हमने कुमार विश्वास और चेतन भगत जैसों के हाथों साहित्य सौंप दिया, जिन्हें साहित्य से कोई मतलब नहीं

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तीन दिन- कला व साहित्य के नाम

”भौतिक है ये शब्द कि जिनसे बनती है यह भाषा, भावों के फिर प्रातिनिध्य की क्या कर सकते आशा। भाषा के हाथों में भावों की नकेल अवसाद भाषा क्या भावों का लंगड़ाता सा अनुवाद

कुछ यादें ”बीकानेर कला एवं उत्सव” की- भाग एक

वो पल जब इस उत्सव में आये भारतीय साहित्य के पुरोधाओं को सुनने का अवसर मिला

आइये ले चलते हैं उन भारतीय साहित्य मनीषियों ने क्या कहा —–

रंग भी कला है, अक्षर साहित्य है प्रश्न है ? लोग कला को रंगीन मानते हैं। कला अमूर्त होती है पर साहित्य अक्षर में नही निरक्षर में छिपा होता है। कला को हम एक विशिष्ठ सयोजन में देखते है हम कलाकार के मन में सृजन होती है कला शब्द के अर्थ को प्रतिध्वनित करता है, शब्दों में साहित्य- काव्य नहीं होता है शब्दों में छिपा अर्थ ही साहित्य होता है जो रंग और अक्षरों के रूप में परिवर्तित होता है,

”भाषा के हाथों में भावों की नकेल भाषा- भावों को सटीक रूप में मौन की भाषा का अभ्यास करें|

बेरंग से चित्र बनता है| हिंदी में सर्वाधिक महत्व गृहस्थों ने किया है इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी साहित्य – भारतीय – जैन साहित्य त्रिशंकु की स्थिति में है। अगर कहा जाए तो पूरे साहित्य की यही स्थिति है। साहित्य और भावना लटकी है। साहित्य का साधारण व्यक्ति के जीवन के क्या महत्व है ? गाँव भारत की हकीकत है यहाँ आम आवाम 65% हिन्दुस्तान के गाँव में रहती है/ साहित्य सेवा परकाया है। जब आप कोई भी रचना कर्म से जुड़ते हैं तब आप परकाया में प्रवेश करते हैं। भक्ति साहित्य बहुत महत्वपूर्ण रहा उस काल में आप कबीर की रचनाओं को देख सकते हैं। राजस्थान में आज भी बहुत ही महत्वपूर्ण पांडुलिपिया सुरक्षित हैं, जरूरत है उनके प्रकाशन की —-

बकौल नन्द भारद्वाज- यह आयोजन सोशल मीडिया के माध्यम से शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से आभासी दुनिया के बाहर निकल कर हम सारे लोग एक जगह एकत्रित हुए और इसके माध्यम से सोशल मीडिया को नये स्वरूप में सगठन बनाकर खड़ा किया जा सकता है। अब फेसबुक आभासी दुनिया नहीं रह गयी है, कला-संस्कृति के सौन्दर्य से रूबरू होती दुनिया बन चुकी है।

राजस्थानी भाषा के अनुवादक चन्द्रप्रकाश देवल कहते हैं- आजकल साहित्य उत्सव की बाढ़ चल गयी है पर यह उत्सव एकदन अलग हटकर है। कला को लेकर साहित्य की कल्पना अनोखी चीज है। यह जो फेसबुक की आभासी दुनिया है इसकी नई संकल्पना आज मूरत रूप में सामने खड़ी नजर आ रही है इसने एक नई जीवन्त दुनिया बनाई है।

प्रख्यात कवि- साहित्य के मनीषी नरेश सक्सेना कहते हैं कि जीवित संस्कृति- समय और समाज में जीवित रहती है आप देखे तो माँ की गोद से- विमर्श शुरू होता है उस वक्त भाषा कोई महत्व नही रखता है। आप जब अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हैं तो आप की समझ खत्म हो जाती है। दुनिया में जो भी देश अपनी मातृभाषा में कार्य कर रहे हैं, वो विकास कर रहे हैं और हमारे लोग न ही हिंदी ठीक से सिखा रहे है ना ही अंग्रेजी भाषा का ज्ञान ही ठीक से दे रहे हैं। आज हमारे देश में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वो कितना उचित है यह आप सब जानते हैं। आज का समय बहुत ही विकट है। आज जरूरत है कि हम चेतें। अपनी भाषा को लेकर आज हम लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। संस्कृति को धर्म से अलग नही किया जा सकता है। साहित्य – संस्कृति को काटकर नहीं रह सकते हैं कविता भाषा की अमूर्तन से बनी हुई है।

बकौल डा. पुरुषोतम अग्रवाल- आज साहित्य को लेकर फिर से विचार करने की जरुरत है। आज एक शब्द चला है जिसका महत्व अपने आप में बड़ा हो जाता है वो शब्द है ”जुगाड़”। आज के इस भौतिक जमाने में इसका बहुत महत्व है भारतीय संस्कृति अनादिकाल से बहुत ही सम्पन्न है और आज भी है। 1931 में चर्चिल ने कहा था कि गांधीवाद को कुचल डालना। उस वक्त पूरा ब्रिटिश सरकार हास्यास्पद स्थिति में आ गयी थी। पर क्या आज भी उसको लोग कुचल पाए क्या ? संस्कृति मूल्यों का मामला है यह समय के साथ बदलती रहती है। आज संस्कृति परिवर्तन के मोड़ पर खड़ी है। इसके मूल्य बदल रहे हैं। यह समाज का केन्द्रीय प्रश्न बनकर खड़ा है। आज लोग राजनीति में संस्कृति का प्रयोग कर रहे हैं।

 दुर्गा प्रसाद अग्रवाल कहते हैं- साहित्य- संस्कृति का मुख्य धारा होती है संस्कृति सकारत्मक सोच की धरा है। आज संकट का समय है। आप गौर करें तो संस्कृति पे बड़ा गम्भीर संकट है। आज वर्तमान में हमारी संस्कृति को बड़ी शालीनता से समाज के सामने वर्जित किया जा रहा है। यह एक बड़ा प्रश्न है। हमको अपनी संस्कृति को हर हालत में बचा कर रखना है। साहित्य अब विशेष लोगो की चिंता का विषय रह गया है। साहित्य में भी वर्चस्व का मामला सामने खड़ा है जिनको साहित्य से कोई लेना- देना नहीं है। अब हमने कुमार विश्वास और चेतन भगत जैसे लोगों के हाथों में साहित्य को सौंप दिया है जिन्हें साहित्य से कोई मतलब नहीं है, जो सिर्फ आज के लोगो के लिए बिकने का सामान बने हए हैं। उनको नेम – फेम चाहिए। उन्हें क्या पता कि साहित्य की गंभीरता क्या होती है ? आज के दौर में हमे अपनी संस्कृति को बचाना है ऐसे में यह आयोजन और महत्वपूर्ण हो जाता है जब आज साहित्य के मठाधीशों का वर्चस्व इस सोशल मीडिया ने तोड़ दिया है। आज उनको भी मानना पड़ रहा है इन बातों को कि और लोग भी हैं जो बहुत ही बेहतर काम कर रहे है, साहित्य में ख़ास तौर पर हमारी युवा पीढ़ी आज बहुत ही तल्ख और धारदार लिख रही है।

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– सुनील दत्ता

सुनील दत्ता, लेखक स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक हैं, हस्तक्षेप के सहयोगी हैं।