इक अहम सवाल. उसको वेश्या नाम दिया किसने?

One important question. Who named her prostitute?

एक बार किसी फेसबुक पोस्ट (Facebook post) पर मैंने कमेंट किया था कि राजनीति को लोग वेश्या की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं (People are using politics as a prostitute) जब चाहा जिस रूख से चाहा उस करवट में सुला लिया……

फिर क्या, एक सज्जन व्यक्ति ने कहा कि वेश्या शब्द आपकी पोस्ट पर शोभा नहीं देता। मेरा सच को सच कहना अखर गया। मैं लड़की हूं तो तमीज़ का दारोमदार मुझ पर है। कैसे कर सकती हूं ऐसे अल्फाज़ का इस्तेमाल, कैसे सोच और सीख लिया बोलना सही को सही और ग़लत को ग़लत कहना?

कैसे जी सकती हूँ अपनी मर्ज़ी से अपने हिस्से की ज़िंदगी, कैसे कर सकती हूँ मनमर्जियाँ? क्यों खुली फि़ज़ा में सास लूं, क्या हक़ है प्रेम करने और प्रेम, सम्मान पाने का?

अब सोचिए वेश्या की जगह अगर उन्हें नगर कन्या, रूपाजीवा, पण्यस्त्री, गणिका, वरवधू, लोकांगना, नर्तकी आदि नामों से भी पुकारा भी जाए तो क्या लोगों का नज़रिया उनके प्रति बदल जाएगा?

क्या लोग उनको देह से परे देखने लग जाएंगे?

क्या तथाकथित सभ्य समाज उनको अपना लेगा?

क्या यही सभ्य समाज उनको पत्नी का दर्जा देना स्वीकृत करेगा?

इक अहम सवाल उसको वेश्या नाम दिया किसने?

जब उनका नामकरण किया जा रहा था या किसी भी स्त्री की इज्ज़त सरे बाज़ार,  डिबेट में या कोर्ट में उछाली जाती है, तब कहां होता है ये सभ्य समाज?

तब कहां होता है ये सभ्य समाज जब पुरूष अपनी बिहाता को छोड़ उन स्त्रियों की शरण में जाकर सुख भोगता है तो यही समाज पत्नी को चुप रहने की सलाह देता है कि चार लोग क्या सोचेंगे?

वो वेश्या है तो उसका सुख भोगने वाला पुरूष क्या या कौन है?

नगीना खान – Nagina Khan युवा अधिवक्ता व कानून शिक्षिका हैं।

भाड़ में जाएं ऐसे लोग जो आंसू पोंछकर पीड़ा कम करने के बजाय अपने बनाएं झूठे नियम स्त्रियों पर थोपने आते हैं और खामोश रहकर सहने की सलाह देते हैं।

जो लड़कियां अपनी मर्जी से इस समाज के ठेकेदारों के मुंह पर तमाचा जड़ती हैं और समाज के झूठे दंभ, अहंकार को ठोकर मार उनकी बनाई लक्ष्मण रेखा पार कर जाती हैं, तो ऐसी लड़कियों को यही समाज नाम देता है बिगड़ी लड़कियां… भक्क दोगले कहीं के।

कुछ लोगों की आदत होती हैं मुंह में हाथ डालकर वही शब्द उगलवाने की जो वो सुनना चाहते हैं, चाहें भले ही वो झूठ ही क्यों न हो।  इसके लिए वो किसी हद तक भी गिर सकते हैं, चाहे किसी की आवाज़ को खामोश करवा दे या मुर्दों को अपनी आवाज़ दे पर सुनेगें वही जो वो चाहते हैं। उनकी औकात याद दिला दो तो ऐसा बिलबिलाते है जैसे कुत्ते की पूंछ पर पैर रख दिया हो।

माफ़ कीजिएगा। न तो ये लहजा न ये शब्द और न ही फ़ितरत है मेरी लेकिन न चाहते हुए भी लिखना पड़ जाता है। आपको पसंद नहीं तो तशरीफ़ न लाएं पोस्ट पर। आपको छूट है अनफ्रेंड करे, ब्लाक करे। माफ़ कीजिएगा मेरी जुबां वो हरगिज़ नहीं कुबूल करेंगी जो आप सुनना चाहते हैं।

अगर पक्षपात, भेदभाव वर्ग विशेष के साथ जातिगत, धार्मिक, सामाजिक आधार पर है तो जुबां वहीं कहेगी और कलम वहीं लिखेगी जो सच है।

नगीना खान

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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