सोनिया गांधी के नाम खुला पत्र

सोनिया गांधी के नाम खुला पत्र

Open letter to Congress President Sonia Gandhi

कांग्रेस चिंतन शिविर और कांग्रेस का संकट (Congress Chintan Shivir and the crisis of Congress)

कांग्रेस कौन से मुद्दे जनता के बीच लेकर जाएगी, क्या चिंतन शिविर में इस पर कोई विचार किया गया? कांग्रेस के पक्ष में किस तरह माहौल बनाया जाएगा? भाजपा की कमियों पर मौखिक आलोचना का कोई अर्थ नहीं है।… देशबन्धु की संपादिका सर्वमित्रा सुरजन का कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को खुला पत्र

आदरणीय सोनिया गांधी जी,

हम सब यहां देश में कुशलता से नहीं हैं, लेकिन उम्मीद है कि उदयपुर में तीन दिनों के चिंतन शिविर के बाद कांग्रेस स्वस्थ व प्रसन्न होगी। इस चिंतन शिविर से निकलने वाली खबरों और आखिर में लिए जाने वाले निर्णयों का देश उत्सुकता से इंतजार कर रहा था। माहौल ही ऐसा बना दिया गया था कि तीन दिन में कांग्रेस में कोई बड़ा फैसला लिया जाएगा। आमूलचूल परिवर्तन के लिए कदम उठाए जाएंगे। कांग्रेस का कायाकल्प हो जाएगा। जैसे छोटा भीम लड्डू खाकर अपने दुश्मनों से लड़ने की त्वरित शक्ति हासिल कर लेता है, ऐसा ही कोई चमत्कार चिंतन शिविर से कांग्रेस में देखने मिलेगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तीन दिनों तक आपके नेतृत्व में एकजुट हुए 430 नेताओं ने अलग-अलग समूहों में ‘पार्टी को कैसे मज़बूत करें, क्या नया किया जाए’ ऐसे विषयों पर चर्चा की।

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह की चर्चा के लिए अब बहुत देर हो चुकी है। हां, अगर 2024 के चुनावों के लिए आपने यह नवसंकल्प नहीं लिया है, तब तो अलग बात है। लेकिन अगर अगले आम चुनावों में कांग्रेस सत्ता में लौटना चाहती है, तो क्या महज दो साल के वक्त में वह पार्टी की मजबूती और क्या नया किया जाए, ऐसे सवालों पर विचार-विमर्श करने के साथ-साथ अपने जनाधार को बढ़ाने का काम भी कर लेगी, यह विचारणीय है।

सोचने वाली बात यह भी है कि केवल 430 नेता, किस तरह 130 करोड़ की आबादी के प्रतिनिधित्व पर विचार कर सकते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी ने केवल 430 नेताओं को ही चिंतन के लिए क्यों एकत्र किया, यह जिज्ञासा भी बनी हुई है।

बहरहाल, शिविर के समापन पर आपने बताया कि देशव्यापी पदयात्रा निकाली जाएगी। इसमें पार्टी के युवा और बुजुर्ग सभी तरह के नेता शामिल होंगे। कांग्रेस पिछले आठ बरसों से विपक्ष में है। और उससे पहले 10 सालों तक सत्ता में रही। यानी किसी भी तरह राजनैतिक परिदृश्य से बाहर नहीं हुई है। फिर इस तरह की यात्रा निकालने का कोई फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया। बीच-बीच में जरूर कांग्रेस ने विभिन्न मुद्दों पर छोटी-बड़ी यात्राएं निकाली हैं। लेकिन उसमें व्यापक तौर पर कांग्रेसियों की दिलचस्पी ही नज़र नहीं आई, आम जनता की बात तो छोड़ ही दीजिए। और मीडिया के एक बड़े वर्ग ने तो कांग्रेस से इस वक्त जो अस्पृश्यता वाला व्यवहार बना रखा है, उससे भी आप वाकिफ होंगी ही।

यह हाल तब है जब यूपीए के दस सालों में मीडिया के इसी तबके ने कांग्रेस के विरोध में माहौल बनाने का काम किया और आपकी पार्टी के कुछ कद्दावर नेता उनकी हौसला अफज़ाई करते दिखे। इसलिए इस देशव्यापी यात्रा में मीडिया के जरिए कांग्रेस का कोई प्रचार-प्रसार होगा, इस मुगालते में न रहना ही बेहतर होगा।

वैसे पदयात्रा या चाहे जिस माध्यम से देशव्यापी यात्रा होगी, उसमें कौन से मुद्दे जनता के बीच कांग्रेस लेकर जाएगी, क्या इस पर कोई विचार किया गया है। किस तरह कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया जाएगा। कांग्रेस आम जनता के बेहतर भविष्य के लिए क्या कोई रोडमैप पेश कर पाएगी।

कांग्रेस के बड़े नेता लगभग हर रोज भाजपा सरकार की योजनाओं और फैसलों की खामियों को जनता के बीच पेश करते हैं। यह काम अक्सर सोशल मीडिया मंचों से होता है या फिर टीवी चैनल की बहसों में, जहां कांग्रेस के एक प्रवक्ता के मुकाबले टीवी एंकर समेत कम से कम तीन लोग भाजपा के समर्थन वाले होते हैं। इसलिए टीवी की बहस का कोई नतीजा कांग्रेस के पक्ष में नहीं होता।

सोशल मीडिया पर भी भाजपा की आईटी सेना कांग्रेस समेत बाकी सारे दलों से तगड़ी है, क्योंकि उसने इस पर बहुत साल पहले ही काम करना शुरु कर दिया था। इसलिए भाजपा की खामियों पर जुबानी आलोचना का कोई खास अर्थ नहीं रह गया है। सड़क पर इस आलोचना के साथ कोई दमदार आंदोलन खड़ा करने के लिए इस वक्त कांग्रेसी तैयार नहीं दिखते हैं। एकाध छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन भाजपा जैसी ताकतवर पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं डालेंगे, ये बात अब तक कांग्रेस नेताओं को समझ आ जाना चाहिए। मगर कांग्रेस के साथ इस वक्त सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वह हकीकत को पूरे होशोहवास में अनदेखा कर रही है और एक खुशनुमा भ्रम में जी रही है कि उसे आह्वान पर जनता पहले की तरह उसके साथ खड़ी हो जाएगी।

लेकिन कांग्रेस को इस कड़वे सच का सामना करना पड़ेगा कि अब देश की राजनीति ही नहीं, सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्था के तौर-तरीके भी पूरी तरह बदल चुके हैं। धर्म, राजनीति, अर्थनीति, सब कुछ इस तरह गड्ड-मड्ड कर दिए गए हैं कि उनके ओर-छोर ढूंढना कठिन हो गया है। केवल भाजपा और उसे आगे बढ़ाने वाली राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शक्तियां जानती हैं कि कब किस सिरे को निकालना है और किसे कितना खींचना है। इसलिए अब पहले की तरह पंचवर्षीय योजनाएं नहीं चलती हैं। वैसे भी अब योजना आयोग इतिहास में दफन कर दिया गया है। अब भाजपा बातें करती है अगले 50 सालों की और इस तरह वह जनता को यकीन दिला चुकी है कि उसका विकल्प कोई नहीं है।

पचास सालों की बात करने वाली भाजपा लगभग हर महीने कोई न कोई नया आर्थिक फैसला इस तरह लेती है कि जनता अपने अच्छे दिनों के भ्रम में पड़ जाती है, उद्योगपतियों को मुनाफा होता है, और इस बीच कोई नया धार्मिक विवाद खड़ा हो जाता है, ताकि जनता फिर उसमें उलझ जाए। इस स्थिति में क्या कांग्रेस भाजपा की आलोचना करके ही सत्ता पर अपनी दावेदारी पेश कर पाएगी? जवाब है- नहीं। अगर कांग्रेस सत्ता में लौटना चाहती है कि तो उसे अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति का अहसास, रणनीतियों का अंदाज और अगली चालों का अनुमान लगाना होगा। ये काम एक-दो चिंतन शिविरों से नहीं हो सकता। इसके लिए हर रोज 24 घंटे कांग्रेस के नेताओं को सतर्क रहकर काम करना होगा। एक-दूसरे से संवाद बनाए रखना होगा और जनता के बीच अपनी उपस्थिति हर हाल में दर्ज करानी होगी। तभी लोकसभा की सीटों में थोड़ा इजाफा हो सकता है और कांग्रेस जब यह कमाल दिखा पाएगी, तब जाकर भाजपा की सत्ता को चुनौती दे पाएगी।

सोनिया जी, आपने समापन सत्र के अपने भाषण में हम वापस आएंगे, जैसा जोशीला नारा दिया। अब इस नारे का वजन तौलने की बारी है। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को इस पड़ताल में जुट जाना चाहिए कि देश में कितने लोग इस नारे पर यकीन करने तैयार हैं। जो तैयार हैं, उन्हें साथ में जोड़े रखना और जो नारे को तवज्जो नहीं दे रहे, उन्हें इस बात का यकीन दिलाना कि हम वापस आ रहे हैं, यह दोनों काफी चुनौती भरे काम हैं। मगर इसे किए बगैर कांग्रेस की नैया पार नहीं लगेगी। और इस कठिन काम को करने के लिए सबसे पहले कांग्रेस के छोटे-बड़े नेताओं को आपस में संवाद की जरूरत है। अभी तो कांग्रेस आंतरिक कलह से ही नहीं उबर पा रही है।

राहुल जी ने कहा कि कांग्रेस का डीएनए सबको अपनी बात रखने की इजाज़त देता है। बात तो सही है, बल्कि अभी तो ऐसा नज़र आ रहा है कि कांग्रेस के इस डीएनए का फायदा उठाते हुए उसके नेता पूरी मनमानी करते हैं। और जब ऐसे नेता कांग्रेस से अलग होते हैं, तो इस छूट वाले डीएनए के नुकसान दिखाई देते हैं। हार्दिक पटेल का उदाहरण एकदम ताजा है। पिछले कई दिनों से हार्दिक रूठा-रूठी के तेवर पार्टी को दिखा रहे थे। मगर कांग्रेस ने समय रहते कांटा नहीं निकाला और अब वही कांटा उसे चुभाया जा रहा है। हार्दिक पटेल ने जिस तरह दिल्ली के नेता को चिकन सैंडविच खिलाने पर ध्यान वाली बात कही है, वह साफ तौर पर कांग्रेस को बदनाम करने की कोशिश है। खाने-पीने पर ध्यान बीजेपी के नेताओं का भी रहता होगा, और इसमें कुछ आपत्तिजनक नहीं है।

लेकिन बीजेपी नेताओं की इन बातों को आपत्तिजनक तरीके से जनता के बीच क्या प्रस्तुत किया जाता है। जाहिर है, यह सब कांग्रेस की छवि खराब करने की कोशिश है। इस कोशिश के पीछे किसका हाथ होगा, यह समझना भी कठिन नहीं है। लेकिन कांग्रेस के लिए शायद यह सब समझना कठिन है, तभी तो पिछले कुछ अरसे में उसके कई ऐसे नेता अलग हो चुके हैं, जो गांधी परिवार के करीबी या प्रिय रहे हैं। ये नेता न केवल कांग्रेस छोड़ते हैं, बल्कि बड़ी आसानी से उसकी छवि पर प्रहार कर जाते हैं और गांधी परिवार अपनी शराफत का खामियाजा भुगतता है।

दो लोकसभा चुनाव हार चुकी और महज दो राज्यों में सिमटी कांग्रेस के पास अब खोने के लिए खास कुछ नहीं है। ऐसे में नए सिरे से जनाधार हासिल करने के लिए कांग्रेस को करो या मरो वाली नीति पर चलना होगा। लेकिन यह काम एकाध शिविर, चंद बैठकों और कुछेक नेताओं के भरोसे नहीं होगा। देश भर में कांग्रेस से जुड़े लोगों को फिर से एकजुट करना होगा। भारत तो पहले ही जुड़ा हुआ है, इसलिए भारत जोड़ो की जगह कांग्रेस भारत को मजबूत बनाने जैसी किसी मुहिम में जुटे और इसके लिए जनता को अपने साथ ले। उसे बताए कि किस तरह महंगाई, सांप्रदायिक नफरत, अंधविश्वास, अशिक्षा, हर तरह का भेदभाव, कुपोषण, किसानों, महिलाओं, मजदूरों, आदिवासियों की समस्याएं इन सब को सुधारने में कांग्रेस क्या कारगर कदम उठाएगी। कांग्रेस को अब यह भी सोचना चाहिए कि यूपीए-2 के बाद वह किस तरह यूपीए-3 के लिए नया गठबंधन खड़ा करेगी। जो साथी रूठे हैं, उन्हें कैसे मनाएगी। जब इन कामों को प्राथमिकता के तौर पर कांग्रेस पूरा कर लेगी, तब जाकर सोनिया जी, आपका दिया नारा सच होगा।

कांग्रेस पार्टी की कुशलता की कामनाओं के साथ,

एक आम नागरिक

लेखिका देशबन्धु की संपादक हैं।

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