पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नतीजे तय करेंगें आलू, गन्ना, जाट और मुसलमान

 

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली, 7 फरवरी। पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव बहुत ही दिलचस्प दौर में पंहुच गए हैं। पंजाब और गोवा में मतदान हो चुका है और वहां से से जो संकेत आ रहे हैं उनके कारण केंद्र की शासक पार्टी में गतिविधियाँ तेज़ हो गयी हैं।

अब बीजेपी नेताओं की कोशिश है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में हर हाल में सरकार बनाने लायक या सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित होने लायक सीटें जीती जाएँ।

बीजेपी के वे नेता जो उत्तर प्रदेश का काम देख रहे हैं, और पार्टियों के प्रवक्ता बार-बार दो बातें कहते हैं। उनका दावा होता है कि वे पिछली बार से अच्छी संख्या में सीटें लायेंगें। ऐसा दावा करते वक़्त उनका आग्रह होता है कि 2012 के विधान सभा चुनाव को बेंच मार्क माना जाए 2014 के लोकसभा चुनावों में आये बम्पर बहुमत को नहीं।

दूसरी बात यह कि यह चुनाव प्रधानमंत्री के कामकाज या उनकी नोटबंदी वाली नीति पर जनमत संग्रह नहीं है।

इन बातों से साफ़ ज़ाहिर है कि केंद्र की सत्ताधारी पार्टी उत्तर प्रदेश में अनिष्ट की आशंका से ग्रस्त है।

प्रधानमंत्री की मेरठ और अलीगढ़ की चुनावी रैलियों में उनके भाषण को देखने के बाद ऐसा लगता कि वे उसी मनोदशा में हैं जिसमें उन्होंने पिछले दिनों जालंधर में एक चुनावी सभा को संबोधित किया था। अलीगढ़ में उन्होंने कहा कि 'पार्टियां उनसे नाराज़ इसलिए हैं कि वे गलत काम करने वालों पर स्क्रू कस रहे हैं।'

 उन्होंने मुकामी ताला उद्योग की दुर्दशा के लिए भी समाजवादी पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराया। विकास के अपने प्रिय मुद्दे पर उन्होंने बात नहीं की क्योंकि उसको समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपना चुके हैं।

2014 का लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री ने विकास के वायदे पर जीता था। तीन साल में उनकी सरकार ने विकास के मुद्दे पर कोई ख़ास सफलता नहीं पाई है। नोटबंदी जैसे विवादित फैसले लेकर कैश की अर्थव्यवस्था को जो नुक्सान पंहुचाया है उसके कारण उस पर निर्भर लोग बहुत परेशान हैं। उधर उनके विपक्ष में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबन्धन बन गया है जिससे बीजेपी विरोधी वोट एकमुश्त होते नज़र आ रहे हैं।

अमित शाह यह बात कई बार कह चुके हैं कि अगर विपक्षी दल इकठ्ठा हो जाएँ तो उनके लिए मुश्किल तो हो ही जायेगी। उनके इस आकलन की हताशा प्रधानमंत्री के मेरठ के भाषण में भी नज़र आ रही थी और अलीगढ़ के भाषण में भी।

अलीगढ़ से लगा हुआ आलू के कारोबारियों और किसानों का इलाका है और वहां नोटबंदी के कारण बहुत लोगों के सामने मुसीबतें आई हैं।

मेरठ में भी गन्ना किसानों का प्रधानमंत्री की नोटबंदी से बहुत नुकसान हुआ है। बीजेपी को मालूम है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभावशाली जाट समुदाय बीजेपी को हराने के लिए टैक्टिकल वोटिंग कर रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के अलावा मुसलमानों का बहुत प्रभाव है। अब तक तो वह समाजवादी पार्टी से नाराज़ होकर मायावती की पार्टी की तरफ जा रहा था, लेकिन कांग्रेस-सपा समझौते के बाद उसका रुझान गठबंधन की तरफ हो गया है। मुसलमानों के वोटों को बिखराने के लिए असदुद्दीन ओवैसी का इस्तेमाल भी करने की कोशिश हो रही है लेकिन अभी तक के संकेतों से लगता है कि उनका वही हश्र होने वाला है जो बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ था।

उत्तर प्रदेश में जो तीन पार्टियां मुकाबले में हैं सभी मुसलमानों को अपने साथ लेने के चक्कर में हैं। मायावती तो अपने दलित वोट में मुसलमानों को शामिल करके जीत की योजना पर काम कर रही हैं। 100 से ऊपर टिकट देकर मायावती मुसलमानों को अपने साथ लेने का प्रयास बहुत गंभीरता से कर रही हैं।

बीजेपी के बड़े नेता रविशंकर प्रसाद का बयान आया है कि तीन तलाक़ के मुद्दे पर चुनाव बाद सरकार कुछ करेगी। उनको मालूम है कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं देगें लेकिन उनकी महिलाओं के वोट को आकर्षित करने की कोशिश जारी है। हालांकि उत्तर प्रदेश की राजनीति का हर जानकार बता देगा कि राज्य का मुसलमान उसी पार्टी को वोट देगा जो बीजेपी को हराने की स्थिति में हो। इसीलिये बीजेपी ने अब योगी आदित्यनाथ,विनय कटियार और वरुण गांधी जैसे लोगों को प्रचार में लागाकर किसी तरह के ध्रुवीकरण की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। क्योंकि उनको मालूम है कि अगर मुसलमान मायावती से छटकता है तो वह बीजेपी के पास नहीं जाएगा, वह सीधा अखिलेश-राहुल गठबंधन की तरफ जाएगा। और अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस और अखिलेश के ' काम बोलता है' वाले वोट उत्तर प्रदेश में भी मोदी जी की पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं।

प्रधानमंत्री के मेरठ और अलीगढ के भाषणों में अति उत्सुकता का कारण यही है।