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बिन बरसात कैसे बचेंगे गांव? कैसे बचेंगे किसान?

 ग्लेशियर पिघलेंगे, नदियां नहीं निकलेंगी तो इंसान कैसे जिएंगे?

पलाश विश्वास

आज 13 जुलाई है। न बादल हैं न बरसात।

खेत बंजर हो रहा है। पानी नहीं है तो कैसे लगेगा धान? बिजली, खाद, उर्वरक, कीटनाशक पर बेतहाशा खर्च करने के बाद जो धान लगा है, वह भी सूखने लगा है।

बरसात नहीं हो रही बरसात के मौसम में। अंधाधुंध बिजली कटौती है। डीजल आग है। नदियों में पानी नहीं है। टरबाइन खामोश हैं। बिजली कैसे बनेगी?

टिहरी बांध और दूसरे बड़े बांधों से पहाड़ और पर्यावरण का सत्यनाश करके जो ऊर्जा प्रदेश बना, उसमें इस वक्त अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं है।

बादल बरस नहीं रहे, बादल फट रहे हैं।

दिल्ली जगमग जगमग है और पहाड़ मरुस्थल है। जिसके हिस्से में सिर्फ बेरोज़गारी है या फिर महामारी या आपदाएं। 21 साल में बंदर, सुअर और मुख्यमंत्री की संख्या में इजाफा है।

अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ अब उजाड़ है। तराई और भाबर के किसानों के लिए मौत है।

हमारे बचपन में 50 से लेकर 70 के दशक में 20 जून तक मानसून आकर पहाड़ों से टकराता था और जुलाई में  मूसलाधार बारिश। तराई भाबर में घने जंगल थे। असंख्य नदियां पानी से लबालब थीं। नहरें थीं। तालाब, पोखर और कुएँ थे। अब कुछ नहीं बचा बड़े बांधों के सिवाय।

तब बिजली नहीं थी। लेकिन खेतों में पानी था। बरसात में लहलहाता धान था। अब पहाड़ों में भी जंगल नहीं बचा है।

बिजली होकर भी नहीं है।

सड़कें होकर भी नहीं हैं।

अस्पताल होकर भी अस्पताल नहीं है।

स्कूल कालेज बहुत हैं लेकिन पढ़ाई नहीं होती। सिर्फ सर्टिफिकेट बनाये जाते हैं जो खरीदे और बेचे जाते हैं।

विधानसभा है और नहीं है।

सरकार है और नहीं है।

जनता ज़िंदा है या मुर्दा, नहीं मालूम।

सारा उत्तराखण्ड दावानल के हवाले हैं और ज़िंदा जल रहे हैं इंसान।

हमारे गांव बसन्तीपुर की आज शाम की तस्वीरों से अंदाजा लगाएं कि कितने अच्छे दिन आ गए हैं।

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