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स्मृति ईरानी के अपमान पर चुप क्यों हैं बजरंगी हुड़दंगी

गोवा, फैब इण्डिया, एक संगीन अपराध : मॉल और शोरूम के जरिये महिलाओं की अस्मिता का कारोबार-2

Goa, Fab In dia, a serious crime: the business of women’s identity through malls and showrooms-2

आप ही कहिये जो कर्मचारी ड्यूटी के वक्त तक अपने फोन मॉल के भीतर नहीं ले जा सकते। वे भला इन शॉपिंग सेंटर्स में हर जगह लगे सुरक्षा कैमरों से बचकर कैसे कोई अपराध मालिक की इजाजत के बिना और उनकी निगाहों से बचकर कर सकते हैं? हाई एलर्ट चेकिंग सिस्टम से गुजरकर किसी भी तरह का कोई सामान मॉल से बाहर ले जाना शीशे के महलों के भीतर से जहां हरगिज़ संभव नहीं है। ऐसे में हमें सोचना होगा किन लोगों की शह पर ये अपराध बड़े पैमाने पर हो रहे हैं? हमें ऐसी हर स्थिति पर गम्भीरता से सोचना होगा।

हाल ही में गोवा में पुलिस की हाई अलर्ट चेकिंग के दौरान एक और महिला उभोक्ता का वीडियो बनाने का मामला सामने आया है। वो भी फैब इण्डिया के किसी अन्य शोरूम से सम्बंधित है।

क्या वाकई में साधारण कर्मचारी इतने कुशल और तकनीकी रूप से दक्ष हैं कि वे इन घटनाओं को सफाई से क्रियान्वित करने में माहिर हो सकते हैं। ।

यानी ग्लोबल बाज़ार के तमाम शोरूम्स (Showrooms of global market) में चल रहे इस तरह के धंधे और फैब इण्डिया की यह वीडियों सामग्री किन्हीं और माध्यमों से साइबर वर्ल्ड और खुले बाज़ार से होते हुए लोगों के बीच पहुँच रही है। माध्यम कोई भी हो।

मूल मुद्दा ये है कि व्यवस्था के पक्षपात पूर्ण तरीकों के कारण बाज़ार तंत्र और इजारेदारी के साए में अपराध जगत को बढ़ावा मिल रहा है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि महिलाओं की देह को वीडियो में चोरी से कैद करके कौन लोग बड़ी कमाई कर सकते हैं? ये ऐसे उत्पाद हैं जिनकी कीमत वर्चुअल वर्ल्ड में कितनी भी आंकी जा सकती है। ऐसे कारगर तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल क्या सामान्य कर्मचारी करने में वाकई सक्षम है?

मतलब साफ़ है कि इन वीडियोज को बाहर ले जाने की हिम्मत मजलूम कर्मचारी नहीं कर सकते। ये गुनाह किन्हीं बड़े जानकार और ताकतवर हाथों से संचालित हो रहे हैं, जिन्हें औरतों की देह को बतौर उत्पाद बेचने में दिलचस्पी है। जो औरतों के जिस्म को उनकी सुन्दरता के हिसाब से कम से कम और ज्यादा से ज्यादा कीमत लगाकर आधुनिक सामानों की तरह बेच रहे हैं। ये लोग महिलाओं की देह को किसी भी माध्यम से हासिल करना चाहते हैं और उसे अच्छे दामों में बेचकर पैसा कमाने में माहिर हैं। ये छोटे-मोटे व्यापारी नहीं हैं बल्कि बड़े बिजनेस ग्रुप्स हैं। इनके लिए महिलायें केवल ऐयाशी का साधन मात्र हैं। ये समझते हैं कि औरतों की देह के व्यापा (Women body trade) में बिना दमड़ी लगाये जो धन उगाही की जा सकती है। वो किसी और तरीके संभव नहीं। केवल थोड़े से आधुनिक संसाधनों के इस्तेमाल से यह मुनाफा कमाने का बड़ा ही सुविधाजनक और फायदेमंद सौदा साबित हुआ है।

इन लोगों ने बेशुमार दौलत हासिल कर हर तरह की सुविधाएं और संसाधन जुटा लिए हैं। ये ऐसे उपकरणों के मसीहा बन बैठे हैं जिनके बारे में अदना कर्मचारी न तो उन्हें सहज ही संचालित कर सकता है और न ही पगार देकर भी इन्हें इस्तेमाल करने की आज़ादी हासिल कर सकता है।

हमें इन अपराधों की असल कड़ी को ढूँढना और उसकी सही पहचान करनी होगी। वह कौन सा तबका या समाज है? ये किस सामाजिक प्रतिष्ठा और सोच के लोग हैं जिन्हें महिलाओं के जिस्म की खुली नुमाइश बेहद पसंद है। जो सुंदर महिलाओं की देह को बाज़ार की नसों में उतार देना चाहते हैं। रेशा-रेशा भेदकर भरी पूरी निगाह से देखने में जरा भी नहीं हिचकते। आनंद चाहे जिस तरह मिले, आँखों लिया जाय या फिर जिस्म का इस्तेमाल करके हासिल हो। ऐन्द्रिय सुख (sensual pleasure) के लिए औरत के जिस्म का सुख हासिल करना इसकी कोई सीमा नहीं है। ये लोग किसी भी तरीके से स्त्रीदेह को उपभोग और उसके कारोबार से मुनाफा कमाने की चाहत से भरे हैं। ये कैसा कारोबार है जहां बिना दखलन्दाजी और सरकार की इजाजत के, किसी भी महिला का जिस्म चोरी छिपे लिबास बदलते हुए, उसकी देह को वीडियो में कैद करके बेचा जा रहा है। यह एक बेहतर इंसान और सुलझे हुए दिमाग की उपज तो हरगिज नहीं हो सकती। यह धंधा रोगी मानसिकता और अपराधी समूह के लोग ही कर सकते हैं।

जो लोग देह व्यापार के इस धंधे में लगे हुए हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अपने परिवार की महिलाओं के बारे में भी ऐसी ही राय रखते हैं। अगर ऐसा है तो वे समाज, कानून और सरकार की नजर में गुनहगार हैं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर वे किस मनोबल और इरादे से इस तरह के अपराध कर रहे हैं। यदि इन लोगों को औरतों के जिस्म की नुमाइश करना अपराध मालूम नहीं होता। तो यह एक खतरनाक सामाजिक रचना-प्रक्रिया है। ऐसे अपराधों में लगातार इजाफा होने की कोई तो वजह होगी? समाज में इन गुनहगारों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान होना बेहद जरूरी है। ये ऐसे अपराधी समूह हैं जिन पर फौरन कार्रवाई हो।

Businessmen who deal with sexuality are actually criminals

यकीनन ये कतई आम लोग नहीं हैं। इनसे समाज में हिंसा, वारदातें, उपद्रव और गुनाह का माहोल बनेगा। इन्साफ के लिए ऐसे गुनहगारों पर लगाम लगाने का जिम्मा और तरीका सरकार को ही तलाशना होगा। वरना यह समाज अपने सबसे सुंदर लोकतंत्र की हदें जिस दिन पार करेगा वह कयामत का दिन होगा। व्यवस्था में सुधार कानून के जरिये ही संभव है। सही तरीके से इन मामलों की गहरी पड़ताल जरूरी है। औरतों के जिस्म की नुमाइश करने वाले, खुद को महिलाओं की आज़ादी और मुक्ति का रास्ता दिखाने वाले, सुंदर औरतों को महंगी कीमतों पर अपने घटिया और वाहियात प्रोडक्ट बेचने का जरिया बनाने वाले, ये स्त्री-अस्मत का सौदा करने वाले बिजनेसमैन दरअसल अपराधी हैं।

आज तकरीबन हर जगह मॉल खुल रहे हैं। बड़ी ब्रांड्स के शोरूम बनाए जा रहे हैं। मगर इनके भीतर सुरक्षा के क्या इंतजामात हैं? राज्य और सरकारें इस बात से बिलकुल बेफिक्र हैं। चूंकि गोवा का यह मामला हाई प्रोफाइल हस्ती से जुड़ा हुआ है जिसके कारण इस बात की चर्चा ज्यादा जोर पकडे हुए है वरना अमूमन होता यही है कि आम नागरिक पर इस तरह के हमले रोजाना हो रहे हैं और किसी को खबर तक नहीं होती। इन हालत में जिस्म-फरोशी करने वाले गिरोहों पर फौरन कार्रवाई की जानी चाहिए।

देखना यह होगा कि इस हाई प्रोफाइल मामले में भी असल गुनहगारों को पकड़ा जायेगा या फिर इस अपराध में शामिल छोटे मोटे गुर्गे ही अंकुश के दायरे में आयेंगे। जबकि इस मामले में बड़े कारोबारी जोकि इस तरह के शोरूम्स की फ्रेंचाइजी लेकर काम कर रहे हैं या फिर अपमे प्रभुत्व के बल पर कोई भी कीमत चुकाकर इन धंधों में सक्रिय हैं। उन्हें सजा होनी चाहिए। कंपनी का लाइसेंस जब्त होना चाहिए। इन्हें सजा देना और ऐसे शोरूम्स को बंद करना राज्य और सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।

यह आम नागरिक की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। इसे नजरंदाज करने का अर्थ है औरतों की सुरक्षा के मामले में ढील बरतना और संवैधानिक जिम्मेदारी का पालन न करना। अगर जनता इस तरह के मामलों में असुरक्षा से गुस्साकर तोड़फोड़ पर उतारू हो गई तब सोचिये राज्य इससे किस तरह निबटेगा।

अगर हम एक स्वस्थ और बेहतर समाज बनाना चाहते हैं तो ऐसे अपराध के लिए तनिक भी स्पेस मिलने का मतलब है जुर्म को लगातार बढ़ावा देना। और महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार के लिए ढुलमुल रवैया अख्तियार करना। वास्तव में यदि सरकारें मजबूत स्थिति में हैं तो फिर इन अपराधों के बढ़ने की वजह क्या है? ।

अब तक लाखों करोड़ों जिस्मों को इसी तरह अपराधी भावना से, नुमाइश और खरीदफरोख्त में शामिल रहकर इन कारोबारियों ने मुल्क और आधी आबादी को यानी महिलाओं को अपमानित किया है। स्त्री अस्मिता की धज्जियां उड़ाई हैं। यह एक ऐसा अपराध है जहां सरकार भी जानते बूझते इनके खिलाफ किसी तरह के कड़े कदम उठाने में जाने क्यों हिचक रही है। सरकार न ही सही तरीके से इन अपराधों में शामिल बड़े कारोबारियों पर किसी तरह की बंदिशें लगा रही हैं। न ही जुर्म को रोकने के लिए कोई कानूनी प्रक्रिया अपना रही है। न ही सख्त आदेश दे रही है। न ही अनुशासन और नागरिक सुरक्षा के नियम को सही ढंग से लागू कर रही है।

जो महिलायें कमजोर तबके ताल्लुक रखती हैं अक्सर इन बड़े बाजारों में सफाईकर्मी या फिर गार्ड की हैसियत से काम पर रखी जाती हैं। मध्यवर्ग की महिलाओं के लिए सौन्दर्य प्रसाधन के काउन्टर पर खड़े रहने की ड्यूटी करनी पड़ती है। मजे की बात है सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग भी यही मध्यवर्ग है जो महीने की नपी-तुली पगार पाता है और बहुत सोच-समझकर बुनियादी सुविधाएं और संसाधन जुटाता है। ऐयाशी करने की हिम्मत कर पाना तो इस तबके के वश में हरगिज़ नहीं है। बावजूद इसके इसी तबके को लुभाने के लिए बड़े बाज़ार खोले जा रहे हैं। हर चीज़ इस तबके की पहुँच में आ सके। इसके लिए प्रलोभन देने पर पूरा जोर है। यह तबका अपनी हैसियत और जरूरत के बाहर झाँकने में हिचक महसूस करता है। इस संकोच और असुविधा से निजात दिलाने के लिए फाइनेंस कम्पनियां इन्हें हर महंगा सामान किस्तों पर देने के लिए नये कदम उठा रही है, वो भी जीरो प्रतिशत ब्याज पर। तो फिर क्यूँ न मध्यवर्ग इस भौतिक ऐश्वर्य को भोगने के मौके का फायदा ले।

है न यह पूरी तरह कंपनियों द्वारा अकूत मुनाफे के लिए डाले गये लोभ का जाल, जिसे फायदे का सौदा कहा जा रहा है। हर सामान मध्यवर्ग या इसके बराबर के तबके को नजर में रखकर तैयार किया जाता है ताकि तैयार सामानों की पूरी खपत आसानी से हो सके। और इसी तबके की महिलाओं को सबसे अधिक असुरक्षा का सामना भी इन्हीं बाज़ारों के भीतर चेंजिंग रूम्स, वाशरूम जैसी जगहों में करना पड़ता है। कहीं ऐसा तो नहीं इन बाज़ारों के जरिये औरतों के जिस्मों को बेचने खरीदने का चारागाह बनाया जा रहा हो जहाँ उनकी हिफाजत के लिए कोई व्यवस्था नहीं दिखती।

ये बाज़ार से इंसान का कैसा रिश्ता है। जहां पर अथाह मुनाफा कमाने के लिए बड़े कारोबारी जिस तबके में अपनी हर संभावना तलाश रहे हैं वहीँ इसी तबके की महिलाओं के जिस्म ऐयाशी में जीने वाले लोगों का मन बहलाने के काम आ रहे हैं। और खूबसूरत जिस्मों का ख़्वाब देखने वाले समुदाय तक इनकी नुमाइश करके इनसे अच्छी कीमत वसूली जा रही हो। इन्हें बेचने की लोकलुभावन तरकीबें भी ईजाद की जा रही हैं। क्या बाज़ार का सिवाय मुनाफे के इंसान और समाज से कोई रिश्ता नहीं बचा है?

सदियों से बाज़ार मनुष्य को सहूलियतें देने के लिए सबसे बढ़िया जरिया रहा है। अगर आप आदिम बाज़ार पर निगाह डालें तो कामगार वर्ग की महिलायें और पुरुष जिन्हें दास कहा जाता था उनके जिस्मों को सरेबाजार यूं ही बेचने का चलन रहा है। मगर ध्यान रहे यह वर्ग हैसियत के मामले में केवल दास था। जिसे खरीदा बेचा जाना बाज़ार और सरकार की रजामंदी पर होता था। तो क्या इस आधुनिक बाज़ार में भी जो सामग्री बेची जानी है या जिस तरह से चोरी छिपे महिलाओं के जिस्म की नुमाइश करने के सौदे हो रहे हैं क्या इनमें भी सरकार की रजामंदी है? लोकतंत्र में यह बात कोई नहीं मानेगा। मगर कहीं न कहीं ऐसे बाज़ारों में सांसद और मंत्री वगैरह की दिलचस्पी लाजिमी है। प्रशासन की भूमिका भी इसमें नजरंदाज़ नहीं की जा सकती। ये लोग कई बार निजी फायदे के लिए इन बाज़ारों का इस्तेमाल करते हैं। आज जब मंत्रालय की महिला का वीडियों बनाने की मंशा से इसी बाज़ार का एक शोरूम फैबइण्डिया तैयार था तब हडकंप मच गया। इस पर जांच के आदेश दिए गये। याद हो कि इस मामले के खबरों में आने के पूर्व भी कई मामले सामने आये मगर उन पर क्या इसी तरह सख्ती बरती गई। कोई कड़ी कार्रवाई की बात कही गई।

वाकई में आधी आबादी की महिलाओं की अस्मत बाज़ार में बिकने के लिए सबसे सस्ती मालूम पड़ती है और रसूखदारों की अस्मत पर हमला होने के संदेह मात्र से बाज़ार पर सख्ती हो सकती है।

इस पूरे मसले पर संस्कृति और महिला सुरक्षा की दुहाई देने वाले संघ के युवा मोर्चे की खामोशी कुछ और ही हकीकत बयान करते हैं। विहिप, हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंग दल, आरएसएस, शिवसेना आदि भाईचारा निभाने वाले संगठनों ने अपनी ही पार्टी की महिला पदाधिकारी की साख पर हमले की बड़ी साजिश का पर्दाफाश होते देखा फिर भी ये सबकुछ देखकर भी चुप्पी साध रखी है। क्या धनपशुओं और ताकतवर कारोबारियों से लड़ने का जज्बा इनमें नहीं रहा। क्या पैसे वाले गुंडों से भिड़ने की ताकत और हिम्मत इस संगठनों के पास नहीं है?

इनकी चुप्पी की आखिर वजह क्या है?

न कोई हंगामा, न तोड़फोड़, न मारपीट। इसी जगह पर यदि कोई आम आदमी होता तो ये दल उसको नोचकर-खसोट कर फेंक चुके होते। कुछ ख़ास मौकों पर ये दल अपने शाखा प्रमुख के आदेश का पालन करते हुए आम नागरिकों के प्रेम-प्रदर्शन को पश्चिमी सभ्यता कहकर उन पर गली के आवारा कुत्तों से काट खाने को टूट पड़ते हैं। आज इनके शाखा प्रमुख की हैसियत और संस्कृति का राग आलापते गले में किसने पालतू होने का पट्टा डाल दिया? क्या सच इतना ही है कि इनकी गुंडागर्दी सिर्फ आम नागरिकों तक सीमित है? हैसियत वालों के सामने भौंकने तक से इन्हें परहेज़ है? क्या इनके रवैये से इस विचार को बल नहीं मिलता मन में संदेह पैदा नहीं होता कि इनकी देखरेख और पालन-पोषण के लिए इन अपराधी धनपशुओं से खुराक मिलती है? हमें ये बातें देखनी होंगी। आम नागरिकों का आँख मूंदकर इन बाज़ारों पर भरोसा करना बिलकुल भी उचित नहीं है और तमाम तरह के खतरों से भरा हुआ भी है। जिस्म के गोरखधंधे में लिप्त बाज़ार के अभी और कई पहलू सामने आना बाकी हैं जिन्हें नजरंदाज किया जा रहा है।

फैब इण्डिया मामले में अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

बहुत से सच अभी उधेड़े जाने हैं तमाम गंदे घिनौने सच उजागर होने तक अपराध की कई परतें खुलने से बची हुई हैं। देखना यही होगा कि इस जुर्म की दास्ताँ का हासिल क्या होगा। बाज़ार से जुर्म को खत्म होने में अभी और कितनी देर है। निश्चित ही तब तलक तेजी से जिस्म के कारोबारियों का धंधा चालू है। धड़ल्ले से औरतों के जिस्म की नुमाइश का बाज़ार गर्म है। और देह व्यापार, स्त्री-अस्मिता (Body trade, female identity) की खरीदफरोख्त जारी है।

    डॉ. अनिल पुष्कर

About the author

अनिल पुष्कर कवीन्द्र, प्रधान संपादक अरगला (इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)

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