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एक मूर्तिमान संस्था थे गणेश शंकर विद्यार्थी

गणेश शंकर विद्यार्थी के बलिदान दिवस पर

On the sacrifice day of Ganesh Shankar Vidyarthi

कौन भूल सकता है कानपुर के उस भीषण नर-संहारकारी हिन्दू मुस्लिम दंगे को? बीसीयों मंदिर और मस्जिदें तोड़ी और जलाई गईं, हजारों मकान और दुकानें लुटीं और भस्मीभूत हुईं। लगभग 75 लाख की सम्पत्ति स्वाहा हो गई, करीब 500 से भी ऊपर आदमी मरे और हजारों घायल हुए। कितनी माताओं के लाल, काल के गाल में समा गए, कितनी युवतियों की माँग का सिन्दूर धुल गया, हाथ की चूड़ियाँ फूट गईं, कितने फूल से कोमल और गुलाब से आकर्षक नवजात शिशु और बच्चे मूली-गाजर की तरह काट डाले गये और कितने मातृ-पितृहीन होकर निराश्रित और निःसहाय बन गए। कितने लखपति, भिखारी बन गये। ऐसा भंयकर, ऐसा सर्वनाशकारी, ऐसा आतंकपूर्ण था कानपुर का वह दंगा! परंतु यह सब होते हुए भी इसका नाम चिरस्थायी न होता, यदि गणेश शंकर विद्यार्थी आत्माहुति देकर, हिन्दू-मुसलमानों के लिए एक महान और सर्वथा अनुकरणीय आदर्श उपस्थित न कर जाते।

चार दिन तक कानपुर में कोई व्यवस्था, कोई कानून न था, अंग्रेजी राज्य, चार दिन के लिए मानों खत्म हो गया था। कोई किसी को पूछने वाला न था। हिन्दू मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे। दोनों अपनी मानवता भूलकर राक्षसीपन पर उतर पड़े थे। धर्म और मज़हब के नाम पर परमात्मा और खुदा का नाम लजाया जा रहा था। क्या बच्चा, क्या वृद्ध, क्या पुरूष और क्या स्त्री, किसी का भी जीवन सुरक्षित न था। हिन्दू मोहल्लों में मुसलमान और मुसलमान मोहल्लों में हिन्दू लूटे-मारे, जलाए और कत्ल किये जा रहे थे। ऐसे कठिन समय में बड़े-बड़े मर्दाने वीर भी आगे बढ़ने से हिचक रहे थे। पर उस वीर से न रहा गया, वह आग में कूद पड़ा और अपने को हिन्दू-मुस्लिम एकता की वेदी पर, परोपकारिता के उच्च आदर्श पर, सैकड़ों स्त्री-पुरूषों की प्राणरक्षा करने की लगन पर, मनुष्यता पर और सबसे अधिक अपने जीवन की अन्याय तथा अत्याचार विरोधी उत्कृष्ट भावना पर निछावर हो गया! वह वीर था गणेशशंकर विद्यार्थी।

24 मार्च मंगलवार 1931 को कानपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगा शुरू हुआ। विद्यार्थी जी निकले और झगड़े के स्थानों में पहुँचकर लोगों को शान्त करने, उनकी प्राण-रक्षा करने और उनके मकानों और दुकानों को जलने एवं लूटे जाने से बचाने की कोशिश करने लगे। शाम तक वह इसी धुन में मारे-मारे फिरते रहे। लोगों को बचाते वक्त उनके पैरों में कुछ चोटें र्भी आईं। उस दिन पुलिस का जो रवैया उन्होंने देखा, उससे वे समझ गए कि पुलिस घोर पक्षपात और उपेक्षा से काम ले रही है। ऐसी दशा में लोगों के जान-माल की रक्षा के लिए पुलिस के पास जाना बिलकुल व्यर्थ है।

उस रात और अगले दिन सुबह, दंगे का रूप और भी भीषण हो गया और चारों तरफ से लोगों के मरने, घायल होने, मकानों के जलाए और दुकानों के लूटे जाने की खबरें आने लगीं। इन लोमहर्षक समाचारों को सुनकर विद्यार्थी जी का दयापूर्ण और परोपकारी हृदय पिघल उठा और वे नौ बजे सुबह सिर्फ थोड़ा-सा दूध पीकर लोगों को बचाने के लिए चल पड़े। उनकी धर्मपत्नी ने जाते समय कहा- “कहाँ इस भयंकर दंगे में जाते हो?“ उन्होंने जवाब दिया-“तुम व्यर्थ घबराती हो। जब मैंने किसी का बुरा नहीं की तब मेरा कोई क्या बिगाड़ेगा? ईश्वर मेरे साथ है।“

शुरू में उनको पटकापुर वाले ले गए और वहाँ के करीब 50 आदमियों को उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर भेजा। वहाँ से वे बंगाली मोहल्ला और फिर इटावा-बाजार पहुँचे। लगभग तीन बजे वे इन दोनों मोहल्लों के मुसलमानों को धधकते और गिरते हुए मकानों से निकाल-निकलाकर उनके इच्छित स्थानों को भेजते रहे। इस प्रकार करीब 150 मुसलमान स्त्री, पुरूष और बच्चों को उन्होंने वहाँ से बचाया। कितने ही मुसलमानों को तो उन्होंने और कोई सुरक्षित जगह न देखकर, अपने विश्वासी हिन्दू मित्रों के यहाँ रखकर उनकी जान बचाई।

उस समय जिन्होंने उन्हें देखा यही देखा कि विद्यार्थी जी अपना डेढ़ पसली का दुबला-पतला शरीर लिए नंगे पाँव, नंगे सिर, सिर्फ एक कुर्ता पहने, बिना कुछ खाए-पिए, बड़ी मुस्तैदी और लगन के साथ घायलों और निःसहायों को बचाने में व्यस्त थे। किसी को कन्धे पर उठाये हुए हैं और तो किसी को गोदी में लिए अपनी धोती से उसका खून पोंछ रहे हैं।

इसी बीच उनसे लोगों ने मुसलमानी मोहल्लों में हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों का हाल कहा। यह जानते हुए भी कि जहाँ की बात कही जा रही है, वहाँ मुसलमान रहते हैं और वे इस समय बिलकुल धर्मान्ध होकर पशुता का ताण्डव-नृत्य कर रहे हैं, विद्यार्थी जी निर्भीकता के साथ उधर चल पडे़। रास्ते से उन्होंने मिश्री बाजार और मछली बाजार के कुछ हिन्दुओं को बचाया और वहाँ से चौबे-गोला गए। वहाँ पर विपत्ति में फँसे हुए बहुत से हिन्दुओं को उन्होंने निकलवाकर सुरक्षित स्थानों में भेजा और औरों के विषय में पूछ ही रहे थे कि मुसलमानों ने उन पर और उनके साथ के स्वयंसेवकों पर हमला करना चाहा। इस समय उनके साथ दो हिन्दू और एक मुसलमान स्वयंसेवक थे। मुसलमान स्वयंसेवक संघ के यह कहने पर कि “पण्डित जी को क्यों मारते हो, इन्होंने तो सैकड़ों मुसलमानों को बचाया है,“ भीड़ ने उन्हें छोड़ दिया। इसके थोड़ी ही देर बाद मुसलमानों के एक दूसरे गिरोह का एक आदमी आगे बढ़ा। मुसलमान स्वयंसेवक ने उसे भी समझाया कि “पण्डितजी ने सैकड़ों मुसलमान भाईयों को बचाया है, इन पर वार न करो“, पर उसने इस पर विश्वास न किया और भीड़ को विद्यार्थी जी को मारने का इशारा कर दिया। इसी समय कोई एक सज्जन विद्यार्थी जी को बचाने की गरज से उन्हें गली की ओर खींचने लगे। इस पर विद्यार्थी जी ने उनसे कहा- “क्यों घसीटते हो मुझे? मैं भागकर जान नहीं बचाऊँगा। एक दिन मरना तो है ही। अगर मेरे मरने से ही इन लोगों के हृदय की प्यास बुझती हो, तो अच्छा है कि मैं यहीं अपना कर्तव्य पालन करते हुए आत्मसमर्पण कर दूँ।“

विद्यार्थी जी यह कह ही रहे थे कि चारों ओर से उन पर और स्वयंसेवकों पर मुसलमान लोग टूट पड़े। लाठियाँ भी चलीं, छुरे भी चले और न जाने किन-किन अस्त्रों के वार हुए। मुसलमान स्वयंसेवक को थोड़ी मार के बाद मुसलमान होने की वजह से छोड़ दिया गया। दोनों हिन्दू स्वयंसेवक बुरी तरह घायल हुए। इनमें श्री ज्वालादत्त नामक एक स्वयंसेवक तो वहीं स्वर्गवासी हुए, पर दूसरे की जान बच गई।

विद्यार्थी जी को कितनी चोटें लगीं, उनकी मृत्यु कितनी देर बाद हुई और वहाँ से उनकी लाश कब कौन, कहाँ ले गया, इसका कुछ भी ठीक-ठीक पता आज तक नहीं चला।

दूसरे दिन दो-चार व्यक्तियों के कथन से भी विद्यार्थी जी के चौबे-के-गला नामक स्थान पर जाने और वहाँ मुसलमानों की भीड़ से घिरने की बात का पता लगता है और इसी निश्चय पर पहुंचना पड़ता है कि वहीं पर उन धर्मान्ध मुसलमानों के उन पर वार हुए और वहीं उनके प्राण पखेरू उड़ गए। मरने के बाद मुसलमानों ने उन्हें शीघ्र ही वहाँ से हटाकर किसी मकान में छिपा दिया और दो-तीन दिन बाद, जबकि लाश फूलकर बहुत बदसूरत हो गई और पहचाने जाने लायक नहीं रही, तब उन्होंने उसे किसी प्रकार और लाशों के साथ मिलाकर अस्पताल में भेज दिया।

27 मार्च को एकाएक पता चला कि अस्पताल में जो बहुत-सी लाशें पड़ी हुई हैं उनमें एक के विद्यार्थी जी की लाश होने का सन्देह है। तुरंत प. शिवनारायण मिश्र और डॉ. जवाहरलाल वहाँ पहुँचे और यद्यपि लाश फूलकर काली पड़ गई थी, बहुत कुरूप हो गयी थी, फिर भी उन्होंने उनके खद्दर के कपड़े, उनके अपने ढंग के निराले बाल और हाथ में खुदे हुए ‘गजेन्द्र’ नाम आदि देखकर पहचान लिया कि दरअसल वह विद्यार्थी जी ही की लाश थी। उनका कुर्ता अभी तक उनके शरीर पर था और उनकी जेब से तीन पत्र भी निकले, जो लोगों ने विद्यार्थी जी को लिखे थे।

इस प्रकार विद्यार्थी जी ने अत्यन्त गौरवमय मृत्यु-जो हममें से शायद ही किसी को कभी नसीब हो-प्राप्त की। न जाने कितनों को वह अनाथ करके, निराश्रित बनाकर, रूलाकर, चले गए। पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के शब्दों में वास्तव में-“आज उस दीनबन्धु के लिए किसान रो रहे हैं। कौन उनकी उदर-ज्वाला को शान्त करने के लिए स्वयं आग में कूद पड़ेगा? मजदूर पछता रहे हैं। कौन उन पीड़ितों का संगठन करेगा? मवेशीखानों से भी बदतर देशी राज्यों के निवासी आज अश्रुपात कर रहे हैं। कौन उन मूक पशुओं को वाणी प्रदान करेगा? ग्रामीण अध्यापक रूदन कर रहे है। कौन उन्हें आश्रय देकर स्वयं आफत में फँसेगा, उनके कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वातंत्रय-संग्राम में आगे बढे़गा? और एक कोने में पडे़ हुए उनके कुछ पत्रकार बन्धु भी अपने को निराश्रित पाकर चुपचाप आँसू बहा रहे हैं आपातकाल में कौन उन्हें सहारा देगा? किससे वे दिल खोलकर बाते कहेगे; किसे वे अपना बड़ा भाई समझेंगे और कौन अपने छोटे भाईयों का इतना ख्याल रखेगा?“

विद्यार्थी जी के निधन का समाचार मालूम होने पर 27 मार्च को कराँची कांग्रेस की विषय-निर्धारिणी समिति में इसका उल्लेख करते हुए महात्मा गाँधी ने बहुत ही मर्मस्पर्शी शब्दों मे इस प्रकार कहा था

 ‘श्री गणेश शंकर विद्यार्थी एक मूर्तिमान संस्था थे। ऐसे मौके पर उनकी मृत्यु का होना एक बड़ी दुःखद बात है; वे हिन्दुओं और मुसलमानों को एक दूसरे का सिर तोड़ने से बचाते हुए मरे। अब समय आ गया है कि हिन्दू और मुसलमान इस प्रश्न की महत्ता को महसूस करें और ऐसे दंगे के मूल कारण का अन्त करने की कोशिश करें।’

यंग इण्डिया में महात्मा जी ने विद्यार्थी जी के बलिदान के बाद निम्नलिखित टिप्पणी लिखी थी।

“गणेशशंकर विद्यार्थी को ऐसी मृत्यु मिली जिस पर हम सबको स्पर्द्धा हो। उनका खून अन्त में दोनों मज़हबों को आपस में जोड़ने के लिए सीमेण्ट का काम करेगा। कोई समझौता हमारे हृदयों को आपस में नहीं जोड़ सकता। पर गणेशशंकर विद्यार्थी ने जिस वीरता का परिचय दिया है, वह अन्त में पत्थर से पत्थर हृदय को भी पिघला देगी; और पिघला कर मिला देगी।“

एल एस हरदेनिया

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