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कोरोना संकट और मोदी का विकल्प : बेहद अक्षम पीएम हैं नरेंद्र मोदी

 

 देश में कोरोना महामारी फैलने के दूसरे चरण तक मोदी सरकार द्वारा उससे निपटने के प्रयासों की राहुल गांधी ने जहां न केवल कई बार आलोचना की, बल्कि इस महामारी से निपटने के लिए सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए. इस सुझाव में उनकी चिंताओं का केंद्र आम आदमी और इस देश की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाना था.

पूरे कोरोना संकट के दौरान राहुल गांधी का यह प्रयास था कि इस देश के स्वास्थ्य ढांचे को समय रहते बेहतर कर लिया जाए ताकि देश कोरोना जैसी किसी संक्रामक महामारी से होने वाले भयानक जान-माल और आर्थिक नुकसान से कम से कम प्रभावित हो.

हालांकि यह अपने आप में एक दिलचस्प बात है कि श्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों ने राहुल गांधी द्वारा दिए जा रहे महत्त्वपूर्ण सुझावों की न केवल भयानक अनदेखी की, बल्कि उन सुझावों के प्रतिउत्तर में उनका मजाक भी बनाया. यह सत्ता के अहंकार की पराकाष्ठा थी. यही नहीं, भाजपा की आईटी सेल ने इन सुझावों के खिलाफ इन्टरनेट पर अभियान चलाकर हिंदुत्व की बीमार मानसिकता वाले अपने समर्थक वर्ग को आभासी मानसिक टॉनिक से संतृप्त किया. हालांकि कोरोना महामारी अपने दूसरे चरण में जब मजबूती के साथ इस देश में एक बार फिर से वापस लौटी तब उसने न केवल व्यापक नुकसान किया बल्कि राहुल गांधी द्वारा व्यक्त की गई कई आशंकाओं को सही साबित किया. लोग बिना ओक्सिज़न और दवा के सड़कों पर मरते दिखाई दिए. इस देश का बदहाल स्वास्थ्य सिस्टम नंगा हो गया और मोदी सरकार स्वयं बैकफुट पर चली गई.

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के कारण इस देश में लाखों लोगों की मृत्यु हो गई. इन लोगों में से अधिकतर को बचाया जा सकता था. लेकिन ये बदनसीब सिर्फ इसलिए नहीं बचाये जा सके क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार अपनी छवि निर्माण में ही इतनी मस्त थी कि उसने इस संकट के दौर में आम जनता के जीवन की कोई परवाह नहीं की. 

ऐसा माना जाता है कि इस देश में लाखों लोग कोरोना के कारण असमय काल के गाल में चले गए. बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के कारण मोदी सरकार उन्हें नहीं बचा पाई. 

एक बेहद अक्षम प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी

एक तरह से देखा जाए तो नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा समय होने के बावजूद कोरोना महामारी से निपटने की जिस तरह की तैयारियां की गई हैं, उसको लेकर इस बात में कोई संदेह नहीं रहता कि वह एक बेहद अक्षम प्रधानमंत्री हैं.  वह एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनकी निगाह में आम जनता और इस देश का सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा कोई मायने नहीं रखता. उनके लिए मायने रखता है तो केवल हिंदुत्व की विभाजनकारी सियासत का प्रसार और कार्पोरेट का मुनाफा. इससे इतर सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत छवि का ‘निर्माण’. आम जनता और उसकी खुशहाली इन सबके बाद का विषय है. इसीलिए मोदी सरकार को कोरोना संकट से असमय मर गए लोगों से कोई सहानुभूति नहीं है. सरकार के लिए जैसे इनकी मौत कोई गंभीर बात नहीं है.

और फिर, आज जब चारों तरफ कोरोना से उपजी समस्या के कारण भयानक निराशा का माहौल है, हम देख सकते हैं कि राहुल गांधी की सारी भविष्यवाणियां क्रमशः सच हो रही हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर नरेंद्र मोदी जगह राहुल गांधी सत्ता में होते तो सरकार कोरोना से और बेहतर ढंग से निपट पाती. 

दरअसल कोरोना के पीछे मोदी सरकार की जो नाकामी है उसे समझने के लिए हमें हिंदुत्व के दर्शन को समझना होगा. हिंदुत्व के पूरे दर्शन में आम जनता और उसके सुखदुख के लिए कोई जगह नहीं है. हिंदुत्व का पूरा दर्शन मूलतः कारपोरेट का दर्शन है. यही वजह है कि जब लोग कोरोना से तबाह हो रहे हैं नरेंद्र मोदी के खास कार्पोरेट मित्रों की संपत्ति बेहिसाब बढ़ी है.

दरअसल जब उस दर्शन में आम जनता के लिए जब कोई जगह ही नहीं है, फिर उसे आदर्श मानने वाली मोदी सरकार से यह कैसे उम्मीद किया जा सकता है कि उसे आम जनता के स्वास्थ्य की चिंता होगी? वह आम जनता को एक बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराएगी?

कोरोना ने हिंदुत्व के मानवद्रोही होने की असलियत को भी नंगा किया है और मोदी की कार्पोरेटवादी छवि को भी बेनकाब कर दिया है.

गौरतलब है कि कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में इस ‘हिंदुत्व’ को समग्रता से नकारने और उसके खिलाफ एक वैकल्पिक ढांचा बनाने के लिए प्रयासरत हैं. राहुल गांधी यह प्रयास कर रहे हैं कि इस देश को फासीवादी हिंदुत्व के गर्त से इतर एक प्रगतिशील विकल्प दिया जाए. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि केंद्र सरकार को राहुल गांधी की तरफ से कोरोना से निपटने के लिए जितने भी सुझाव दिए गए उनके केंद्र में आम आदमी, उसकी खुशहाली और स्वास्थ्य था. इस बात से साबित होता है कि राहुल गांधी में नरेंद्र मोदी के मुकाबले मानवीय गुण ज्यादा है. यह भारत जैसे देश में उनके संवेदनशील और बेहतर राजनेता होने की पुष्टि करता है.

यहाँ एक बात और ध्यान देने लायक है कि नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ कोई क्षेत्रीय सियासी दल विकल्प बन कर नहीं उभर सकता. नरेंद्र मोदी का मुकाबला केवल कांग्रेस ही कर सकती है क्योंकि उसी के पास हिंदुत्व के खिलाफ एक गौरवमयी विरासत है. यह विरासत ही उसे आम जनता से जोड़ती है.

आज राहुल गाँधी कोरोना संकट से निपटने के लिए मोदी सरकार को जो सुझाव दे रहे हैं उसके केंद्र में आम आदमी है. इसके पीछे वही विरासत है. यह मोदी सरकार की असफलता है कि उसने इन सुझावों की अनदेखी की और जनता को मौत के मुंह में धकेला.

राहुल गाँधी मोदी के मुकाबले एक बेहतर विकल्प हैं- इसमें संदेह नहीं है. कोरोना काल में एक महत्वपूर्ण सियासी सत्य भारत की जनता के सामने आया है.

हरे राम मिश्र

लेखक स्वतंत्र पत्रकार व आरटीआई एक्टिविस्ट हैं।

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