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Bulandshahr: Inspector Subodh Kumar Singh who was attacked and shot dead by a Hindu mob protesting against alleged cow slaughter in Uttar Pradesh's Bulandshahr on Dec 3, 2018. A post-mortem report later confirmed that the officer suffered both gunshot in

बुलंदशहर हिंसा के आरोपियों को जमानत पर रिहा कर क्या संदेश दे रहा है न्यायालय?

लखनऊ, 27 अगस्त 2018. दिसम्बर 2018 में बुलंदशहर जिले में स्थित स्याना में कथित गौ-हत्या के मामले पर विरोध प्रदर्शन के उग्र रूप धारण करने से हुई हिंसा जिसमें पुलिस इन्सपेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या (Police Inspector Subodh Kumar Singh murdered) हो गई के मामले में गिरफ्तार सात लोगों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई (Bail granted from Allahabad High Court जिन पर हत्या का प्रयास, दंगा करने व आगजनी का आरोप था। जमानत पाए आरोपियों में भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के नेता शिखर अग्रवाल (Shikhar Aggarwal, leader of the Bharatiya Janata Party’s Yuva Morcha), विश्व हिन्दू परिषद के उपेन्द्र राघव (Upendra Raghav of Vishwa Hindu Parishad,) व फौज के जवान जितेन्द्र मलिक (Army soldier Jitendra Malik) शामिल हैं। शिखर अग्रवाल की रिहाई पर उनसे मिलने आए लोगों ने ’जय श्री राम’, ’वंदे मातरम’ व ’भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया।

इससे पहले 14 अगस्त 2019 को राजस्थान की अलवर की जिला न्यायालय ने 2017 के पहलू खान हत्या मामले (Pehlu Khan murder case) में छह आरोपियों को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति सरिता स्वामी ने टिप्पणी की कि पुलिस द्वारा जांच में लापरवाही बरती गई।

2013 में मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा में 41 में से 40 मामलों जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोगों की हत्या या बलात्कार हुए थे सभी आरोपी रिहा हो गए जबकि एक मामला, जिससे दंगे की शुरूआत हुई, में गौरव व सचिन की हत्या के आरोप में 7 मुस्लिम नागरिकों को आजीवन कारावास की सजा हो गई।

2015 में बिसाड़ा, दादरी में मोहम्मद अख्लाक की पीट-पीट कर हत्या करने वाले 18 आरोपियों में से एक रवि की मृत्यु जेल में हो गई और बाकी 17 को जमानत मिल गई। रवि के शव को दाह संस्कार के पहले राष्ट्रीय ध्वज में लपेटा गया।

2007 के समझौता एक्सप्रेस में बम धमाके के मामले में स्वामी असीमानंद व तीन अन्य आरोपी बरी कर दिए गए। इस हादसे में मरने वाले 68 लोगों में ज्यादा पाकिस्तानी नागरिक थे। इससे पहले असीमानंद को अजमेर शरीफ व मक्का मस्जिद बम धमाकों में भी बरी कर दिया गया था। इन तीनों मामलों में पहले असीमानंद अपना जुर्म कबूल कर चुके थे किंतु बाद में मुकर गए।

एनएपीएम, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया), लोक राजनीति मंच और रिहाई मंच ने इस पर अपनी संयुक्त प्रतिक्रिया में कहा है कि इतनी आसानी से आपराधिक घटनाओं में आरोपियों को जमानत मिलेगी या वे बरी हो जाएंगे तो इसका क्या संदेश समाज में जाएगा? इससे हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों के अंदर जो आपराधिक मानसिकता के लोगों की घुसपैठ हो गई है क्या उनके हौसले बुलंद नहीं होंगे?

अरुन्धती धुरु, संदीप पाण्डेय व राजीव यादव ने एक संयुक्त वक्तव्य में कहा कि हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करने व राष्ट्रवादी नारे लगाने वालों को जैसे मुसलमानों के खिलाफ अपराध करने की खुली छूट मिल गई हो। वे अपनी राजनीति का इस्तेमाल अपने अपराध को ढंकने के लिए कवच के रूप में कर रहे हैं। इससे पूरे देश का माहौल खराब हो रहा है और मुसलमान अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा है।

उन्होंने कहा कि मुसलमान को अपना दुश्मन मान कर शासन-प्रशासन को अपने प्रभाव में लेकर व यहां तक कि न्यायालय से भी अपने पक्ष में फैसले करवा कर हिन्दुत्ववादियों को लग रहा है कि वे बहुत बहादुरी का काम कर रहे हैं। यह स्थिति देश के लिए ठीक नहीं है। इससे देश को नुकसान पहुंचाए जाने वाले कदमों जैसे सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश, यानी निजी कम्पनियों को सार्वजनिक परिसम्पत्तियां बेचने का काम, या सही अर्थों में धार्मिक व्यक्तियों जैसे प्रोफेसर गुरू दास अग्रवाल या स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद, जिन्होंने पिछले वर्ष गंगा को बचाने के लिए 112 दिनों तक उपवास कर अपनी जान दे दी, को नजरअंदाज कर देना, पर कोई बात ही नहीं होती है।

 

 

 

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