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सुधा सिंह के 25 साल और वे

सुधा सिंह के 25 साल और वे

सामान्य तौर पर किसी भी शिक्षक के जीवन में 25 साल तक एमए और उसके ऊपर की कक्षाएं नियमित पढ़ाने और नियमित शोध करने और शोध निर्देशन के काम में निरंतरता एक विरल चीज है।

हमारे हिंदी में विश्वविद्यालय शिक्षक शोध निर्देशन तो खूब करते हैं लेकिन स्वयं शोधकार्य कम करते हैं। हिंदी विभाग में ऐसे शिक्षक भरे पड़े हैं। अधिकांश शिक्षकों का स्वयं रिसर्च न करना आम बात है। बमुश्किल एक फीसदी विश्वविद्यालय शिक्षक हैं जो आलोचना के क्षेत्र में नए नजरिए से निरंतर लिख रहे हैं।

कैसी है विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक की अकादमिक दुनिया

विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक की अकादमिक दुनिया अब ज्ञान से नहीं तिकड़म और सत्ता के साथ संपर्क-संबंध से पहचानी जाती है। ऐसी स्थिति में सुधा सिंह ने अपने विश्वविद्यालय में अध्यापन के पच्चीस साल पूरे किए हैं। इस दौरान वे लगातार नए-नए विषयों पर बोलती और लिखती रही हैं, अनेक नए विषयों पर उन्होंने मेरे साथ काम किया है, किताबें लिखी हैं। इसके अलावा उन्होंने सबसे मूल्यवान रिसर्च की है स्त्री भाषा और हिंदी की स्त्री लेखिकाओं पर। 

ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ समस्त भारतीय भाषाओं में अकेली किताब है। यहां तक कि भारत के अंग्रेजीदा स्त्रीवादियों ने भी स्त्रीभाषा पर वैसा काम नहीं किया है। इन लोगों ने फेमिनिज्म पर बहुत काम किया है। लेकिन किसी भी अंग्रेजीदा फेमिनिस्ट ने स्त्री भाषा पर काम नहीं किया है। ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ विलक्षण और शानदार किताब है। उस किताब के आने के बाद हिंदी में स्त्रीभाषा के सवालों पर, विभिन्न लेखक- लेखिकाओं की भाषा के बारे में स्त्रीवादी मूल्यांकन का सिलसिला शुरु हुआ।

मुझे याद पड़ रहा है सुधा सिंह जब विश्व भारती में मीडिया पढ़ाती थीं तो उनका विशेष आग्रह था कि जनमाध्यम सैद्धांतिकी पर हिंदी में किताब आए। उनका प्रस्ताव था, उन्होंने ही उसकी रुपरेखा बनायी और हम दोनों ने उस पर काम किया और उस किताब ने हिंदी को पहलीबार मीडिया थ्योरी से परिचित कराया। इसके बाद तो सिलसिला चल निकला।

मूल बात यह कि विषय पर मेहनत करने, उसके बारे में आलोचना विकसित करने की सुधा सिंह में विलक्षण क्षमता है। उनकी इस क्षमता की स्वयं रामविलास शर्मा और नामवरजी ने तारीफ की है।

कई बार यह भी हुआ कि दूरदर्शन पर सुधाजी और नामवरजी की एक ही साथ रिकॉर्डिंग थी। एक बार यह हुआ नामवरजी की रिकॉर्डिंग पहले हो गई उसके बाद उनको पता चला कि सुधा भी वहां आने वाली हैं। वे इंतजार में बैठे रहे और कार्यक्रम इंचार्ज से कहा सुधा से बातें करके जाऊंगा। सुधा जब पहुँची तो जमकर बातें की और सुधा के द्वारा उनकी आलोचना पर प्रकाशित आलेख की जमकर प्रशंसा की और कहा कि आपने मेरी सही बिन्दुओं पर आलोचना की है।

हिंदी विभागों में जिस तरह का गैर-अकादमिक माहौल है और सिफारिश के आधार पर नौकरियां लेकर आने वालों की बाढ़ आई हुई है उसमें सुधा ने अब तक जितनी नौकरियां हासिल कीं वे अपनी मेधा, ज्ञानरिसर्च और डिग्री के बल पर हासिल कीं। ईमानदारी से जीना और निरंतर पठन-पाठन-अनुसंधान में लगे रहना स्वयं एक बेहतर अकादमिक मूल्य है। इस मूल्य को उन्होंने बड़ी मेहनत और कुर्बानियों से हासिल किया है।

बंगाल में जिन दिनों वाम का सिक्का चलता था, सुधा ने अपनी मेहनत से वाम के सारे कुप्रचार और सत्ता के दवाब के बावजूद तीन नौकरियां हासिल कीं। मजेदार बात यह थी कि माकपा के शिक्षक नेता और मेरे विभाग के प्रोफेसरगण जो सुधा को एकदम नापसंद करते थे वे चैलेंज देकर जाते थे कि हम सुधा की नौकरी नहीं लगने देंगे। उन सबका मान-मर्दन करने में सुधा को सफलता मिली। यहां तक कि दिल्ली विश्वविद्यालय में नौकरी भी उन्होंने राजनीतिक आकाओं के मंसूबों पर पानी फेरकर हासिल की। इसका प्रधान कारण है सुधा की अकादमिक निष्ठा और तैयारी। अकादमिक तैयारी करके काम करने में वह बेजोड़ है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय से ऑनर्स और एमए हिंदी में स्वर्ण पदक हासिल करके उसने कीर्तिमान बनाया है। सीयू में आज तक कोई विद्यार्थी दो स्वर्ण पदक हासिल नहीं कर पाया। सुधा ने रिकॉर्ड समय में पीएचडी जमा की, उसने मात्र दो साल आठ महीने में पीएचडी डिग्री हासिल की। जबकि उनदिनों कलकत्ता विद्यालय में पीएचडी का एक परीक्षक विदेश से होता था। उसने दो साल खत्म होते ही पीएचडी जमा की और मात्र आठ महीनों में उसका परिणाम आ गया।इतने कम समय में किसी को भी कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी उपाधि नहीं मिली। वह कलकत्ता वि.वि. के हिंदी विभाग की पहली छात्रा है जिसे कलकत्ता विश्वविद्यालय के बाहर विश्वविद्यालय में हिंदी लेक्चरर पद पर नियुक्ति मिली। वहीं दूसरी ओर उसने समयबद्ध ढ़ंग से अकादमिक तरक्की हासिल की। लेक्चरर के रूप में विश्वभारती में पांच साल पढ़ाने के बाद ही उसे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के रुप में -मीडिया, जर्नलिज्म और ट्रांसलेशन के पद पर नियुक्ति मिली। यह नियुक्ति सुधाजी ने अनेक दिग्गजों को आईना दिखाते हुए हासिल की। उस समय उनकी उम्र मात्र 32 साल थी। इतनी कम उम्र में एसोसिएट प्रोफेसर बनना गर्व की बात है और 39वें वर्ष में वे दिल्ली विश्वविद्यालय में मीडिया, जर्नलिजम और ट्रांसलेशन की प्रोफेसर बनाई गईं। इस दौरान वे दो साल तक तुर्कमेनिस्तान में स्थित विश्व भाषा संस्थान में पहली बार स्थापित हिंदी विभाग के प्रोफेसर पद के लिए चुनी गईं और वहां रहते हुए उन्होंने तुर्कमेन भाषा पर महत्वपूर्ण पहली किताब लिखी।

इन सब बातों को लिखने का आशय यह है कि अकादमिक मेहनत, ईमानदार अध्यापन और अकादमिक निष्ठा को यदि केन्द्र में रखा जाए तो सफलता मिलना लाजमी है। इन दिनों सुधाजी एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं और उसके कारण उन्होंने तय किया है कम से कम दो साल तक वे किसी भी सेमिनार-संगोष्ठी में भाग नहीं ले पाएंगी। उन्होंने जो प्रोजेक्ट हाथ में लिया है हम चाहते हैं वह पूरा हो उससे हिंदी जगत को बहुत लाभ पहुँचेगा।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

Jagadishwar Chaturvedi

ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ

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