कोरोना से प्रभावित इन समस्याओं के जंजाल से किसान ही बाहर निकाल सकता है

More than 50 bighas of wheat crop burnt to ashes of 36 farmers of village Parsa Hussain of Dumariyaganj area

Only the farmer can get out of these problems affected by Corona

आज के हालात में समझदार आदमी की समझ में आ गया होगा कि कोरोना वायरस के रूप में दुनिया के दूसरे देशों के साथ ही हमारे देश पर भी कितना बड़ा संकट आ गया है। भले ही हमारे देश में दूसरे देशों के बजाय कोरोना के कम मामले मिल रहे हों। भले ही सरकार की ओर से इस पर जल्द नियंत्रण करने के दावे किए जा रहे हों पर जिस तरह से कोरोना वायरस समाज के हर वर्ग को अपने आगोश में लेता जा रहा है, टेस्ट के बढ़ने पर मामले भी बढ़ रहे हैं। इससे स्पष्ट हो चुका है कि यह संकट और गहराएगा (This crisis will deepen)

Can the lockdown be prolonged

निश्चित रूप से लॉक डाउन से इस लड़ाई को लड़ने में काफी मदद मिली है पर क्या लंबे समय तक लॉक डाउन किया जा सकता है (Can it be locked down for a long time?)। उत्तर न में ही आएगा।

स्थिति सामने है। अभी तो लॉक डाउन को एक महीना भी नहीं हुआ है कि लोगों के सामने समस्याओं का अंबार खड़ा हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। भले ही प्रवासी मजदूरों की समस्या इस समय प्रमुखता से देखी जा रही हो पर यह संकट हर वर्ग पर है। यह संकट सबसे अधिक प्रभावित नौकरी पेशा व्यक्ति को कर रहा है।

आज के इस व्यावसायिक दौर में आप बचत की तो बात ही भूल जाइए। छोटे व्यापारी भी इस संकट में भारी दिक्कत में हैं। सरकार कितने बड़े स्तर पर भी इस संकट को संभालने की कोशिश करे पर जब तक जन समुदाय एकजुट होकर इस संकट से नहीं लड़ेगा तब तक इस समस्या से निपटना न केवल मुश्किल है बल्कि असंभव है।

इसमें दो राय नहीं कि विभिन्न शहरों में प्रवासी मजदूर फंसे हुए हैं और इनमें से अधिकतर अपने गांवों को लौटना चाहते हैं। इसमें भी दो राय नहीं कि कम वेतन पाने वाला व्यक्ति भी इन प्रवासी मजदूरों की ही तरह है। इसमें भी दो राय नहीं कि यह संकट जल्द खत्म होने वाला नहीं है। इसका बड़ा कारण यह है कि जहां कोरोना फिर से लौट जा रहा है वहीं अधिक रोजगार देने वाले शहर मुम्बई, नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली प्रदेश में कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। आज से काफी जगहों पर लॉक डाउन में कुछ छूट दी गई है पर इससे कुछ खास होने वाला नहीं है।

How to provide relief to people struggling with various problems along with the epidemic.

ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर इस महामारी के साथ ही विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे लोगों को कैसे राहत मिले। भले ही देश में किसान को दिखावे का महत्व दिया जाता हो पर यह जमीनी हकीकत है कि इस देश में हर विपदा में किसान ने ही संकटमोचक की भूमिका निभाई है। इस विपदा में भी देश को किसान ही संभाल सकता है। गांव, खेत खलियान कोरोना को हराने की कर्मस्थली बन सकते हैं। यदि विभिन्न शहरों में फंसे मजदूरों को उनके गांवों तक पहुंचाने की व्यवस्था सरकार कर दे तो अपनी खाने भर के लिए तो गेंहू की कटाई में ही कमा लेंगे। कम वेतन पाने वाला व्यक्ति भी इस संकट के समय गांवों में ज्यादा राहत महसूस करेगा।

भले ही प्रधानमंत्री ने लॉक डाउन के बाद किसी को नौकरी से न निकालने की अपील की है पर विभिन्न कंपनियों में बड़े स्तर पर छंटनी होनी तय है।

मतलब सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद लोगों का शहरों से गांवों की ओर पलायन करना मजबूरी बनेगा ही। ऐसे में गांवों में स्थिति न बिगड़े कि सरकारों को इसकी व्यवस्था पहले ही करनी होगी।  मतलब अन्नदाता की शरण में जाना ही होगा।

जोत की जमीन कम होने के बावजूद किसान अभी भी देश को पालने की क्षमता रखता है। पर अब उसके लिए सरकार को किसान को विश्वास में लेना होगा। जो अनाप शनाप बजट शहरों पर खर्च किया जाता है। अब उसका बड़ा भाग गांवों पर खर्च करना होगा। सरकार को यह भली भांति समझ लेना चाहिए कि सामाजिक दूरी का सही पालन अब गांवों में ज्यादा हो सकता है। इस लड़ाई में किसान की बड़ी भागीदारी के लिए सबसे पहले तो किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार को उसे आर्थिक मदद करनी होगी। महीने में 500 रुपये से किसान का कुछ नहीं होने वाला है।

CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT, CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
  किसान को कम से कम 5000 रुपये प्रति माह मेहनत भत्ता देना होगा। वैसे भी किसान अतिरिक्त मेहनत तो करता ही है। गांवों में अभी भी आबादी और ग्राम समाज की काफी जमीन है।

सरकारों को इस जमीन पर लघु उद्योग लगाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। सरकारों के इस प्रयास से तिहरा लाभ होगा। एक तो कोरोना लड़ाई में मजबूती मिलेगी, दूसरा ग्रामीणों में आत्मनिर्भर आएगी, तीसरा फिर से गांव गुलजार हो उठेंगे। भाई चारा अलग से बढ़ेगा। इससे शहरों पर पड़ रहा भारी बोझ भी कम होगा।

चरण सिंह राजपूत

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