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भवानीपुर उपचुनाव से आपदा में अवसर का क्या है संदेश?

देशबन्धु के आज के संपादकीय में भवानीपुर उपचुनाव के नतीजों की समीक्षा करते हुए बताया गया है कि इन परिणामों का मोदी सरकार के लिए क्या अर्थ है और कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए?

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today.

प. बंगाल में भाजपा की हार की पटकथा लिखने की शुरुआत विधानसभा चुनावों से हुई थी, आज भवानीपुर उपचुनाव के नतीजों (Bhawanipur by-election results) के साथ उसका अंत भी लिखा गया। प. बंगाल विधानसभा चुनावों (Bengal assembly elections 2021) में टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ा था। उनके सामने उनके करीबी रहे शुभेन्दु अधिकारी थे, जो बतौर भाजपा उम्मीदवार खड़े हुए थे। तब ममता बनर्जी की जीत पक्की मानी जा रही थी, लेकिन नंदीग्राम अधिकारी परिवार के दबदबे वाला क्षेत्र रहा है, इसलिए भाजपा ने उन पर दांव चलने का जोखिम उठाया था।

शुभेन्दु अधिकारी ने भी ऐलान कर दिया था कि अगर वे ममता बनर्जी को नहीं हरा पाए, तो राजनीति छोड़ देंगे। जब नतीजे आए तो शुभेन्दु अधिकारी भाजपा विधायक बन कर सामने आए और ममता बनर्जी को हार का स्वाद चखना पड़ा। हालांकि टीएमसी ने चुनावों में बहुमत हासिल कर फिर से सरकार बनाई और ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं।

नंदीग्राम विधानसभा सीट पर चुनाव में हेराफेरी की शिकायत की थी ममता ने

लेकिन हार की टीस लगातार बनी रही। नंदीग्राम सीट पर चुनाव में हेराफेरी की शिकायत (Complaint of election rigging in Nandigram seat) भी उन्होंने की और फिलहाल मामला अदालत में विचाराधीन है। जब तक ये तय नहीं हो जाता कि नंदीग्राम में चुनाव में असल में हुआ क्या था, तब तक तो शुभेन्दु अधिकारी की विधायकी सुरक्षित है और वे नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे। लेकिन ममता बनर्जी के सामने मुख्यमंत्री बने रहने की चुनौती बनी हुई थी, क्योंकि पद संभालने के छह माह के भीतर उन्हें विधानसभा का सदस्य बनना था।

उपचुनाव टालने की की गई थीं कोशिशें

राज्य में उपचुनाव कराने की मांग ममता बनर्जी लगातार कर रही थीं। इस बीच कोरोना लहर का डर भी विरोधियों की ओर से दिखाया गया, लेकिन आखिरकार चुनाव आयोग ने घोषणा की कि 30 सितंबर को मतदान होगा और 3 अक्टूबर को परिणाम आएंगे। भवानीपुर, जंगीपुर और शमशेरगंज इन तीन सीटों पर उपचुनाव हुए। जिसमें भवानीपुर से ममता बनर्जी उम्मीदवार थीं। कांग्रेस ने इस सीट पर ममता बनर्जी के खिलाफ कोई उम्मीदवार न उतारने का ऐलान किया था। लेकिन चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर रही माकपा ने ममता बनर्जी के सामने उम्मीदवार खड़ा किया। अपने किले को खंडहर बनते देखना वामदलों के लिए पीड़ादायक होगा, लेकिन उन्हें ये विचार करना होगा कि आखिर जनता से जुड़ने और अपने विचार जनता तक प्रेषित करने में कहां चूक हो गई और उसे कैसे सुधारा जाए।

भाजपा ने पूरी कोशिश की थी माहौल बनाने की   

भवानीपुर से ममता बनर्जी की जीत शुरुआत से तय लग रही थी, ऐसे में माकपा ने शायद अपनी संघर्ष क्षमता दिखाने के लिए प्रत्याशी खड़ा किया, जबकि भाजपा ने अपनी साख बचाने के लिए प्रियंका टिबड़ेवाल को ममता बनर्जी के सामने उम्मीदवार बनाया। यह भाजपा की राजनैतिक चतुराई का एक नमूना है कि उसने एक संभावित हार वाली सीट पर एक कमजोर प्रत्याशी को खड़ा कर दिया, ताकि खोने के लिए कुछ न रहे। भाजपा ने प्रत्याशी चयन में तो कोई खास दांव नहीं लगाया, लेकिन ममता बनर्जी के लिए राह भी आसानी से नहीं छोड़ी। बेशक मोदी-शाह जैसे बड़े नेता इस हारने वाली सीट के प्रचार से दूर रहे, लेकिन भाजपा के बाकी नेताओं ने टीएमसी को इस दौरान घेरने, अनावश्यक तरीके से आरोप लगाने और इस बहाने चर्चा बटोरने की भरपूर कोशिश की। एक छोटे से निर्वाचन क्षेत्र के लिए जिस तरह साढ़े तीन हजार सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए, उससे भी यही नजर आया कि भाजपा ने माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है।

ममता बनर्जी में दिखाई दिया जूझने का जज्बा

जूझने का यही जज्बा ममता बनर्जी में भी दिखाई दिया। उन्हें पता था कि उनके लिए भवानीपुर सीट को जीतना आसान है, फिर भी वे प्रचार में सक्रिय रहीं, मतदाताओं से अपनी जीत की अपील की। आसानी से राह न छोड़ना और संघर्ष का यह जज्बा कांग्रेस को भी सीखना चाहिए और इसके साथ राजनीति के इस गुर को भी समझना होगा कि अपने प्रतिद्वंद्वी से घर में मिल रही चुनौती को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। अगर कांग्रेस इस रणनीति को समझ ले तो आने वाले चुनावों में उसे काफी मदद मिलेगी।

बहरहाल, भवानीपुर सीट ममता बनर्जी कितने भारी अंतर से जीतेंगी, यही सवाल मतदान के दिन से बना हुआ था और अब नतीजे बतलाते हैं कि उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को लगभग 58 हजार मतों के अंतर से हराया है। ममता बनर्जी की इस जीत के बाद भाजपा कार्यालय में सन्नाटा पसरा था, जबकि टीएमसी खेमे में जबरदस्त जश्न का माहौल है।

अच्छी बात है कि ममता बनर्जी कोई विजयी जुलूस नहीं निकाल रहीं। लेकिन उनकी ओर से यह संदेश भाजपा तक चला गया है कि अब वे दिल्ली में विजयी जुलूस निकालने की तैयारी कर रही हैं।

2024 में आसान नहीं होगी मोदी की राह

विधानसभा चुनावों में भाजपा को शिकस्त देने के बाद से ही ममता बनर्जी को नरेन्द्र मोदी का विकल्प बनाकर प्रस्तुत किया जाने लगा है। अगर विपक्षी एकता के कार कोई नया मोर्चा बनता है, तो उसका नेतृत्व कौन करेगा, राहुल गांधी या ममता बनर्जी, इस सवाल को राजनैतिक गलियारों में कई बार उछाला जा चुका है। अक्सर ऐसे सवालों के जवाब विधानसभा चुनावों की जीत-हार में तलाशे जाते हैं। ममता बनर्जी का पलड़ा प.बंगाल में कांग्रेस से भारी है, मगर उन्हें अपना दम प.बंगाल के बाहर भी दिखाना होगा। वैसे भी विधानसभा चुनावों के मुद्दे और मिजाज़ आम चुनावों में नहीं तलाशे जा सकते।

केंद्र की सत्ता में आने के लिए देशव्यापी स्वीकार्यता या लोकप्रियता की जरूरत होती है। उसमें राहुल गांधी आगे निकलेंगे या ममता बनर्जी ये समय के साथ पता चल जाएगा। फिलहाल एक बात तय दिख रही है कि 2024 तक नरेन्द्र मोदी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाले नेता तैयार हो चुके होंगे। पिछले दो चुनावों में जिस आसानी से भाजपा ने केंद्र की सत्ता हासिल कर ली थी, अब वैसा होना मुश्किल होगा।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

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