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50 लाख साल की बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि हिंसा, घृणा और पितृसत्ता है?

पितृसत्ता रहेगी, नफरत और मार्केट की सियासत की शिकार स्त्री होगी, जाति के नाम सामूहिक बलात्कार होंगे, तो फूलनदेवी भी होगी

पलाश विश्वास

अन्याय और अत्याचार की दुःखद परिणति यही है। जाति हिंसा किसी महायुद्ध से कम नहीं है।

अंध जातिवाद से पीड़ित मनुष्यता का प्रत्युत्तर भी हिंसा है। यह होती रहेगी। इसका अंत नहीं, क्रमबद्ध है यह।

आजादी के बाद इस महादेश में धर्म, नस्ल, भाषा, क्षेत्र और जाति की अस्मिता से जितनी हिंसा हुई है, जितने निर्दोष लोग मारे गए, वैसा दोनों विश्वयुद्धों को मिलाकर भी नहीं हुआ।

वहां तो फिर भी फौजें एक दूसरे के खिलाफ लड़ रही थीं।

11 वी सदी से लेकर 15 वीं सदी तक के धर्मयुद्धों और बीसवीं सदी के सांस्कृतिक युद्ध से भी भयानक परिदृश्य से हम गुज़र जाते हैं। इसी भारत वर्ष में। जब घर से निकलना भी मौत को दावत दी सकता है। घर में भी सामूहिक बलात्कार हो सकता है।

इसी परिदृश्य में सामने आता है, एक पीड़ित महिला का चेहरा जो जाति के नाम सामूहिक बलात्कार को जायज मानने वाली भीड़ से कुछेक को मौत के घाट उतारकर निजी बदला चुका देती है।

जाति जब तक रहेगी, गैर बराबरी, अन्याय, उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार की व्यवस्था जब तक स्त्री देह को उपनिवेश और युद्ध का मैदान बनाती रहेगी, फिर फूलन देवी का जन्म होगा।

यह कानून व्यवस्था का मामला उतना नहीं है, जितना मनुष्यता और सभ्यता के विकास का मामला है।

मनुष्यता कितनी आगे बढ़ी है?

सभ्यता का कितना बिकास हुआ है?

50 लाख साल बाद भी आदिम मनुष्यों की तरह स्त्री को आखेट का सामान माना जाता है?

50 लाख साल बूढ़ी मनुष्यता की कुल उपलब्धि घृणा और हिंसा की पितृसत्ता है?

हम इक्कीसवीं सदी में हैं। हम अखण्ड भारत के खंडित हिस्सों में हैं। अर्थव्यवस्था बदल गयी है। स्थानीय रोजगार कहीं नहीं है। रोजगार के लिए विस्थापन अनिवार्य है।

हम अपने हिस्से का देश लेकर स्थानांतरण नहीं हो सकते। दूसरे के हिस्से के देश में विस्थापन की वजह से ही विविधता बहुलता का यह लोकतंत्र है।

किसी भी नस्ल, जाति, धर्म, भाषा का विशुद्ध भूगोल नहीं है आज। न विशुद्ध रक्त की तरह स्वतंत्र सम्प्रभु अर्थव्यवस्था है।

अस्मिता की राजनीति से देश का बंटवारा हुआ, जिसके शिकार हम लोग उसकी यातना पीढ़ी दर पीढ़ी भुगत रहे हैं। आज भी कोई भी किसी को यह फरमान जारी कर देता है किसी शहंशाह की तरह, यह देश तुम्हारा नहीं है। यह जमीन तुम्हारी नहीं है।

फिर जाति, धर्म, नस्ल, भाषा के नाम पर हिंसा और खून का सैलाब, फिर स्त्रियों से सामूहिक बलात्कार।

देश के हर हिस्से का यह हाल है।

नफरत और हिंसा की सियासत निरंकुश है।

ऐसे में फूलन देवी के अवतार आते रहेंगे।

इस नफरत, हिंसा और स्त्री विरोधी पितृसत्ता से क्या हमें कभी मुक्ति मिलेगी?

क्या हम मुक्ति चहते हैं?

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