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संसद का काम, संसद का चलना!

 पत्रकारिता की चालू भाषा में कहें तो संसद का पूरा मानसून सत्र (full monsoon session of parliament) हंगामे की ही भेंट चढ़ गया। पेगासस जासूसी कांड समेत विभिन्न मुद्दों पर प्राथमिकता देकर तथा विधिवत चर्चा कराए जाने की कमोबेश एकजुट विपक्ष की मांग और सत्तापक्ष के इस मांग से इंकार किए जाने के चलते, मानसून सत्र के पहले दो सप्ताह संसद में सामान्य स्थिति में काम के इंतजार में ही निकल गए। बहरहाल, इसके बाद भी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बना गतिरोध खत्म होने और आखिरी दो-ढ़ाई हफ्तों में संसद के कमोबेश सामान्य तरीके से काम करने की कोई उम्मीद थी भी, तो मंगलवार 3 अगस्त को संसद की बैठक के शुरू होने से पहले ही खत्म हो गयी।

इस रोज, एक ओर राहुल गांधी द्वारा बुलायी गयी नाश्ता बैठक से, 15 पार्टियों के नेताओं के साथ अनेक विपक्षी सांसद, विशेष रूप से तेल के लगातार बढ़ते दामों के मुद्दे पर एकजुट प्रदर्शन करते हुए, साइकिलों पर संसद पहुंचे। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ताधारी पार्टी के संसदीय दल की बैठक में, विपक्ष को संसद न चलने देने का दोषी तो ठहराया ही, उसके ऐसा करने को ‘संविधान के विरुद्ध, संसद के विरुद्ध, लोकतंत्र के विरुद्ध और जनता के विरुद्ध’ भी करार दे दिया! यह टकराव के और बढऩे तथा गतिरोध के टूटने की संभावनाओं के द्वार बंद होने का ही संकेतक है।

         इस संदर्भ में इसका जिक्र करना अप्रासांगिक नहीं है कि वरिष्ठ भाजपा नेता और मोदी सरकार में एक हद तक अपनी स्वतंत्र हैसियत बनाए रहे वरिष्ठ मंत्री, राजनाथ सिंह इसके एक रोज पहले तक, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच के गतिरोध को तोडऩे का प्रयास भी कर रहे थे। विपक्ष के भी बड़े हिस्से का रुख उनके प्रयास के प्रति सकारात्मक था। लेकिन, भाजपा के मोदी-शाह के नेतृत्व ने, समाधान के लिए कोई भी पेशकश करने के मामले में उनके हाथ ही बांध दिए। इस तरह, विपक्ष की एक नहीं सुनने और खासतौर पर पेगासस कांड पर चर्चा तक करने के लिए तैयार न होने के अपने हठपूर्ण रुख से, भाजपा के मौजूदा नेतृत्व ने दोनों पक्षों के बीच समझौते के सारे रास्ते ही बंद कर दिए।

वास्तव में मोदी सरकार ने जुलाई के आखिरी सप्ताहांत पर ही, विपक्ष पर इसके दावे के साथ हमला बोल दिया था कि उसके संसद न चलने देने से देश का बहुत भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था।

मानसून सत्र के पहले दो हफ्ते में ही, संसद के दोनों सदनों को मिलाकर, 107 घंटे काम हुआ था, जबकि सिर्फ 17 घंटे काम हुआ था। इस तरह करदाताओं के 130 करोड़ रुपए बर्बाद हो गए थे! संसद के काम करने न करने और करदाताओं के पैसे की बर्बादी के सवाल पर हम जरा बाद में आएंगे, यहां सिर्फ इतना जिक्र करना ही काफी होगा कि ‘देश के नुकसान’ का यह प्र्रचार पहले दो-तीन दिन तक अनाम ‘सरकारी सूत्रों’ के ही जिम्मे रहा था, लेकिन अब खुद प्रधानमंत्री ने इसकी कमान संभाल ली है।

नरेंद्र मोदी के राज के सात साल में संसद की शक्तियों और काम-काज के बेतरह कतर दिए जाने के बावजूद, कम से कम इतना अनुमान तो कोई भी लगा सकता था कि संसद का मानसून सत्र हंगामी होगा।

बेशक, साम-दाम-दंड-भेद के सारे हथियारों के सहारे, मोदी राज ने न सिर्फ राज्य सभा में भी अंतत: बहुमत जुगाड़ लिया है, बल्कि दोनों सदनों में अपने खुल्लमखुल्ला सत्तापक्षी सभापतियों के जरिए, विपक्ष की आवाज को उसकी संख्या के अनुुपात से भी धीमा करने के सारे इंतजाम कर लिए हैं। संसद के पिछले मानसून सत्र में जिस तरह तीन किसानविरोधी कानूनों और चार मजदूरविरोधी संहिताओं को, बहुमत की तानाशाही के सहारे, बिना बहस के और एक तरह से जोर-जबर्दस्ती से तथा सारे संसदीय-नियम कायदों को पांवों तले रोंदते हुए पारित घोषित कराया गया था, वह मोदी सरकार की ओर से इसका भी एलान था कि वह संसद में विपक्ष की रत्तीभर नहीं सुनेगी और जो मन चाहेगा वही करेगी। इसके बावजूद, वर्तमान मानसून सत्र की पृष्ठभूमि ने ही यह सुनिश्चित कर दिया था कि संसद के इस सत्र में विपक्ष अपनी आवाज सुनाने की, पिछले किसी भी सत्र से ज्यादा जोरदार कोशिश करेगा।

इसके पीछे एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व तो पिछले साल मानसून सत्र में जबर्दस्ती संसद का ठप्पा लगवा कर थोपे गए मजदूरविरोधी तथा किसानविरोधी कानूनों के लगातार जारी विरोध का ही था। खासतौर पर किसानों के राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर चलते अविराम विरोध आंदोलन के आठ महीने पूरे हो रहे थे और तीनों काले कानूनों के वापस लिए जाने की मांग को लेकर किसान, संसद भवन से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर, अपनी समांतर संसद चला रहे थे। यह मुद्दा, जिस पर मोदी की दूसरी पारी में सत्ताधारी एनडीए में पहली बड़ी फूट पड़ी थी और भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी, अकाली दल सत्ताधारी गठजोड़ तथा उससे भी बढ़कर मोदी की सरकार से अलग हो गयी थी, संसद के सत्र को हंगामी नहीं बनाता तो ही अचरज होता।

ऐसा ही महत्वपूर्ण दूसरा मुद्दा कोरोना की दूसरी लहर के भयावह प्रकोप के बीच, खुलकर सामने आयी मोदी सरकार की तैयारियों तथा व्यवस्थाओं की घोर विफलताओं का था। अस्पताल, वेंटीलेटर, आक्सीजन, रेमडेसिविर, एंबुलेंस और यहां तक कि श्मशानों तथा कब्रिस्तानों की भी भारी कमी के जैसे दर्दनाक मंजर अप्रैल-मई के महीने में देश भर में और खासतौर पर उत्तरी भारत के बड़े हिस्से में देखने को मिले थे और जिस तरह इस सबके बीच सरकार नाम की चीज एक तरह से गायब ही नजर आ रही थी, उस सब का दु:ख और विक्षोभ अगर संसद में सुनाई ही नहीं देता, तो यह संसद के देश और जनता का प्रतिनिधित्व करने के दावे पर ही गंभीर सवालिया निशान लगना होता।

यह भी याद रखना चाहिए कि यह कोई बीते कल की चीर-फाड़ करने का ही मसला नहीं है। यह आने वाले कल का भी मसला है, जिसमें तीसरी लहर का जो कि और भी घातक भी हो सकती है, खतरा सिर पर मंडरा रहा है और यह खतरा इसलिए सिर पर मंडरा रहा है कि मोदी सरकार, कोविड-19 के टीके होने के बावजूद, देश की आबादी के लक्षित हिस्से का वांक्षित तेजी से टीकाकरण सुनिश्चित करने में विफल रही है, जबकि यह टीकाकरण ही संभावित तीसरी लहर या उसकी मारकता के खिलाफ सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी है। यह तब है जबकि भारत के पास, दुनिया भर में सबसे ज्यादा टीका बनाने की क्षमताएं हैं और टीके भी।

इतना ही महत्वपूर्ण तीसरा मुद्दा, महामारी की सीधी मार तथा उसकी रोक-थाम के लिए आजमाए जा रहे लॉकडाउन समेत पाबंदी के विभिन्न उपायों के चलते, खासतौर पर मेहनतकशों के काम तथा आय के छिनने/ घटने से हो रही बदहाली के प्रति, मोदी सरकार की घोर निष्ठुरता का है। इस संकट के बीच, आम जनता के विशाल बहुमत की मदद करने के लिए, आय सुरक्षा तथा नकद सहायता मुहैया कराने जैसे कदम उठाने के बजाए, जो अन्य अधिकांश देशों ने अपनी सामथ्र्य के हिसाब से ही सही, उठाए जरूर हैं, मोदी सरकार ने लक्षित आबादी को सिर्फ 5 किलोग्राम प्रतिव्यक्ति अनाज मुफ्त मुहैया कराने के, भूख से मौतों को टालने के उपाय में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली है। इसके ऊपर से यह सरकार, महामारी की मार से और भी उग्र हो गए, अर्थव्यवस्था के चौतरफा संकट तथा उसके चलते रोजगार के बढ़ते संकट से निपटने के लिए, जनता के विशाल बहुमत के लिए रोजगार तथा आय या सहायता मुहैया कराने के बजाए, बड़ी पूंजी और कार्पोरेटों को प्रोत्साहन के तौर पर ज्यादा से ज्यादा कर रियायतें व छूटें देने पर ही भरोसा कर रही है। और दूसरी ओर इस संकट तथा इस संकट से उबरने के नाम पर कार्पोरेटों को दी जातीं रियायतों के चलते, अपने बढ़ते राजस्व घाटे की भरपाई, यह सरकार तेल उत्पादों की कीमतों में लगातार तथा अनाप-शनाप बढ़ोतरी करने के जरिए, आम जनता पर चौतरफा महंगाई का भारी बोझ थोपने और इस तरह उसकी बदहाली बढ़ाने के जरिए ही कर रही है।

इस जनविरोधी नीति के जरिए, मोदी सरकार मेहनतकश जनता की हालत तो बद से बदतर कर ही रही है, इसके साथ ही बढ़ते आर्थिक संकट को और तीखा तथा दु:साध्य बनाने का ही काम कर रही है।

इन तीनों ही पहलुओं से, जनता के प्रचंड बहुमत की तकलीफों तथा पीड़ा को स्वर देते हुए, विपक्ष को मौजूदा शासन को आलोचनाओं का निशाना बनाना ही था और सत्तापक्ष को जहां तक बन पड़े इन आलोचनाओं को ही रोकने की कोशिश करनी ही थी। यानी सत्तापक्ष और विपक्ष की टक्कर तो हालात ने पहले से तय कर रखी थी। इसके ऊपर से ऐन सत्र की पूर्व-संध्या में पेगासस जासूसी कांड के खुलासे आने शुरू हो गए। और इन खुलासों के आखिर तक जो तस्वीर निकल कर आयी, वह निजी तौर पर किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की, वे चाहे जितने ऊंचे पदों पर हों, निजता के मौलिक अधिकार के उल्लंघन तथा जासूसी के खतरे की ही तस्वीर नहीं है। यह तो किसी सामथ्र्यवान के हाथों से और इस मामले में उसके सरकार के सिवा कोई दूसरा होने की शायद ही कोई संभावना है, क्योंकि पेगासस की निर्माता इस्राइली कंपनी, एनएसओ का दावा है कि उसने सिर्फ सरकारों या प्रमाणित सरकारी एजेंसियों को ही यह हथियार मुहैया कराया है, पूरी की पूरी जनतांत्रिक व्यवस्था को बेमानी बनाए जा सकने के खतरे का ही मामला है।

बहुराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों व कल्याणकारी एजेंसियों और अनेक देशों के प्रमुख मीडिया संस्थानों के संयुक्त उद्यम से, इस जासूसी के संभावित शिकारों की जो सूची सामने आयी है, उसमें विपक्षी नेताओं के जरिए पूरी राजनीतिक व्यवस्था से लेकर, चुनाव आयोग व शीर्ष न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाओं और शीर्षस्थ नौकरशाहों से लेकर, सशस्त्र बलों के उच्चाधिकारियों तक यानी संक्षेप में समूची व्यवस्था के ही मैनिपुलेशन की संभावनाओं और सामथ्र्य के संकेत छुपे हुए हैं। समूची जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए इससे बड़े तथा शैतानी खतरे की कल्पना, फिलहाल नहीं की जा सकती है।

इसके बावजूद, मोदी-शाह के नेतृत्व में सत्तापक्ष बजिद है कि पेगासस जासूसी समेत इन मुद्दों पर न बहस की कोई अर्जेंसी है और न व्यवस्थित बहस की जरूरत है। पेगासस के मामले में, कोई उच्चस्तरीय जांच कराने का वादा करना तो दूर, सरकार का दावा है कि उसका इतना भरोसा देना ही काफी होना चाहिए कि ‘कोई अवैध जासूसी नहीं हो रही है!’ वह तो यह स्पष्ट करने के लिए भी तैयार नहीं है कि उसने या किसी सरकारी एजेंसी से पेगासस की सेवाएं हासिल की हैं या नहीं? जनतंत्र समेत, जनता के जीवन-मरण के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर चर्चा सत्तापक्ष रोक रहा है और विपक्ष पर इल्जाम लगा रहा है कि वह संसद नहीं चलने दे रहा है, संसद को अपना काम नहीं करने दे रहा है! लेकिन, अगर संसद ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं कर सकती है, तो उसका काम ही क्या है?

संसद का काम क्या है

संसद का काम अगर सिर्फ कार्यपालिका के फैसलों पर ठप्पा लगाना है, तो बहुमत से सरकार बन जाने के बाद, इस औपचारिकता की जरूरत ही क्या है? संसदीय व्यवस्था का अर्थ ही है, ऐसी व्यवस्था जिसमें जनता के प्रतिनिधियों के सामने कार्यपालिका की जवाबदेही के माध्यम से, जनता के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। बहस से हो तो बहस से और बहस से न हो तो बहस रोककर, कार्यपालिका को जनता की चिंताओं के प्रति जवाबदेह बनाना ही संसद का मुख्य काम है। और यह जवाबदेही सुनिश्चित करना ही संसद का चलना है। वर्ना हम संसद को किसी डिबेटिंग सोसाइटी में घटा रहे होंगे।

0 राजेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लोकलहर के संपादक हैं। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

        

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