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370 की समाप्ति के दो साल : धरती के स्वर्ग को अच्छे दिन का इंतजार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनेक फैसले अचानक और बगैर पर्याप्त सलाह-मशविरे या लोगों को विश्वास में लिए बगैर लिए हैं। धारा 370 को हटाना भी उनमें से एक है। इसके पीछे उनका और उत्साह एवं राजनैतिक सोच का योगदान अधिक है जो चुनावी समीकरणों ओर ध्रुवीकरण की दिशा में निरंतर सोचता रहता है। 

धारा 370 के हटने के दो वर्ष कश्मीर को जन्नत बनने का इंतजार

370 हटाने पर कहा गया था कश्मीर को स्वर्ग बनाया जायेगा, पर बना दिया दोजख

केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली धारा 370 के हटने के दो वर्ष (Two years after the abrogation of Article 370) पूरे हो चुके हैं। इस धारा को हटाने पर कहा तो यह गया था कि कश्मीर को स्वर्ग बनाया जायेगा, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि इस काल में उसके तीन टुकड़ों (कश्मीर, जम्मू एवं लद्दाख) में विभाजित होने के साथ ही कश्मीर लोकतंत्र और नागरिक आजादी की दृष्टि से जन्नत की बजाय दोज़ख में बदल दिया गया है।

दो साल के बाद अगर हम देखें तो कुछ प्रशासनिक कदमों एवं कानून-व्यवस्था के मुद्दों के साथ स्थिति इसलिए लगभग वहीं की वहीं है क्योंकि वहां की राजनैतिक पार्टियां अब भी  धारा 370 की बहाली की बात कर रही हैं और सरकार उन्हें राज्य का दर्जा देने में अब तक नाकाम रही है। हालांकि उसका वायदा केन्द्र सरकार ने अवश्य किया है।

सरकार नये सिरे से परिसीमन के बाद विधानसभा के चुनाव कराना चाहती है जिसके चलते वहां के सियासी दलों को लगता है कि इससे जनसांख्यिकीय बदलाव संभावित है।

सरकार कश्मीरियों का दिल जीतने में नाकाम रही

सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह सरकार वहां के लोगों के दिल जीतने में अब तक नाकाम रही है। धारा 370 हटाने के बाद ही बड़ी संख्या लम्बे समय तक लोगों और कश्मीरी नेताओं को गिरफ्तार करने या नज़रबंद रखने, इंटरनेट सेवाएं खंडित कर वहां के नागरिकों के देश-दुनिया से काटने, आम जनता की सड़कों पर मुक्त आवाजाही को प्रतिबंधित करने जैसे कदम उठाकर सरकार ने लोगों का विश्वास खो दिया है। फिर, 370 हटाने के बाद जिस तरह से सत्तारुढ़ दल के समर्थकों या सदस्यों ने वहां के नागरिकों के संबंध में अपमानजनक टिप्पणियां कीं, उससे भी स्थानीयों और अन्य प्रदेशों के लोगों के बीच दूरियां बढ़ी हैं।

श्रीनगर के डल झील के किनारे प्लॉट खरीदने से लेकर वहां की लड़कियों से शादी कर कश्मीर में ससुराल बनाने की भद्दी बातें कही गई थीं। उन्हें भुला पाना किसी भी इंसान के लिए कठिन है। न केवल सरकार बल्कि समस्त देशवासियों द्वारा उनके दिलों पर मरहम लगाने की ज़रूरत है।

5 अगस्त, 2019 को धारा 370 हटाने के बाद इसी साल 24 जून को पहली बार जम्मू-कश्मीर के नेताओं और नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच आमने-सामने की जो बातें हुईं उससे स्पष्ट हो गया है कि आज भी दोनों ही पक्ष लगभग वहीं खड़े हैं, जहां पहले थे। बल्कि इस बीच कश्मीरियों पर जो पाबंदियां लगाई गईं वे लोकतंत्र के लिहाज से कतई उचित नहीं थीं।

बंदिशें अभी भी जारी हैं

कश्मीर में अभी भी बड़े पैमाने पर सुरक्षा बल तैनात हैं और वहां लम्बे समय तक इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई थीं। वर्तमान में भी कश्मीर की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। पर्यटन उद्योग को मिले झटके से लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है। सरकार को चाहिये कि इस ओर भी तत्काल ध्यान दे। 

क्या था धारा 370 हटाने का उद्देश्य

धारा 370 हटाने का एक उद्देश्य कश्मीरी पंडितों को वापस बसाना भी बतलाया गया था। जिन लोगों ने 370 को हटाने पर केन्द्र सरकार की वाहवाही की थी, उन्हें पूछना चाहिये कि इन दो वर्षों में कितने पंडित वापस कश्मीर में बसाये जा सके हैं?

सरकार ने वहां कई मंदिरों का पुनरुद्धार ज़रूर किया है लेकिन यह कोई ऐसा कारण नहीं हो सकता कि कश्मीरी पंडित अपने गृह प्रदेश में लौट सकें। आखिरकार, पूर्ण सुरक्षा और रोजगार की गारंटी जब तक नहीं होगी, सरकार अपने इस उद्देश्य में कामयाब नहीं हो पायेगी।

नहीं रुकीं सीमा पार से आतंकवादी घटनाएं

370 के हटने से सीमा पार से आतंकवादी घटनाओं पर रोकथाम में मदद मिलने की भी बात कही गई थी, पर वह भी खोखली साबित हुई है। वैसे तो नोटबंदी लागू करते समय भी कहा गया था कि इससे जम्मू-कश्मीर में होने वाली घुसपैठ की घटनाओं को रोका जा सकेगा। तब की ही तरह इस मामले में भी यह दावा गलत साबित हुआ है क्योंकि सीमा पार से फायरिंग की घटनाएं अब भी होती रहती हैं। 

इसी बीच 31 अक्टूबर, 2020 को केन्द्र सरकार ने राज्य को तीन हिस्सों में बांट दिया था। इसके अनुसार जम्मू एवं कश्मीर में तो विधानसभाएं रहेंगी लेकिन लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश (यूटी) बनाने की बात कही गई। जम्मू और कश्मीर के लोग जल्दी ही राज्य का दर्जा वापस चाहते हैं। वहां दिसम्बर, 2020 में हुए डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कौंसिल (डीडीसी) के चुनावों में 278 सीटों में से 110 पर पीपुल्स एलाएंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशनविजयी रहा।

गुपकार गठबंधन में जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, सीपीआई (एम), जेकेएएनसी एवं जेकेपीएम दल शामिल हैं। ये सभी दल 370 हटाने के विरोधी रहे हैं। दूसरी तरफ, भाजपा को 75 एवं कांग्रेस को 26 सीटें मिली थीं। इस गठबंधन को गृह मंत्री अमित शाह ने कभी गुपकार गैंगकहकर संबोधित किया था जो एक तरह से उन दलों एवं उनके नेताओं के प्रति उपहास या घृणा का भाव दर्शाता है।

भाजपा और सरकार को कश्मीर तो चाहिये लेकिन कश्मीरी नहीं

शाह का यह संबोधन कश्मीर एवं कश्मीरियों को लेकर सरकार तथा उनकी पार्टी के दृष्टिकोण को बतलाता है। उनकी पार्टी एवं समर्थकों को कश्मीर तो चाहिये लेकिन कश्मीरी नहीं। जिस धारा 370 ने जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ 70 वर्षों से बांधकर रखा था, वह हटा देने से कश्मीरियों और शेष भारत के लोगों के बीच का भावनात्मक लगाव भी एक तरह से खतरे में आ गया है। इस दूरी को भी खत्म किये जाने की आवश्यकता है जो केन्द्र सरकार एवं सत्तारुढ़ दल की जिम्मेदारी है।

It is clear today that the government does not have a clear roadmap to restore relations after the abrogation of Article 370.

आज साफ हो गया है कि सरकार के पास धारा 370 को हटाने के बाद संबंधों को वापस ठीक करने का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है। कहने को वहां एक प्रशासक बैठ गये हैं, सेना या सरकार के लोगों पर पत्थर फेंकने या उन्हें मारने वालों के लिए कहीं अधिक कड़े कानून बन गए हैं, परन्तु ये सारा कुछ प्रशासनिक सुधार के खाते में जाता है। वैसे कुछ लोगों का मानना है कि पहले की तरह यहां अशांति नहीं है। फिर भी,

सरकार को चाहिये कि धारा 370 हटने के दो साल बाद इस मामले पर गंभीरता से विचार करे। वे सारे वादे अविलंब पूरे करे जो धारा 370 हटाने के दौरान किये गये थे। जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल दिया जाये। एक संगठित राज्य को भंग कर देना वहां के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने जैसा है।

परिसीमन की जो योजना सरकार बना रही है, उसमें वहां के लोगों की एकता और अखंडता पर कोई असर न हो, यह भी देखना होगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनेक फैसले अचानक और बगैर पर्याप्त सलाह-मशविरे या लोगों को विश्वास में लिए बगैर लिए हैं। धारा 370 को हटाना भी उनमें से एक है। इसके पीछे उनका और उत्साह एवं राजनैतिक सोच का योगदान अधिक है जो चुनावी समीकरणों ओर ध्रुवीकरण की दिशा में निरंतर सोचता रहता है। यह फैसला देश की एकता एवं अखंडता को प्रभावित करने वाला कदम है। धारा 370 हटाने से जो दूरियां बनी हैं, उन्हें दूर करने की दिशा में प्रभावशाली कदम उठाए जाने होंगे।

डॉ. दीपक पाचपोर

(लेखक देशबन्धु के राजनीतिक सम्पादक हैं। देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

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