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यूपी में ब्राह्मण चुनावी छंद के मायने

 How to break into BJP’s base?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 (Uttar Pradesh assembly elections 2022) का बिगुल बज चुका है। इस बार के चुनाव में कई अहम मुद्दे केन्द्र में होंगे, लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा है भाजपा के जनाधार में सेंधमारी कैसे की जाय ?

प्रत्येक पार्टी अपने -अपने तरीक़े से भाजपा के जनाधार को तोड़ने की मुहिम में लगी हुई है। दूसरी ओर भाजपा -आरएसएस ने अपनी पूरी शक्ति अपने जनाधार को बचाने में झोंकने का फ़ैसला किया है। भाजपा कई दशकों से हिन्दू वोट बैंक बनाने में लगी है, इसमें उसे एक हद तक सफलता भी मिली है। एकमुश्त भाव से भाजपा को हिन्दू वोट दें, यह कोशिश होती रही है। इसमें उनको 2014, 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी विधानसभा और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक हद तक सफलता भी मिली है।

भारत के विभिन्न राज्यों में हिन्दू वोट बैंक बनाने और हिन्दू तुष्टिकरण के आधार पर हिंदू बहुसंख्यकवाद के आधार पर हिन्दुओं को गोलबंद करने और एक हद तक हिन्दू वोट बैंक स्थिर करने में उसे सफलता मिली है। यह एक तरह से वोट बैंक राजनीति का नया पैराडाइम है। इसके ज़रिए आरएसएस-भाजपा समाज को जाति समूहों में बांटने, उनमें अंतर्विरोध पैदा करने और उनको हिन्दुत्व के नाम पर एकजुट करने में सफल रही है। उसने विभिन्न जाति समूहों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम तय करके हिन्दू वोट बैंक विकसित किया है। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसे सपा, बसपा,कांग्रेस आदि अपने-अपने तरीक़ों और राजनीतिक नारों और मिथकीय प्रतीकों के ज़रिए चुनौती देने की योजना बना रहे हैं।

इस दिशा में पहल बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा ने की है। उसने अपने अब तक के घोषित दलित एजेंडे को गौण बनाकर सबसे पहले ब्राह्मणों को सम्बोधित करने और ब्राह्मणों का जन समर्थन हासिल करने के लिए यूपी में छह ब्राह्मण सम्मेलन करने का फ़ैसला किया है। इसकी शुरुआत में पहला ब्राह्मण सम्मेलन अयोध्या में 23 जुलाई को किया गया। इस तरह के छह ब्राह्मण सम्मेलन आगामी 29 जुलाई तक होंगे।इसी तरह समाजवादी पार्टी ने 15 अगस्त को ब्राह्मण सम्मेलन करने का फ़ैसला किया है।

भाजपा के बाद यूपी में इन दोनों दलों का जनाधार सबसे बड़ा है। विपक्ष की यदि सरकार बनेगी तो उसमें इन दोनों दलों की केन्द्रीय भूमिका होगी। कांग्रेस पार्टी चौथे नम्बर पर है। ब्राह्मण सम्मेलन के प्रसंग में प्रमुख सवाल यह है कि क्या जाति सम्मेलन, धर्म सम्मेलन या संत-महंत सम्मेलनों से यूपी की जनता की आर्थिक-सांस्कृतिक तरक़्क़ी होगी ? क्या भाजपा को एकजुट विपक्षी मोर्चे के बिना हराना संभव है ? क्या बसपा या सपा अकेले चुनाव लड़कर भाजपा को हरा सकते हैं ?

यूपी को हिंदू वोट बैंक की राजनीति की दलदल से निकालने का जो भी पार्टी सबसे बड़ा मोर्चा बनाएगी, उसके सरकार बनाने की संभावनाएँ सबसे अधिक हैं। कायदे से इस मामले सपा-कांग्रेस को मिलकर पहल करनी चाहिए और व्यापक लोकतांत्रिक कार्यक्रम के आधार पर नए लोकतांत्रिक मोर्चे का गठन करना चाहिए। इसमें यूपी के विभिन्न अंचलों में सक्रिय छोटे-छोटे दलों, वामदलों और लोकदल को ख़ासतौर पर जोड़ने की ज़रूरत है। इससे भी बड़ी बात यह कि यूपी को बड़े विजन की ज़रूरत है। इस विजन के निर्माण के लिए विभिन्न वर्गों और पेशेवर समूहों के बेहतरीन लोगों को एकत्रित करके एक कार्यबल बनाया जाए जो यूपी का विजन दस्तावेज तैयार करे और उसके आधार पर बृहत्तर लोकतांत्रिक कार्यक्रम और प्रचार अभियान संगठित किया जाय।

ब्राह्मण सम्मेलन की राजनीति – Politics of Brahmin conference

बहुजन समाज पार्टी का मानना है यूपी में दलितों के तेईस प्रतिशत और ब्राह्मणों के तेरह प्रतिशत वोट यदि एक साथ मिलकर खड़े हो जाएँ यानी वे वोट बसपा को मिल जाएँ तो वह सरकार बना लेगी। इसके लिए वे एक पुराना नारा नए सिरे से दे रहे हैं, नारा है ‘हाथी नहीं गणेश है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश है।’

याद कीजिए उस नारे को जो कांशीराम ने दिया था, उनका नारा था ‘तिलक, तराजू और तलवार। इनको मारो जूते चार।’ उन्होंने दलितों को केन्द्र में रखकर सोचने की बात कही थी। अब मायावती दलितों को छोड़कर सवर्ण ज़ाति की अस्मिता की राजनीति कर रही हैं। यह नकारात्मक अस्मिता राजनीति है। राम मंदिर बनाओ, हिंदू एजेंडे के आधार हिंदुओं को एकजुट करो, ये सब नकारात्मक अस्मिता राजनीति है। इसे काउंटर करने के लिए बसपा अपने सवर्णवादी एजेंडे को जनप्रिय बनाने के लिए 23-29जुलाई तक छह ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है। इस कड़ी में पहला सम्मेलन अयोध्या में किया गया और वहाँ जयश्री राम के नारे लगाते गए। ब्राह्मण एकता ज़िंदाबाद के नारे लगाए गए। राम मंदिर बनाने का संकल्प व्यक्त किया गया।

बसपा का कहना है भाजपा के शासन में 400 से अधिक ब्राह्मणों की एनकाउंटर करके हत्या की गई। ब्राह्मण अत्यंत ग़रीबी में हैं। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने आगामी 15 अगस्त को ब्राह्मण सम्मेलन करने का फ़ैसला किया है। दूसरी ओर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए ज़तिन प्रसाद ने ‘ब्राह्मण चेतना परिषद’ का गठन किया है और भाजपा ने उनको ब्राह्मण जुटाओ आंदोलन में लगा दिया है। इसके अलावा समूचा आरएसएस-भाजपा तंत्र हिन्दुओं को एकजुट करने की नकारात्मक राजनीति में तेज़ी से सक्रिय हो गया है, लगातार मुसलिम विद्वेष फैलाने वाले बयान जारी किए जा रहे हैं।

यूपी की राजनीतिक हक़ीक़त यह है कि वहाँ 2007 में बसपा को 207सीटें मिली थीं। उनमें 41 ब्राह्मण विधायक जीते थे। उसमें सपा के 11, कांग्रेस के 2 और भाजपा के 3ब्राह्मण विधायक जीते थे। इसी तरह 2017 में कुल 56 ब्राह्मण विधायक जीतकर आए इनमें 46 भाजपा, 3 बसपा, 3सपा, और 1 कांग्रेस का जीता था।

दिलचस्प है बसपा ने ब्राह्मण वोट बैंक के लिए राममंदिर बनाने का संकल्प व्यक्त किया है वहीं सपा ने परशुराम जयंती मनाने, परशुराम की विशाल मूर्ति स्थापित करने का संकल्प व्यक्त किया है। यानी ब्राह्मण वोट बैंक के लिए मिथकीय चरित्रों का दोनों इस्तेमाल कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है भाजपा-कांग्रेस पहले से ही राममंदिर बनाने का संकल्प व्यक्त कर चुके हैं। भाजपा ने इसके लिए आंदोलन किया तो राजीव गांधी ने राम मंदिर का शिलान्यास ही कर दिया। जाहिर है भाजपा को आंदोलन करने के कारण हिन्दू बैंक निर्मित करने में मदद मिली। मात्र शिलान्यास या प्रतीक राजनीति करने से हिंदू वोट बैंक में सेंधमारी संभव नहीं है। आज भी मिथकीय प्रतीकों के ज़रिए हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाना संभव नहीं है।

राम मंदिर आंदोलन के नाम पर आरएसएस-भाजपा ने नकारात्मक अस्मिता राजनीति का इस्तेमाल करके लोकतंत्र में हिन्दू बहुसंख्यकवादी राजनीति का माहौल बनाया है। और उसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर तक़रीबन 30प्रतिशत वोट एकजुट किए हैं। उसने निरंतर हिंदू वोट बैंक राजनीति के नारों और एक्शन के ज़रिए नकारात्मक अस्मिता राजनीति को पुख़्ता बनाया है और दलित और स्त्री अस्मिता की राजनीति के सकारात्मक एजेंडे को ध्वस्त किया है। लोकतांत्रिक राजनीति को क्षति पहुँचायी है।

सवाल यह है यूपी को हिंदुत्ववादी और हिंदू वोट बैंक की नकारात्मक अस्मिता राजनीति से कैसे बाहर निकाला जाय ?

इसके लिए अस्मिता की राजनीति और नारे मदद नहीं करेंगे। बल्कि सकारात्मक लोकतांत्रिक बड़े विज़न की ज़रूरत है। यूपी में शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध, रोजगार, कानून और व्यवस्था, किसान-मजदूरों के सुरक्षा के ठोस उपायों से युक्त कार्यक्रम की जरुरत है। आम जनता में सकारात्मक लोकतांत्रिक भावबोध पैदा करने की जरुरत है। इसके लिए पहली चुनौती है आम जनता को आरएसएस के हिन्दुत्ववादी नकारात्मक वैचारिक एजेंडे की कैद से कैसे मुक्त किया जाय। यह विचारधारात्मक काम है, इसके लिए एक तरफ़ व्यवहारवादी राजनीति एक्शन प्लान चाहिए, दूसरी ओर हिंदुत्व की नकारात्मक राजनीति से मुक्त करने के लिए व्यापक लोकतांत्रिक वैचारिक मुहिम के अनेक कार्यक्रम चाहिए।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

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