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Yogi Adityanath
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आनंदमठ का हिंदू संन्यासी योगी ? लेकिन बंकिम ने की थी 33साल ब्रिटिश शासकों की सेवा

वरिष्ठ आरएसएस/भाजपा के विचारधारकों ने हाल ही में यूपी के मुख्यमंत्री, महंत योगी आदित्यनाथ (Mahant Yogi Adityanath) को बंकिम चंद्र चटर्जी (Bankim Chandra Chatterjee) द्वारा लिखित आनंदमठ (आनंद का अभय) (1838-94) के संन्यासी (हिंदू साधु) के रुप में अभिवादित किया है। बंगाली में बंकिम द्वारा लिखित उपन्यास, आनंदमठ, एक हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की रूपरेखा (Outline of the concept of Hindu nation) दर्शाने वाला पहला सबसे महत्वपूर्ण काम था।

आनंदमठ आज भी हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास करने वालों के लिए बाइबल है।

इस उपन्यास की सामग्री के साथ परिचित होने से पहले, यह उचित होगा कि उपन्यास और इसके लेखक के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जान लिया जाये। यह वही उपन्यास है जिसमें बंकिम नें वंदे मातरम गीत प्रस्तुत किया जो राष्ट्रवाद को मात्-पूजा के समरूप स्थापित करता था।

आनंदमठ मूलतः अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत के उत्तर बंगाल के हिंदू संन्यासी की मुस्लिम नवाबों के शासन के खिलाफ विद्रोह की कहानी है। ये विद्रोही स्वयं को संतान (बच्चों) के रूप में संबोधित करते थे। यह उपन्यास 1882-5 में दिखाई दिया, 1857 की आजादी के महान युद्ध में भारतीयों की हार के 25 साल बाद, जब मुस्लिम शासकों का औपचारिक अधिकार भी समाप्त हो गया था। यह ध्यान देने योग्य है कि ब्रिटिश शासकों ने मुख्यतः मुसलमानों को 1857 के विद्रोह के लिए जिम्मेदार ठहराया था और फलस्वरूप उनपर भारी दंड लगाया था। आनंदमठ तब प्रकट हुई थी जब ब्रिटिश संप्रभुता औपचारिक रूप से भारत के एक बड़े हिस्से पर स्थापित हो चुकी थी।

यह ध्यान रखना दिलचस्प होगा कि इस उपन्यास को हिंदू राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी पुस्तक बताया गया है जबकि बंगाली में प्रकाशन के लगभग 25 वर्षों के बाद भी इसके बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था। यह बंगाल के विभाजन (1905) के बाद लोकप्रिय हुआ जब इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया। इसने हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के रूपों के उदय के लिए ज़मीन तैयार की।

यह दिलचस्प था कि आनंदमठ के लेखक, बंकिम, को बंगाल के ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर ने सीधे वर्ष 1858 में डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त किया था। वह 1857 के तुरंत बाद ऐसे पद पर नियुक्त पहले भारतीय थे जबकि ‘विद्रोह’ अभी भी चल रहा था। ब्रिटिश शासकों की सेवा के 33 साल के बाद जब बंकिम वर्ष 1891 में जिला मजिस्ट्रेट के रूप में सेवानिवृत्त हुए तब ब्रिटिश क्राउन ने उनकी ब्रिटिश राज की सेवाओं के लिए उन्हें राय बहादुर और सीआईई (भारतीय साम्राज्य के आदेश के संयमी) के शीर्षक से सम्मानित किया, विशेष रूप से, पूर्वी नहर में शांति और व्यवस्था बहाल करने के लिए।

जब आरएसएस/बीजेपी आदित्यनाथ की तुलना 18वीं सदी के सनातन सेना के संन्यासी से करते हैं तो वे जानबूझकर ऐसा करते हैं जबकि इस तथ्य के बारे में वे अच्छी तरह से वाकिफ़ है कि इन संन्यासियों ने बंगाल से मुसलमानों को साफ करने के लिए एक हिंसक अभियान चलाया था। दिलचस्प बात यह है कि आनंदमठ ने न केवल मुसलमानों की सफाई का प्रचार किया बल्कि ब्रिटिश शासकों द्वारा भारतीयों की अधीनता का स्वागत और प्रशंसा की। इस उपन्यास की बदनाम, अमानवीय और राष्ट्र-विरोधी सामग्री को समझने के लिए इसके कुछ प्रासंगिक अंश नीचे दिए गए हैं।

कैसे मुस्लिमों को लूटा गया और उनके गांव जलाये गए : लूट का वितरण ने कैसे और अधिक संतान कार्यकर्ताओं को सुरक्षित किया।

आनंदमठ के अनुसार,

“संतानों नें गांव-गांव में जासूस भेजना शुरू कर दिया। गांवों में जाकर वहां हिंदूओं को ढूँढकर जासूस उनसे पूछते, ‘हे भाई, क्या आप भगवान विष्णु की पूजा करेंगे?’ उन्होंने इस माध्यम से 20/25 व्यक्तियों को इकट्ठा किया, और वे मुस्लिम गांवों में उतर आए और उनके मकानों को जला दिया। मुसलमान अपने जीवन की सुरक्षा के लिए चिंतित थे और संतों ने उनका सब कुछ लूट कर भगवान विष्णु के नए भक्तों के बीच वितरित किया था। लूट का हिस्सा प्राप्त करने पर ग्रामीण लोग संतुष्ट हो गए, उन्हें विष्णु मंदिर में लाया गया और मूर्ति के पैरों को छूने के बाद सशक्त संतानों गुणों में परिवर्तित किया गया। लोगों ने पाया कि संतान वाद नें त्वरित लाभांश दिया…उन्होंने खुद को समूहों में संगठित किया और मुसलमानों पर दबदबा स्थापित करने के लिए बाहर आए…जहां कहीं भी उन्होंने पैसा पाया, लूट के रास्ते घर में ले आये। जहाँ कहीं भी मुस्लिम गांव मिले, उन्होंने उन्हें आगजनी से राख में तब्दील कर दिया।”

मुसलमानों के क़त्ल का आनंद उठाना और मस्जिद को ध्वस्त करने के बाद और मंदिर का निर्माण

“कोई चिल्लाया, ‘मारो, मारो, मुसलमानों को मार डालो, दूसरे चिल्लाये जय हो, जय हो, महाराज की जय हो’ …कोई और बोला, ‘भाइयों, जब तक रविवार आएगा मैं राधामाधव मंदिर का निर्माण कर रहा होऊंगा, मस्जिद को ध्वस्त कर दो’”।

आनंदमठ में संतान हिंदू सेना द्वारा मुसलमानों के सफाये के युद्ध-बाद ग्राफिक विवरण भी शामिल हैं

“रात में हरि के नाम के जाप के साथ देश भर गया। संत यहां-वहां समूह-दर-समूह में भटक रहे थे… कोई गाँव की तरफ़ भाग गया, कोई शहर की ओर, यात्रियों या गृहस्थ व्यक्तियों को पकड़ लिया गया और ‘मैं माँ को सलाम करता हूँ’ बोलने को कहा गया वरना मार देने की धमकी दी गयी, कोई मिठाई की दुकान की लूट पर रहता है, कोई गाय के चरवाहे के घर जाता है और मिट्टी के बर्तनों को गिराकर दही चाट जाता है। कुछ [ऐसे] कहते हैं, हम दूधिया हैं, जो ब्रज से आये हैं, दूधवाली कहाँ हैं? एक रात के भीतर गाँव दर गाँव, शहर दर शहर चीखें प्रबल होती जाती हैं। सबने कहा, मुसलमानों को हरा दिया गया है; देश फिर से हिंदुओं का हो गया। तुम सब एक बार फिर तेज़ आवाज़ में चिल्लाओ, ‘हरि, हरि’। ग्रामीण लोग आस पास के सभी मुसलमानों को मारने के लिए बाहर आ गए। रात में, कुछ लोगों को समूहों में आयोजित कर मुस्लिम इलाके में जाकर, उन्होंने उनके घरों को जलाया और सब कुछ लूट लिया। कई मुस्लिम मारे गए, उनमें से कईयों ने दाढ़ी काट ली, अपने शरीर को मिट्टी से लिपेट लिया और हरि का नाम गाना शुरू कर दिया। जब पूछा गया, उन्होंने कहा, हम हिंदू हैं। भयग्रस्त मुस्लिम समूह दर समूह शहर की तरफ आ गया…मुसलमानों ने कहा, अल्लाह अल्लाह! क्या कुरान शरीफ [पवित्र कुरान] इतने दिनों के बाद पूरी तरह से गलत साबित हुआ है? हम पांच बार नमाज करते हैं, लेकिन चंदन लगाये हुए हिंदुओं को खत्म नहीं कर सके। सारा ब्रह्मांड झूठा है।

यहां पर ध्यान दिया जा सकता है कि मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के इन भयानक कृत्यों को हिंदुत्व संगठनों के प्रशिक्षण सत्रों में खेल के रूप में अधिनियमित किया गया है। मुसलमानों के नरसंहार के तरीको में 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के पूर्व और बाद के दौरान और 2002 में गुजरात नरसंहार के दौरान आनंदमठ के तकनीकों की स्पष्ट छाप दिखी।

ब्रिटिश शासकों की स्तुति

आनंदमठ में, हिंदू सेना के एक नेता, भवनन्द ने, मुसलमानों और अंग्रेजों के बीच के अंतर को समझाते हुए एक ‘नई भर्ती’ से कहा:

“एक अंग्रेज अपने जीवन के खतरे पर भी नहीं भागता, मुस्लिम तन पर पसीना आते ही भाग खड़ा होता है- वह शरबत की तलाश करता है- मानते हैं, अंग्रेजों के पास उनकी दृढ़ता है- जो भी वे शुरू करते हैं, उसे पूरा करते हैं, जबकि मुसलमानों में केवल मूर्खता है… फिर अंतिम शब्द साहस है… जबकि एक तोप-गोले [गिरते हुए] को देखकर मुसलमान अपने पूरे समुदाय के साथ भाग जायेगा- जबकि तोप-गोलों की गोला बारी के सामने, एक भी अंग्रेज नहीं भागेगा।”

अंग्रेजों के राजा बनने के बिना सनातन धर्म को बहाल करने की कोई संभावना नहीं है। जब कुछ संतान कार्यकर्ता परिणाम से असंतुष्ट थे और ब्रिटिश के खिलाफ भी लड़ने की मांग कर रहे थे, एक रहस्यवादी नेता दिखाई दिया और उन्हें बताया:

“किसी अंग्रेज के राजा नियुक्त होने के बिना सनातन धर्म को बहाल करने की कोई संभावना नहीं है…जनता [हिंदू] अंग्रेजी राज्य में खुश होगी और बिना किसी परेशानी के सद्गुण (धर्म) का अभ्यास करेगी। इसलिए, यह विवेकपूर्ण है कि आप अंग्रेजों के साथ युद्ध छेड़ने से बचें और मुझे अनुसरण करें…आपका मिशन सफल रहा है- आपने माँ का भला किया है- इंग्लिश शासन स्थापित किया गया है। आप युद्ध और दुश्मनी-भाव को छोड़ दें। लोगों को खेती से जुड़ने दें- पृथ्वी को फसलों से भर दें- लोगों को समृद्ध होने दें… कोई और दुश्मन नहीं है। यह अंग्रेज हमारा सहयोगी राजा है। इसके अलावा, किसी के पास ऐसी शक्ति नहीं है जो युद्ध में अंततः अंग्रेजों से जीत सकता है।”

आनंदमठ के दो बुनियादी गुण; इस्लाम/मुसलमानों के प्रति हिंसक विरोध और व्हाईट मास्टर्स (अंग्रेज़ों) की बंदगी करना, हिंदू राष्ट्रवाद के मौलिक खंभे बने रहे। ये स्पष्ट रूप से हिंदुत्व के दिग्गजों वी.डी. सावरकर, के.बी. हेडगेवार, बी.एस. मुन्जे और एम.एस. गोलवलकर के लेखों और कामों में दिखाई देते थे।

हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा आदित्यनाथ का आनंदमठ के संन्यासी के रूप में चित्रण इस तथ्य का पुनर्मूल्यांकन है कि आरएसएस/भाजपा का मूल एजेंडा एक समान रहता है; भारत से मुसलमानों की सफाई।

आनंदमठ का यह पहलू सिर्फ वर्तमान समय में चिंता का विषय नहीं है। बंगाली साहित्य के सबसे दिग्गज साहित्यिकारों में से एक, नरेश चन्द्र सेन-गुप्ता 1882-1964, जिन्होंने आनंदमठ का 1906 में पहली बार अंग्रेजी में अनुवाद किया, इस प्रस्तावना में बहुत साफ किया है कि,

“हमारे लेखक की राष्ट्रभक्ति की अवधारणा के दो उत्कृष्ट विशेषताएं हैं इसकी प्रांतीयवाद और इसके धार्मिक स्वर। जहाँ तक इनकी देशभक्ति में प्रांतीयवाद से संबंध है, यह विश्वास करना मुश्किल है कि वह राष्ट्रीयता के वृहतर विचार से अंजान था जो आज सभ्य भारतीयों का लक्ष्य है”…

नरेश ने इस उपन्यास में अंधविश्वास पर आधारित हिंदू राष्ट्र की निंदा की और इस तथ्य पर शोक प्रकट किया,

“वर्तमान कार्य में धार्मिक आधार पर राष्ट्रीयता की इस अवधारणा से दो बहुत ही भयावह परिणाम दिखते हैं। पहला हिंदू देवों का नए देशभक्त देवताओं और देवीयों से पुनर्वास का प्रयास, और दूसरा मुसलमानों के प्रति विकृत नापसंदी जो कि इस काम में दिखती है। इनमें से कोई भी कम लाभदायक प्रतीत नहीं होता है। पहला, अंधविश्वास पर एक बीमा दर तय करता है और एक ऐसी प्रक्रिया का सुझाव देता है जो आज के कुछ सार्वजनिक पुरुषों द्वारा दुर्भाग्यवश पालन की जा रही है। अगर इसका अर्थ है अंधविश्वास के रास्ते से अंधविश्वासी मन में देशभक्ति भरना, तो यह दुखद रूप से हताश करती है; इस प्रकार की विकृत देशभक्ति कभी वास्तविक देशभक्ति में विकसित नहीं हो सकती है और हमेशा के लिए अंधविश्वास बनी रहेगी।…”

नरेश की राय यह भी थी कि हिंदू राष्ट्रवाद की कोई भी बात

“हिंदुओं, मुसलमानों और अन्य धार्मिक समुदायों की सामान देशभक्तिपूर्ण कार्यों में भागीदारी को रोक कर वास्तविक भारतीय राष्ट्रीयता के विकास को बाधित कर देगी। इस कारण से अंधविश्वास पर आधारित देशभक्ति के अपयश का प्रयोग केवल व्यर्थ ही नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से हानिकारक है।”

उपन्यास के इस्लाम/मुस्लिम विरोधी भावनाओं के बारे में नरेश ने दुखद निष्कर्ष दिया:

“अब इस उपन्यास के हर पाठक को एक बात स्पष्ट होगी कि इसके हीरो स्पष्ट रूप से मुसलमानों के प्रति प्रतिकूल हैं। अनुवाद द्वारा इस काम को सार्वजनिक करने से पहले मुझे तीन बार सोचना पड़ा। हमारे मुसलमान मित्रों के पास निःसंदेह नाराज हो जाने का पूरा अधिकार है जिस तरह उपन्यास में मुसलमान विरोधी भावनाओं को विकसित किया गया है…”

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक उपन्यास जिसने ब्रिटिश शासकों के खिलाफ एकजुट स्वतंत्रता संग्राम को भंग करने में प्रमुख भूमिका निभाई, को पुनर्जीवित किया जा रहा है।

यूपी में आरएसएस/भाजपा की जीत को (डाले गए मतदान का केवल 39.7%) इस तरह मनाया जा रहा है जैसे आनंदमठ में मुसलमानों पर संतान सेना की जीत।

भारत एक चौराहे पर खड़ा हुआ दिखता है; एक लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पथ पर जारी रखना या आनंदमठियों के पथ पर चलना स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी चुनौती है।

यह आशा है कि एक समावेशी भारत आरएसएस/बीजेपी को उसके नीच लक्ष्य में सफल नहीं होने देगा जो आनंदमठ के संन्यासियों के भूत को वर्तमान भारत को खोखला करने के लिए मुक्त कर दे।

लेखक: शम्सुल इस्लाम

अंग्रेज़ी से अनुवाद: मोहित जायसवाल

शम्सुल इस्लाम दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।

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