जस्टिस काटजू का लेख : विशाल जागरण है, किसान आंदोलन ने हमारी एकता की नींव रखी

भारतीय लोग अब महसूस कर रहे हैं कि उनकी गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवा और अच्छी शिक्षा का अभाव आदि किसी भी विशेष जाति या धार्मिक संप्रदाय से संबंधित नहीं हैं, और इन बुराईयों से केवल एक शक्तिशाली एकजुटता का जनसंघर्ष ही उनकी मुक्ति का तरीका है।

The giant is awakening: The ongoing farmers’ agitation has laid the foundation of our unity.

सोते हुए विशाल काय ( giant ) को सोने दो, जब वह जागेगा, तो दुनिया को हिला देगा”

उपरोक्त नेपोलियन का कथन चीन के बारे में था। लेकिन यह अब भारतीय महाद्वीप पर भी लागू होता है।

मैं निराश हो गया था, क्योंकि मैं सोचता था कि क्या भारत कभी भी अपने पिछड़ेपन से छुटकारा पाएगा, इसकी भारी गरीबी, रिकॉर्ड बेरोजगारी, बाल कुपोषण के उच्चस्तर (भारत में हर दूसरा बच्चा कुपोषित है, ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार), आम लोगों के लिए उचित स्वास्थ्य सेवा और अच्छी शिक्षा का लगभग पूरा अभाव, (भारतीय महिलाओं में से आधे रक्ताल्पता(एनीमिया) का शिकार हैं), आदि, से क्या कभी हमें निजात मिलेगा ? सोचता था कि क्या भारत में स्थितियां हमेशा ऐसी ही बनी रहेंगी ?

परन्तु भारत में वर्तमान में चल रहे किसानों के आंदोलन ने मेरी निराशा को समाप्त कर दिया है और पूरी तरह से मेरा दृष्टिकोण बदल दिया है।

एक विकसित देश हेतु अविकसित भारत के परिवर्तन के लिए तेजी से, बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण की आवश्यकता होती है, और केवल इस तरह के परिवर्तन से देश ऊपर उल्लिखित सामाजिक-आर्थिक बुराइयों से निजात पा सकेगा।

आज, भारत दुनिया के सभी अविकसित देशों में सबसे विकसित है। इसमें वह सब है जो इसे संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय देशों, जापान, चीन आदि जैसे उच्च विकसित देश बनने के लिए आवश्यक होता है।

इसमें तकनीकी प्रतिभाओं का एक बड़ा समूह है – हजारों कुशल इंजीनियर, तकनीशियन, वैज्ञानिक आदि (जिनमें से बहुत से लोग कैलिफ़ोर्निया की में सिलिकॉन वैली में कार्यरत हैं, और अमेरिकी, यूरोपीय विश्वविद्यालयों में विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित और चिकित्सा विभाग में प्रोफेसर हैं), और प्राकृतिक संसाधनों के अपार भंडार हैं। तो आसानी से हम 15-20 वर्षों में एक अत्यधिक औद्योगिक देश बन सकते हैं I

परन्तु समस्या ये है हमारी जनता में व्याप्त विभाजन है। भारत कई धर्मों, जातियों, भाषाई, जातीय और क्षेत्रीय समूहों में विभाजित है। ये अब तक एक-दूसरे से लड़ रहे थे और इस तरह हमारे संसाधनों और ऊर्जाओं को बर्बाद कर रहे थे। इसके बजाय हमें ऐतिहासिक परिवर्तन करके भारत को सशक्त, आधुनिक औधोगिक राष्ट्र बनाने के लिए एकजुट होकर जनसंघर्ष करना है। दरअसल हाल के वर्षों में भारत में धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ा है

परन्तु, वर्तमान में चल रहे किसानों के आंदोलन ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है।

अब तक भारत में अधिकांश आंदोलन या तो धर्म आधारित थे, जैसे राम मंदिर आंदोलन, या जाति आधारित जैसे कि जाट, गूजर या दलित आंदोलन।

What is the historical significance of the peasant movement

किसान आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व यह है कि इसने जाति और धर्म की सीमाओं को तोड़ दिया है, और इससे ऊपर उठ गया है। इसने 1947 में आजादी के बाद पहली बार भारतीय लोगों के बीच एकता कायम की है – जो कि पहले केवल एक स्वप्न था I

भारत में 135 से 140 करोड़ लोगों की बड़ी आबादी है, जिनमें से 60-65% किसान हैं जो कृषि पर निर्भर हैं। इस प्रकार हमारे लगभग 70-75 करोड़ लोग कृषि से जुड़े हुए हैं।

यदि यह विशाल समूह एकजुट हो तो यह एक महान बल का निर्माण करेगे, जैसे आंधी या तूफान, जो सभी बाधाओं को दूर कर देगा। दुर्भाग्य से हमारे लोग अब तक जाति और धर्म जैसी सामंती ताकतों से विभाजित थे (वोट बैंक को हासिल करने के लिए हमारे चालाक राजनेताओं द्वारा )। इसलिए हम बहुत कम प्रगति कर सके।

अचानक समुद्र की विशाल लहर की तरह किसान आंदोलन ने जनता में एकता स्थापित कर दी। इसका महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह आंदोलन जाति और धर्म से ऊपर उठ गया है, और न केवल इसने किसानों को एकजुट किया है ( जो हमारी कुल आबादी के 60% से अधिक लोग हैं), बल्कि लगभग सभी भारतीयों जैसे बार काउंसिल ऑफ इंडिया, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, औद्योगिक श्रमिकों आदि ने इसके लिए अपना समर्थन व्यक्त किया है।

और यहां तक कि बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी किसानों के साथ दिल्ली के पास डेरा डाले हुए हैं।

यह सच है कि सभी 70 करोड़ भारतीय किसान दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में इकट्ठा नहीं हुए हैं (ये सम्भवतः हो भी नही सकता), जहां आंदोलन चल रहा है, लेकिन लगभग सभी इसे विभिन्न तरीकों से समर्थन कर रहे हैं। पहले ज्यादातर आंदोलनकारी किसान पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के थे, लेकिन अब राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दक्षिण भारतीय राज्यों आदि में से कुछ उनके साथ हो गए हैं।

किसान संगठन भारत सरकार द्वारा बनाए गए किसानों से संबंधित तीन कानूनों को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं, जो कि किसान संगठनों से परामर्श किए बिना बनाये गए थे, जिनसे उन्हें लगता है कि ये कानून उन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगे और केवल कॉरपोरेट्स को लाभान्वित करेंगे।

परन्तु मेरे अनुसार यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इन कानूनों को निरस्त किया जाएगा या नहीं। बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि किसान आंदोलन ने भारतीय एकता की नींव रखी।

कुछ लोगों ने खालिस्तानियों, पाकिस्तान, चीन, माओवादियों आदि से प्रेरित होकर किसान संघर्ष को चित्रित करने की कोशिश की है, लेकिन इस नकारात्मक प्रचार ने किसी को बेवकूफ नहीं बनाया है।

विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है, लेकिन किसान नेताओं ने उनके समर्थन को स्वीकार करते हुए, उनसे पीछे रहने को कहा है क्योंकि वह जानते हैं राजनीतिकों का निहित स्वार्थ होता है।

भारत में वर्तमान में दो ताकतें काम कर रही हैं, कुछ राजनीतिकों द्वारा उकसाने वाली विभाजनकारी ताकतें, और दूसरी किसान आंदोलन द्वारा वर्तमान में प्रतिनिधित्व की गई एकजुट ताकत।

थोड़े समय में विभाजनकारी ताकतें सफल हो सकती हैं, परन्तु अन्ततोगत्वा एकजुटता की ताकत की विजय होना सुनिश्चित है।

भारतीय लोग अब महसूस कर रहे हैं कि उनकी गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवा और अच्छी शिक्षा का अभाव आदि किसी भी विशेष जाति या धार्मिक संप्रदाय से संबंधित नहीं हैं, और इन बुराईयों से केवल एक शक्तिशाली एकजुटता का जनसंघर्ष ही उनकी मुक्ति का तरीका है।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

अवकाशप्राप्त न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया.

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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