिस्सा सीधा-सीधा जुड़ जाता है और खाँसी के साथ बलगम व पानी आने लगता है। इस भयानक दशा को मेडिकल भाषा में ‘बी. पी. एफ .’ यानी ब्रान्को प्ल्यूरल फिष्च्युला कहते हैं।

इसमें एक तरफ का फेफड़ा तो नष्ट होता ही है और दूसरी तरफ के फेफड़े के भी नष्ट होने का खतरा मँडराने लगता है।

ऐसी भयावह स्थिति को पनपने नहीं देना चाहिए, तुरन्त किसी थोरेसिक सर्जन यानी चेस्ट सर्जन से संपर्क करना चाहिए।

अगर आपके फेफड़े के चारों ओर पानी का जमाव है तो क्या करें? What to do if you have water deposits around your lungs?

अगर खाँसी या बलगम की शिकायत है और साथ-साथ बुखार और छाती में दर्द व भारीपन है तो सर्वप्रथम एक छाती का एक्सरे करवायें। छाती का एक्सरे आज के युग में सबसे सस्ता, सुगम व उपयागी जाँच है।

इसके बाद किसी फिजीशियन या चेस्ट फिजीशियन से संपर्क करें। अगर फेफड़े के चारों और पानी का जमाव है तो पानी की मात्रा का निर्धारण, छाती का अल्ट्रासाउन्ड जाँच के जरिये अवश्य करवा लें।

अगर पानी की मात्रा 300 मिली से ज्यादा है तो अपने फिजीशियन से आग्रह करें कि किसी थोरेसिक सर्जन को दिखवा कर उनकी राय अवश्य ले लें।

अगर पानी 300 मिली से ज्यादा है तो टी.बी. की दवा के जरिये उसका पूर्णतय: सूख पाना मुश्किल है, इसलिए इन्जेक्शन के जरिये उसका निकालना अति आवश्यक है।

याद रखें इन्जेक्शन द्वारा पानी निकालने के लिए अल्ट्रासाउन्ड या सी. टी. मशीन की निगरानी अति आवश्यक है।

बगैर अल्ट्रासाउन्ड मशीन की निगरानी के पानी कभी न निकलवायें, अन्यथा कभी कभी भयंकर रक्तस्त्राव जैसी समस्या आ सकती है।

अत्यन्त आवश्यक है छाती का पूरा पानी निकलवाना

अगर इकट्ठे हुए पानी की मात्रा 400 मिली या अधिक है तो तुरन्त किसी थोरेसिक सर्जन से संपर्क करें और छाती में टयूब डलवा कर सारा पानी निकलवा दें जिससे फेफड़ा ज़ख्मी व क्षतिग्रस्त होने से बच जाए। अपने भारतवर्ष में यह देखा गया है कि फिजीशियन टयूब द्वारा छाती से पानी निकलवाने के प्रति काफी उदासीन रहते हैं और बार बार इन्जेक्शन द्वारा पानी निकलवाते रहते हैं।

होना यह चाहिए अगर एक बार सुई द्वारा अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो तुरन्त किसी थोरेसिक सर्जन की मदद से टयूब द्वारा छाती से पानी निकलवा देना चाहिए।

टयूब द्वारा पानी निकलवाना फेफड़े की दुर्दशा रोकने का सबसे सरल व समयोचित उपाय है।

पानी निकलवाने के बाद भी फिजीशियन द्वारा दी जाने वाली टी.बी. की या अन्य कोई दवा बन्द न करें, क्योंकि पानी जमा होने के कारणों का निदान होना अत्यन्त आवश्यक है। अगर समय रहते पानी न निकलवाने के कारण फेफड़ा जकड़ या सिकुड़ गया है तो हाथ पर हाथ धर कर मत बैठिये, तुरन्त किसी थोरेसिक सर्जन से आपरेशन करवा के फेफड़े को नष्ट होने से बचाइये।

अगर छाती में पानी बार बार भर जाता हो तो क्या करें? What to do if the chest gets filled with water again and again?

कैंसर के मरीजों में छाती से पानी एक बार निकलवा देने के बावजूद भी बार बार पानी भर जाता है। इसके लिए ‘प्ल्यूरोडेसिस’ नामक विधि का सहारा लिया जाता है, जिसमें छाती के अन्दर एक विशेष दवा डाली जाती है जो छाती के अन्दर की दोनों दीवारों को आपस में चिपकाने में मदद करती है जिससे दुबारा पानी इकट्ठा होने की जगह ही न रहे।

अगर छाती में इकट्ठा हुआ पानी मवाद में बदल गया है तो क्या करें? What to do if the water collected in the chest has turned into pus?

अगर छाती में इकट्ठा हुआ पानी मवाद में परिवर्तित (The water gathered in the chest turned into pus) हो गया है तो कभी भी सुई द्वारा मवाद निकलवाने की कोशिश न करें, तुरन्त किसी जनरल सर्जन की बजाय किसी थोरेसिक सर्जन से छाती में टयूब डलवायें। ऐसा न करने से फेफड़े के बचाने की मुहिम, असफल हो जाना प्राय: निश्चित है।

अगर छाती में टयूब डालने के बावजूद भी फेफड़े की दशा में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है और फेफड़ा पूरी तरह से फूल नहीं रहा है तो सावधान हो जाइये, तुरन्त किसी थोरेसिक सर्जन से नष्ट हुए फेफड़े के हिस्से को निकलवा दें, अन्यथा बचा हुआ स्वस्थ फेफड़ा भी ज़ख्मी हो जाएगा।

फेफड़े के आपरेशन के लिए हमेशा ऐसे बड़े अस्पताल में जायें, जहाँ एक अनुभवी थोरेसिक सर्जन (Thoracic surgeon) यानी चेस्ट सर्जन (Chest surgeon) की चौबीस घंटे उपलब्धता हो।

देखा गया है कि दिल का आपरेशन करने वालों को फेफड़े के आपरेशन का ज्यादा अनुभव नहीं होता, इसलिए यह सुनिश्चित कर लें फेफड़े का आपरेशन करने वाला सर्जन फेफड़े के आपरेशन के मामले में अनुभवी हो।

फेफड़े के आपरेशन के लिए हमेशा ऐसे अस्पताल का चुनाव करें जहाँ क्रिटिकल केयर और छाती रोग का विकसित विभाग हो तथा अत्याधुनिक आई. सी. यू. व ब्ल्ड बैंक की सुविधा हो।

छाती व फेफड़े के आपरेशन के लिए बेहोशी देने वाला एनेस्थीसियालोजिस्ट को फेफड़े के ऑपरेशन (Pulmonary operation) कराने का अच्छा अनुभव होना चाहिये, नहीं तो आपरेशन के दौरान या बाद में समस्यायें खड़ी हो सकती हैं।

डॉ. के. के. पाण्डेय

सोर्स देशबन्धु

Notes

(Hydrothorax is a type of pleural effusion in which serous fluid accumulates in the pleural cavity)

{(hemo- + thorax) (or haemothorax or haemorrhagic pleural effusion) is a type of pleural effusion in which blood accumulates in the pleural cavity. This excess fluid can interfere with normal breathing by limiting the expansion of the lungs.}

Bronchiectasis is a disease in which there is permanent enlargement of parts of the airways of the lung. Symptoms typically include a chronic cough productive of mucus. Other symptoms include shortness of breath, coughing up blood, and chest pain.

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