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भाजपा के ज्यादा करीब कौन!

 

एच. एल. दुसाध

सात चरणों में पूरा होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव पांचवें चरण में प्रवेश करने जा रहा है। विगत चुनावों की भांति इस चुनाव में भी राजनीतिक पार्टियाँ ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठा रहीं हैं,  जो भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक हो।

मुद्दाविहीन इस चुनाव में विषमतावादी विकास और मुफ्त का घी-दूध, चीनी-चायपत्ती इत्यादि का शोर है। चूंकि चुनाव में मुकाबला कर रहीं पार्टियां अपने काम और मुद्दों के जोर से सत्ता में आने के प्रति आश्वस्त नहीं हैं, इसलिए शेष बचे दो चरणों में बदजुबानी पर उतर आई हैं।

इस क्रम में उनमें एक दूसरे को गधा, भ्रष्टाचारी, कसाब इत्यादि बताने की होड़ लग गयी है। लेकिन इसके अतिरिक्त बेहद महत्वपूर्ण यूपी चुनाव में एक और होड़ मची है, वह है मिलीभगत का आरोप।

भाजपा, बसपा और सपा पर मिलीभगत का आरोप लगा रही है तो बसपा, सपा और भाजपा पर मिलजुलकर काम करने का आरोप लगा रही है। उधर सपा वाले हर सभा में यह खुली घोषणा कर रहे हैं कि चुनाव बाद बसपा एक बार फिर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का प्रयास कर सकती है।

बहरहाल इस मामले में सर्वाधिक शोचनीय स्थिति बसपा की ही है। बसपाध्यक्ष के बार-बार आश्वासन दिए जाने के बावजूद कि जरूरत पड़ी तो वह विपक्ष में बैठेंगी, पर, भाजपा के साथ सरकार नहीं बनायेंगी, उस पर न सिर्फ सपा बल्कि चैनलों और सोशल मीडिया में छाये ढेरों लोग ही आरोप लगा रहे हैं कि समय आने पर बसपा भाजपा से हाथ मिला लेगी।

चूंकि यूपी चुनाव का अन्यतम बड़ा मुद्दा देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन चुकी भाजपा को रोकना है, इसलिए ऐसे आरोपों से बसपा की संभावना पर नकारात्मक असर पड़ना लाजिमी है।

  इस विषय में मशहूर पत्रकार दिलीप मंडल की यह टिप्पणी काबिले गौर है। ‘बीजेपी की शह पर 14 साल पहले बीएसपी में विभाजन हुआ। 2003 वह आखिरी साल था, जब बीएसपी ने बीजेपी से समर्थन लिया। बहन जी तो शादी-ब्याह तक में बीजेपी के नेताओं के घर नहीं जातीं। गंगा-यमुना में काफी पानी बह चुका है। नीतीश कुमार 2015 तक बीजेपी के साथ रहे। ममता भी बीजेपी के साथ रहीं। डीएमके भी, अकाली भी, पीडीपी भी, नेशनल कांफ्रेंस और लोकदल भी। तेलगु-देशम तो अब भी है। 2003 में यूपी में मुलायम सिंह की सरकार बनी और चली भी। बीएसपी को लेकर इतिहास कुछ ज्यादा ही निर्मम है।

बाकी लोग गंगा जल छिड़ककर सेकुलर बन जाते हैं, किन्तु बीएसपी को यह सुविधा नहीं है। 14 साल कम नहीं होते!’

वास्तव में जिस तरह देश के लिए खतरा बन चुकी भाजपा के साथ भविष्य में रिश्ते बनाने की बात कहकर बसपा की सम्भावना को धूमिल करने की कुत्सित चाल जारी है, उसे देखते हुए अब इस बात के अध्ययन की जरूरत महसूस होने लगी है कि खतरनाक भाजपा के सबसे निकट कौन है ?

अपने जन्मकाल से ही हिन्दू धर्म-संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष तथा अल्पसंख्यक विद्वेष के अतिशय प्रचार पर अपनी सारी रणनीति स्थिर करने के कारण भाजपा बाकी दलों एवं आजाद भारत की हिस्ट्री में जगह बनाने वाले बड़े-बड़े नेताओं के लिए राजनीतिक रूप से अस्पृश्य रही।

इसी भाजपा के सहयोग से पहली बार 3 जून, 1995 को बसपा यूपी की सत्ता में आई और 17 अक्तूबर, 1995 तक रही। बाद में 21.03.1997 से 21.09.1997 एवं 03.05.2002 से 28.08.2003 तक दो बार और उसे भाजपा के सहयोग से ही सत्ता में रहने का अवसर मिला। किन्तु इसके बहुत पहले, 1967 के गैर-काग्रेसी सरकारों के ज़माने से ही भाजपा की राजनीतिक अस्पृश्यता दूर होने लगी थी, जिसका बड़ा श्रेय राम मनोहर लोहिया को जाता है। किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर इसकी अस्पृश्यता दूर करने में लोहिया से भी ज्यादा श्रेय जय प्रकाश नारायण को जाता है, जिन्होंने 1977 में इंदिरा गांधी के तानाशाही के विरुद्ध चले अभियान में इसे राजनीति के विशाल दायरे में प्रवेश कराया। उनके उस अभियान में ज्योति बासु, पूर्व पीएम चंद्रशेखर ने भारी सहयोग किया था।

1977 के बाद इस मोर्चे पर बड़ा काम 1989 में हुआ, जब 1984 में मृतप्राय हो चुकी भाजपा को वीपी सिंह के नेतृत्व में राजीव गांधी के भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाये गए अभियान में ज्योति बासु, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, सैयद शहाबुद्दीन, इमाम बुखारी, आजम खान, रामविलास पासवान इत्यादि ने एक अप्रतिरोध्य राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने का अवसर सुलभ कराया।

उपरोक्त तथ्यों की रौशनी में कोई भी इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि तमाम विचारधारा के नेताओं ने भाजपा को आज की स्थिति में पहुचाने में कुछ न कुछ रोल अदा किया। इस मामले में अपवाद रही सिर्फ कांग्रेस। भले ही कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में मिलते रहे हों, किन्तु कांग्रेस ने अपने बैनर की शुद्धता बराबर बनाये रखी और आज यह भाजपा के विपरीत ध्रुव के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

कांग्रेस जहां महात्मा गाँधी, पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी की तो भाजपा डॉ. हेडगेवार, गोलवलकर, डी. डी. उपाध्याय के विचारों की वाहक है। एक धर्मनिरपेक्षता की चैम्पियन तो दूसरी साम्प्रदायिकता की खान। किन्तु इतने विराट वैपरित्य के बावजूद दूरदृष्टि संपन्न लोगों को एक आश्चर्यजनक साम्यता दिखती है। और वह साम्यता यह है कि दोनों ही विशुद्ध सवर्णवादी हैं; दोनों का ही मुख्य लक्ष्य शक्ति के स्रोतों पर सवर्णों के 80-85 प्रतिशत वर्चस्व को अटूट रखना है। इसीलिए जब नरसिंह राव की आर्थिक नीतियों के घोर विरोधी भाजपाई अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में आये तो उन्होंने सारी ताकत नरसिंह राव को बौना बनाने में लगाया। किन्तु जिस तरह वाजपेयी ने सत्ता में आकर राव को बौना बनाया, उसी का एक्शन रिप्ले 2004 में उनकी जगह सत्ता पर काबिज हुए मनमोहन सिंह ने किया। बाद में 2014 में जब मोदी सत्ता में आये उन्होंने मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को आगे बढाने में सर्वशक्ति लगाया।

इस क्रम में एक ने जहां सवर्ण-हित वाली अपनी नीति को ‘शाइनिंग इंडिया’का नाम दिया तो दूसरे ने ‘इनक्रेडेबल इंडिया’ कहा।

इन दोनों की यह साम्यता देखते हुए ही मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में संघ के शीर्ष पदाधिकारी जना कृष्णमूर्ति ने कहा था-

राष्ट्रहित में कांग्रेस और भाजपा को मिलजुलकर काम करना चाहिए।

अघोषित रूप से भूमंडलीकरण की सवर्णवादी नीतियों के क्रियान्वयन में ये दोनों मिलकर तो काम करती हैं, किन्तु घोषित रूप से एक नहीं होतीं। इसलिए कि उन्हें पता है ऐसा करके ही सवर्ण-हित का पोषण किया जा सकता है। क्योंकि इस विपरीतता के दिखावे के कारण ही जब बहुजन समाज किसी एक से निराश होता है तो दूसरे को सत्ता में ला देता है। और इस तरह बारी-बारी से कांग्रेस-भाजपा के जरिये सवर्ण हित-पोषण का सिलसिला चलते रहता है।

बहरहाल से भाजपा से दूसरे दलों की निकटता का अध्ययन मुलायम सिंह यादव के विशेष उल्लेख के बिना पूरा ही नहीं हो सकता।

सबसे बड़े भाजपा विरोधी के रूप में मशहूर मुलायम सिंह यादव वह शख्स हैं, जो भाजपा विरोधी मोर्चे से कभी जुड़े नहीं। यही कारण है 1999 में वह वाजपेयी के विरुद्ध सोनिया गांधी के मुहिम में सहयोग न कर सके, जबकि सोनिया गाँधी के बाहरी समर्थन से ही वे केंद्र में रक्षा मंत्री का पद सुशोभित किये थे। इस मामले में उन्होंने सबसे हैरतंगेज कदम गुजरात विधानसभा चुनाव-2002 में उठाया था।

पूरी दुनिया जब गुजरात में मुसलमानों के बड़े पैमाने पर कत्लेआम से द्रवित होकर मोदी-राज के खात्मे के लिए कांग्रेस के साथ खड़ी हुई, ’मुल्ला’ का खिताब पा चुके परम मुस्लिम हितैषी मुलायम कांग्रेस से दूरी बना लिए। दूरी बनाने का कारण बताते हुए तब उनके सबसे बड़े मुस्लिम संगी आजम खान ने कहा था, ’सांप्रदायिक ताकतों को नेस्तानाबूद करने के लिए हम किसी भी सीमा तक झुककर धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मोर्चा बनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने सम्मान या ताकत की अनदेखी कर दें’।

मतलब भाजपा के मोदी को रोकने से ज्यादा उन्हें अपना सम्मानबचाना जरूरी लगा था।

बहरहाल भाजपा को रोकने के लिए मुलायम सिंह कभी अपने ‘सम्मान’ या पार्टी-हित का परित्याग न कर सके तो उसका बड़ा कारण कुछ और था। वह 1977 में इंदिराजी की कथित तानाशाही के विरोध में भाजपा (जनसंघ) और दूसरे दलों के सहयोग से ही पहली बार उत्तर प्रदेश में सहकारिता मंत्री बने तो 1989 में फिर भाजपा इत्यादि के सहयोग से ही यूपी मुख्यमंत्री।

दूसरी बात यह है कि उनमें हिन्दू-धर्म-संस्कृति के प्रति भाजपा जैसी ही दुर्बलता रही। इसलिए वे जय श्रीराम की जगह जय कृष्ण का नारा उछालते रहे हैं।

बहरहाल विविध कारणों से उन्होंने भाजपा विरोधी मोर्चे से जो दूरी बनाया, भाजपा नेतृत्व इस बात को भूला नहीं। इसीलिए जब मायावती ने 2002 में भाजपा के सौजन्य से तीसरी बार सत्ता में आने के बाद उसकी कुछ बातों से क्षुब्ध होकर 26 अगस्त, 2003 को विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते हुए इस्तीफा दे दिया, मुलायम सिंह यादव ने बसपा के 13 बागी विधायकों को साथ लेकर सरकार बनाने का दावा ठोक दिया। उनके दावे में काफी खामियां थीं, किन्तु अतीत के उनके अवदानों को देखते हुए यूपी के भाजपाई राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने विश्वासमत के लिए दो सप्ताह का लम्बा समय देते हुए,  उन्हें आनन-फानन में अनैतिक तरीके से 29 अगस्त , 2003 को मुख्यमंत्री के रूप मे शपथ दिलवा दिया।

2003 और उससे पहले भाजपा द्वारा मिले सहयोग का प्रतिदान देने में नेता जी ने कभी कमी नहीं की। इस कारण ही 2015 में बिहार में जब गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम के जिम्मेवार मोदी के खिलाफ महागठबंधन बना, नेताजी उससे दूरी बना लिए। यूपी विधानसभा के पूर्व उन्होंने पारिवारिक कलह को जन्म देकर लोकप्रिय अखिलेश यादव को कमजोर करने का जो प्रयास किया, वह भाजपा के प्रति उनके प्रतिदान ही एक और कदम था। भाजपा विरोधियों की गतिविधियों के इस तुलनात्मक अध्ययन के बाद पाठक किसी निष्कर्ष पर पहुँच गए होंगे, इसकी उम्मीद इस लेखक को है

 (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )       

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