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आरक्षण के नाम पर दलित-मुस्लिम मनमुटाव कराने की योगी की साज़िश

आरक्षण के नाम पर दलितमुस्लिम मनमुटाव कराने की योगी की साज़िश

उबैद उल्लाह नासिर

पुरानी कहावत है कि चोर चोरी से जा सकता है हेरा फेरी से नहीं। यही हालत बीजेपी के नेताओं की है, वह चाहे जितने बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे हों, लेकिन अपने सियासी फायदे के लिए संविधान की आत्मा ही नहीं उसके शब्दों तक से खिलवाड़ करने में उन्हें रत्ती भर भी संकोच नहीं होता। इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वह बयान जिसमें उन्होंने कहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में भी दलित छात्रों को रिजर्वेशन दिया जाना चाहिएI



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लगभग पन्द्रह बरसों तक सांसद रह चुके और अब देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते यह तो नहीं कहा जा सकता कि योगी जी को इस सम्बन्ध में संविधान की धाराओं का ज्ञान नहीं होगा, लेकिन अपने सियासी एजेंडे के लिए वह जानबूझ कर ऐसी बात कह रहे हैं जिससे दलितों और मुस्लिमों के सियासी गठजोड़ में मट्ठा पड़ सके, क्योंकि 2019 के सियासी महासमर में उनको यही सबसे बड़ा खतरा दिखाई देता है कि यदि 22% दलित और 19% मुसलमान एक प्लेटफोर्म आ गए तो आरएसएस के सब किए धरे पर पानी फिर जायगा। इसीलिए इस तरह के भावनात्मक मुद्दे उछाल कर वह दोनों के बीच मनमुटाव पैदा करने की कोशिश करती रहती है। योगी जी का हालिया बयान इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिएI

योगी से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि केवल इन्हीं दो मुस्लिम शिक्षण संस्थाओं में ही आरक्षण की बात वह क्यों कर रहे हैं? लगभग सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के शिक्षण संस्थान हैं, इन में बड़ी-बड़ी युनिवर्सिटी, इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट कॉलेज हैं, वहां रिजर्वेशन की बात वह क्यों नहीं उठाते ?

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“मैं हिन्दू हूँ, इसलिए ईद नहीं मनाऊंगा, और टीपू सुल्तान बनाम हनुमान” जैसी घोर आपत्तिजनक और सम्प्रदायिक बातें करने वाले योगी जी के श्रीमुख से ऐसी बातें अनहोनी या नयी नहीं हैं, हालांकि संवैधानिक पद पर बैठने के बाद वह न हिन्दू रह गए न मुलसमान न कुछ और वह केवल और केवल मुख्यमंत्री हैं जिनकी ज़िम्मेदारी संविधान के शब्दों की ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा और मूल भावना की रक्षा है और संविधान की मूल भावना देश की एकता अखंडता ही नहीं बल्कि भाईचारा ( Fraternity) बनाये रखने की है जिसका वर्णन संविधान में साफ़-साफ़ दर्ज हैI

संविधान संशोधन कर के भी अल्पसंख्यकों के अधिकार छीने नहीं जा सकते- सुप्रीम कोर्ट

संविधान की धारा 30 ने अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थाएं खोलने और उन्हें अपने हिसाब से मैनेज करने का अधिकार दिया गया है, इसके साथ ही संविधान की धारा 15 की उपधारा 5 के तहत इन अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं को आरक्षण से अलग रखा गया है। 2005 में बीजेपी ने इस धारा को समाप्त करने के लिए लोक सभा में प्रस्ताव रखा था, जो 272के मुकाबले में 110 वोटों से गिर गया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया, जिसने 2008 के अपने फैसले में लोक सभा के फैसले को बरक़रार रखते हुए कहा कि इन शिक्षण संस्थाओं को आरक्षण से अलग रखना पूरी तौर से न्यायसंगत और संविधान के अनुरूप है, क्योंकि यह संस्थान अल्पसंख्यकों की विशेष आवश्यकताओं को पूरे करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यकों के अधिकार संविधान के बुनियादी ढाँचे में शामिल हैं और संविधान संशोधन कर के भी उन्हें छीना नहीं जा सकताI

इतनी साफ़ और खुली हुई संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद अगर किसी प्रदेश का मुख्य मंत्री ऐसी मांगें रखता है तो साफ़ ज़ाहिर है की उसका मकसद दलितों से हमदर्दी नहीं, बल्कि देश के दो समुदायों के बीच कटुता पैदा करना हैI

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अब ज़रा एक नज़र देश भर के विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की सही सूरत हाल पर डाल लेते हैंI संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार देश की सरकारी शिक्षण संस्थाओं की फैकल्टी में 15% आरक्षण अनुसूचित जाति और 7.5% आरक्षण अनुसूचित जनजाति का होना चाहिए, लेकिन 2016 के एक सर्वे के अनुसार अब तक केवल 7.5% आरक्षण ही इन विद्यालयों में हो सका है। लगभग 14 लाख फैकल्टी मेम्बरों में इस वर्ग के मेम्बरों की संख्या मात्र एक लाख के आस पास है। योगी जी को अगर दलितों से इतना ही प्रेम है तो वह पहले इस बैकलॉग को पूरा करने की वैसी ही मुहीम क्यों नही चलाते जैसी मायावती के समय में चली थी। दूसरे के घरों में ताक झाँक से पह्ले योगी जी खुद अपना घर दुरुस्त क्यों नहीं करते ?

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वैसे बताते चलें कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बहुत से विभागों विशेषकर मेडिकल इंजीनियरिंग मैनेजमेंट आदि में हिन्दू छात्रों की संख्या 45 % तक है। आवश्यकता है कि विश्वविद्यालयों के करता धरता जनता के सामने यह सच्चाई लायें और ऐसी पारदर्शी व्यवस्था करें कि अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्गों के छात्रों को भी भरपूर दाखिला मिल सके। इस के लिए संविधान की व्यवस्था की ज़रूरत नहीं केवल अपना सिस्टम दुरुस्त करने की ज़रूरत है।



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