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मन की बात : प्रधानमंत्री के नाम माओवादी नेता प्रमोद मिश्रा के पुत्र का खत

मन की बात,Mann Ki Baat,Open lettet to PM by son of Maoist leader

Open lettet to PM by son of Maoist leader

Mann Ki Baat: Letter from the son of Maoist leader Pramod Mishra to the Prime Minister

रूपेश कुमार सिंह

स्वतंत्र पत्रकार

भाकपा (माओवादी) के केन्द्रीय कमिटी सदस्य प्रमोद मिश्रा के पुत्र सुचित मिश्रा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 27 जुलाई, 2021 को खुला खत लिखा है, जिसे 28 जुलाई को रजिस्टर्ड डाक से भी उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा है।

मालूम हो कि प्रमोद मिश्रा को अप्रैल 2008 में धनबाद (झारखंड) से गिरफ्तार किया गया था, उस समय वे भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य थे। लगभग 9 साल तक देश के लगभग एक दर्जन जेलों में रहने के बाद 2 अगस्त, 2017 छपरा (बिहार) जेल से उन्हें जमानत पर रिहा किया गया था। जमानत पर रिहा होने के बाद वे अपने पैतृक गांव बिहार के औरंगाबाद जिला के रफीगंज प्रखंड के कासमा गांव में रहने लगे। इस दौरान गांव में ही उन्होंने पर्णकुटीबनाकर लोगों का होमियोपैथी और एक्यूपंक्चर से इलाज करने लगे और कोर्ट ही तारीख पर जाते रहे।

उनके पुत्र सुचित मिश्रा के अनुसार “कुछ महीने गांव में रहने के बाद जब वे एक दिन कोर्ट गये, तो फिर वापस नहीं लौटे। कुछ महीने बाद से स्थानीय अखबारों में उनका नाम पुलिस के हवाले से प्रकाशित होने लगा कि वे फिर से भूमिगतहो गये हैं और माओवादी छापामारों के साथ रहते हैं। इसके बाद से लगातार ईडी और पुलिस द्वारा हमारे संपत्ति के बारे में झूठ फैलाया जाने लगा। और विभिन्न तरीके से हमारे परिजनों को तंग करना शुरु कर दिया। इसीलिए अपनी सारी संपत्ति का ब्यौरा हम प्रधानमंत्री को इस खत के माध्यम से भेज रहे हैं।”

भारत के प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

माननीय श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी,

भारत सरकार, नई दिल्ली।

                                  हमारे समस्त परिवार की ओर से साष्टांग प्रणाम।

विषय- मन की बात

माननीय महोदय!

                          साल 2014 में भारत के सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता के शिखर पर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में आपके आसीन होने के बाद से आपका स्थान ‘को नहीं जानत है जग में’ बन गया। तब से पहले कार्यकाल की समाप्ति तक और दूसरी बार में पुनः पूर्व की अपेक्षा और ज्यादा बहुमत के साथ दूसरे कार्यकाल की जिम्मेवारी उठाना महज एक सामान्य बात नहीं है और निश्चय ही कहा जा सकता है कि आपके संसदीय व गैर-संसदीय तमाम विपक्ष तेजहीन हो गये, जबकि आपकी राजनीतिक प्रभापुंज का व्यापक विस्तार हुआ है। अब आप अपने तमाम तरह के विरोधियों का दमन करने और अपनी तमाम इच्छाओं को देश की समग्र जनता पर कानून और सत्ता की सम्पूर्ण शक्ति का इस्तेमाल कर थोपने में पूर्ण सक्षम हैं। जिसका परिचय तमाम विपक्ष के विरोध के बावजूद संसद में बनाये जाने वाले विभिन्न कानूनों और कश्मीरी समस्या का समाधान एक झटके में करके, आपने दिखा भी दिया है। इससे इतना तो अवश्य सिद्ध हो गया है कि अब आपके पूर्व महापुरूष श्री हेडगेवार, श्री गोलवलकर और श्री सावरकर के सपनों का भारत की रचना आपके नेतृत्व में खूब दूर की कौड़ी नहीं रह गयी। अब ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ का नारा आपके नेतृत्व में सफलता का मंजिल के करीब पहुँच चुका है। आप जैसे युग-पुरूष का महिमा गान करना भला किसे गौरवान्वित नहीं करेगा!

दूसरी तरफ आपके पूर्व महापुरूष के काल के समग्र भारतीयों के शुभचिंतक महापुरूषों में आने वाले अग्रणी नाम शहीदे आजम भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे महान नायकों के सपनों का भारत, पूर्णरूप से हर प्रकार के साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद से मुक्त भारत, शोषणहीन-वर्गहीन भारत, का सपना अब कभी सफल होगा भी या नहीं यह तो चिरकालिक अंधकार में डूब गया है!

पहले तो गाँधी जी का सपना ‘आधीनता-स्वाधीनता’ का सपना उनके अनुयायी काँग्रेसियों ने पूरा किया। उसके बाद आपका सितारा चमका। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद के सपनों के धारक-वाहक जो अतीत से अब तक अपने राजनीतिक संघर्ष में कार्यशील होकर आगे बढ़ रहे हैं, उनकी हैसियत क्या होगी शायद कोई इसे फिलहाल बता पाने में सक्षम नहीं है, मैं तो इसे सोच भी नहीं सकता क्योंकि यह भारत देश है, जहाँ पर क्रांतिकारी देशभक्तों की देशभक्ति की उज्ज्वल परंपरा के बावजूद, दासत्व के दर्शन से ग्रसित यहाँ का समाज उसे अपनाने के बजाय सिर्फ उनकी शहादत की महिमा गान करने तक ही सीमित रहता है और उनके विरोधी विचारों को व्यवस्था में स्थापित कराता है। मैं नहीं जानता कि यह भारत का सौभाग्य है या दुर्भाग्य, लेकिन वे सारे विचार के धारक-वाहक असंख्य लोग इस देश में हैं। जिन्हें आप भली-भाँति जानते हैं और आपको भी वे भली-भाँति जानते हैं। उसी विचार के धारक-वाहक के रूप में एक व्यक्ति हैं- मेरे पिता जी, लगभग 70 वर्षीय मेरे पिता अपने युवाकाल से हीं, कहें तो हम तमाम भाई-बहनों के जन्म के पूर्व से हीं मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के दार्शनिक, राजनीतिक और आर्थिक सिद्धांतों पर मजबूती से खड़े होकर भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद के सपनों के भारत को मूर्तरूप देने में आगे आये नक्सलवादी-माओवादी नेता चारू मजुमदार, कान्हाई चटर्जी के नेतृत्व में स्थापित लाइन पर सशस्त्र क्रांति के जरिए मौजूदा भारतीय राज्यसत्ता को उखाड़ फेंककर नव जनवादी राज्यसत्ता के निर्माण में लगे कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के समूह अब भाकपा (माओवादी) के दूसरी पीढ़ी के शीर्ष नेताओं में से एक रहे हैं। जिनका नाम श्री प्रमोद मिश्रा है।

जहाँ तक मैं जानता हूँ, मेरे पिताजी पर भारत के आध्यात्मिक संतों का प्रभाव भी गहरे रूप से मौजूद है, खासकर धर्माडंबर, कर्मकांड, हिंसा, छुआ-छूत, जात-पात, वर्णवाद, नस्लभेद आदि के खिलाफ मुखर वक्ता के रूप में ख्यात महान भारतीय संत कबीर दास जी का सहज योग का प्रभाव उनके जीवन पर गहरा रूप से है और वे उनके सच्चे उपासक भी हैं। 

माननीय महोदय! मैं उसी पिता का एक पुत्र हूँ। मैं अपने तीन भाई और दो बहनों में से एक हूँ। मेरा नाम सुचित मिश्रा, ग्राम पोस्ट थाना – कासमा, जिला – औरंगाबाद, राज्य – बिहार है। मेरे पिता के अलावे मेरा समस्त परिवार सामान्य भारतीय नागरिक है। मेरे पिता और उनकी संस्था भले हीं ताकतवर हो सकती है, जो आपकी संस्था या भारतीय राज्यसत्ता के खिलाफ लड़ने में सक्षम हो, लेकिन मैं यह स्पष्ट कर दूं कि उस संस्था के तमाम नेताओं, कार्यकर्ताओं, अधिकारियों के परिवार उतने हीं ताकतवर हैं जो आपकी संस्था या भारतीय राज्य को चुनौती दे सकें या देता हो, तो यह सत्य नहीं है। आपकी संस्था और मेरे पिता की संस्था के बीच बुनियादी राजनीतिक मतभेद है, जो सर्वविदित है और यह चिरकालिक रहेगा। ऐसी स्थिति में आपका या आपके संस्था के तमाम सदस्यों के परिवार अथवा माओवादी संस्था के तमाम सदस्यों के परिवार, जो आम नागरिक हैं, के बीच भी टकराव और संघर्ष का होना क्या जरूरी है?

क्या किसी लोकतंत्र में किसी पार्टी के सदस्य अथवा नेता का यह सोच बनाना कि अपने विरोधी को कमजोर करने के लिए उनके निर्बल-निरीह परिवारों को सताना, दमन करना अथवा साजिश के तहत झूठे मुकदमों में फंसाकर राज्यसत्ता की शक्ति का इस्तेमाल करके उन्हें हैरान-परेशान करना क्या कुशल राजनीतिक पार्टी और कुशल नेतृत्व की उचित पहचान है?

उपरोक्त प्रश्न जो मेरे मन में उठे हैं उसका जवाब जानने की मेरे अंदर की जिज्ञासा यानी मेरे मन की बात आप तक पहुंचाना मेरी दिली इच्छा थी, जिसे मैंने इस पत्र के माध्यम से लिखा है।

यह सच है कि मेरा समस्त परिवार अवश्य ही मेरे पिता से बेहद प्यार करता है और उनकी सलामत जिंदगी का कामना करता है, इसमें कोई शक नहीं है और यह भी सच है कि हम समस्त परिवार उनकी संस्था से जुड़े नहीं हैं। ऐसे ही अन्य माओवादियों के परिवार भी हैं। मेरे पिता का मानना है कि लोकतंत्र में वंशानुगत सत्ता नहीं होती, वह तो राजतंत्र में होता था। यह लोकतंत्र का युग है और इसका राजनीतिक उत्तराधिकार मेरा बेटा या मेरा परिवार का सदस्य होगा ही, ऐसी कोई बात नहीं है। इसीलिए हर व्यक्ति को अपना रास्ता चुनने का अधिकार है और वे ऐसे कभी अपने परिवार या किसी अन्य परिवार पर अपनी संस्था के साथ जोड़ने के लिए सैद्धांतिक, राजनीतिक चर्चा अवश्य चलाते हैं और चलाते रहे हैं, लेकिन जोर-जबरन दबाव देकर अपनी संस्था के साथ किसी को नहीं जोड़ते। वे यह भी कहते हैं कि भले ही मुझे कोई अपना निजी दुश्मन माने लेकिन मेरा कोई निजी दुश्मन न था, न है और न रहेगा। देश का दुश्मन, जनता का दुश्मन और क्रांति का दुश्मन हीं हमारा दुश्मन है। फिर भी हमारा यह अनुभव है कि चाहे आपकी सरकार हो या आपके पूर्व बनी अन्य राजनीतिक पार्टियों की सरकारें रही हो, सब समय हम और हमारा परिवार राजकीय दमन का शिकार होता रहा है। बिना किसी तथ्यात्मक सच्चाई के सरकार के कानून के रखवाले अधिकारीगण झूठे अभियोग लगाकर हमारे उपर मुकदमे लादते रहे हैं। हमने अपने जन्मकाल से ही असंख्य दमन झेला है- झूठे मुकदमों का बोझ ढोया है। फिर भी हम अपने रास्ते पर खड़े हैं और हमारे पिता अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। हमारी वजह से उन्होंने कभी सत्ता के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया और जहाँ तक मैं अपने पिता को समझा हूँ उस आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि आज भी वे दमन के सामने झुकने को तैयार नहीं होंगे।

सर्वविदित है कि एक बार सन् 2008 में वे गिरफ्तार हुए थे और 9 साल दो महीना सात दिन बाद छूटकर जेल से वे बाहर आये। उनपर लादे गये एक भी मुकदमे सिद्ध नहीं हुए, पर्याप्त अवसर के बावजूद कोर्ट उनके कुछ केस को तो निष्पादित की, लेकिन कुछ को निष्पादित नहीं की और वे जमानत पर बाहर आने को मजबूर हुए, जबकि वे अपने सारे केस का त्वरित निष्पादन चाहते थे। बाहर आकर भी कोर्ट में यथाशीघ्र अपने अनिष्पादित मामलों का निष्पादन यथाशीघ्र करने के लिए आग्रह किया। किंतु, ऐसा न हो सका। क्योंकि ऐसा करके कोर्ट अपने तमाम लोगों का हराम की कमाई को बंद करना नहीं चाहता है। इसलिए कोर्ट में सामान्य से सामान्य मुकदमे भी वर्षों-वर्षों तक चलता रहता है। मेरे पिता ऐसा उचित नहीं समझते हैं और वे पुनः एक दिन कोर्ट जाने के लिए कहकर घर से निकले और अपने परिवार से जुदा होकर पुनः न जाने कहाँ चले गये। जहाँ तक उनके राजनीतिक जीवन के आरंभ से ही वे ऐसा तरीका अपनाते रहे हैं कि वे जब चाहेंगे, जहाँ चाहेंगे, जिस समय चाहेंगे, जिससे मिलना चाहेंगे वे अपनी इच्छा व योजनानुसार उनसे मिल लेंगे। परिवार से मिलने के मामले में भी उनका यही रवैया रहा है। लेकिन परिवार हो या अन्य लोग चाहकर भी अपनी जरूरत और अपने समय के अनुसार उनसे कभी नहीं मिले, यह उनकी एक खासियत है।

इस बार आपकी सरकार नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत माओवादियों के परिवार तथा उनके दोस्तों और रिश्तेदारों को हैरान-परेशान करने के लिए, उनकी सम्पत्ति पर ‘प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)’ के तहत झूठे मुकदमे लादने और व्यापक रूप से हैरान-परेशान करने का रास्ता अपनाया है। इसमें सच है कि हम अवश्य तबाह होंगे, बर्बाद होंगे, परेशान होंगे और नौकरशाही अधिकारियों तथा सुरक्षा बलों के क्रूरतम हमलों के शिकार होंगे। लेकिन इससे धुन के पक्के हमारे पिता और उनके जैसे ही दृढ़चित उनके अन्य मित्र क्रांतिकारी, झुकने को विवश नहीं होंगे। उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत, जहाँ तक मैं जानता हूँ वे छात्र जीवन के समय से ही किये थे और अब वे जीवन के अंतिम पड़ाव की ओर आगे बढ़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने राजनीतिक जीवन में न जाने कितने उतार-चढ़ावों का दौर देखे हैं। छात्र जीवन की समाप्ति के बाद वे आरंभ से भूमिगत नहीं हुए, बल्कि लम्बेकाल तक वे अपने परिवार के जीविकोपार्जन के लिए देहाती जन चिकित्सक के रूप में काम करते रहे और अपने राजनीतिक कार्य में भी जुड़े रहे इसके बाद वे भूमिगत हुए। तब से मेरी माँ और हम सब उनके बच्चे अपार मुसीबतों को झेलते हुए भी आत्मनिर्भर होने के लिए संघर्ष चलाते आ रहे हैं। इन सारी स्थितियों के दौर से गुजरते हुए हम अपने सम्पत्ति का यथासंभव ब्यौरा और उसे प्राप्ति के स्रोत सूचिबद्ध करके यथासंभव ईडी अधिकारियों के पास भेज रहे हैं तथा उसका अनुलग्नक आपके पास इस पत्र में संलग्न कर भेज रहा हूँ। ताकि इसी माध्यम का सहारा लेकर मैं समग्र देशवासियों को अपनी सम्पत्ति और स्थिति से अवगत करा सकूं।

माननीय महोदय! आप और आपकी राज्यसत्ता के पास अकूत बल भरा है। आपके अधिकारियों में हजार-हजार गजराजों के बल या अश्वशक्ति समाहित हैं। आपके लिए कोई भी अभियोग लगाकर, मुझ जैसे किसी भी देशवासी को तबाह करने की असीम क्षमता मौजूद है। आप हजारों मासूमों को कत्लेआम कर-करा सकते हैं। आप असंख्य अबलाओं की इज्जत लूट-लूटवा सकते हैं। बाबा तुलसी दास की यह उक्ति ‘समरथ के न कछु दोष गुसाईं’ को मैं अच्छी तरह से समझता हूँ। मैं खुलकर यह ऐलान करता हूँ कि मैं और मेरा परिवार आप, आपकी संस्था और भारतीय राज्यसत्ता से लड़ना तो दूर, सामान्य प्रतिवाद करने में भी सक्षम नहीं है। मैं अपने पिता या उनकी संस्था जैसा ताकतवर नहीं हूँ। मैं और मेरा परिवार एक सामान्य नागरिक है। मैं एक साधारण स्कूल संचालक तथा शिक्षक और एक सामान्य किसान हूँ। मेरा परिवार कमाने-खाने वाला सामान्य किसान परिवार है। हमारी यह हैसीयत नहीं है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य हजार-हजार रूपया खर्च करके बारी-बारी से कुछ दिन बाद-बाद ईडी कार्यालय में जा सके और उनके द्वारा दी जा रही प्रताड़नाओं को झेल सके।

अतएव, मैं और मेरा समस्त परिवार दोनों हाथ उठाकर आपके सामने आत्मसमर्पण कर, यह कहना ही उचित समझता हूँ कि मौजूदा राज्य के आपके कानून और दमन करने वाले अधिकारियों, सुरक्षा बलों समेत राज्य के आप जैसे तमाम महान राजनीतिक हस्तियों के समक्ष नतमस्तक होकर यह आग्रह करता हूँ कि आप अपना भरपूर क्रूरतम हमला हम सब पर करें, मैं और मेरा परिवार आपके हर हमलों को बिना कोई प्रतिवाद-प्रतिरोध के तब तक सहेंगे जब तक हमारा अंत न हो जाय। मैं और मेरा परिवार किसी भी हालत में इसमें सक्षम नहीं हैं कि मेरे पिता का आत्मसमर्पण कराने के उद्देश्य से हम पर की जा रही कार्रवाई के बावजूद आपका कोई मदद दे सके। हम अपनी तबाही, बर्बादी, इज्जत-आबरू की धज्जी उड़ जाने के बावजूद भी अपने बचाव का कोई भी सकारात्मक प्रयास करने में बिल्कुल अक्षम हैं। आप यथाखुशी जो भी लूटना चाहते हैं, छीनना चाहते हैं, हथियाना चाहते हैं, उसमें विलंब न करें और हमें सदा-सदा के लिए मुक्ति प्रदान करें।

हम सपरिवार पलक पाँवड़े बिछाकर आपके जुल्मों सितम को झेलने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। मैं तो सिर्फ उपर वाले से अपने उपर आने वाली हर विपत्तियांे को झेलने की ताकत चाहूँगा और आपको सिर्फ एक ही नसीहत, संत कबीर के पंक्ति का उल्लेख करते हुए मन की बात को विराम देता हूँ।

निर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय,

मुवे खाल की श्वांस सो, लौह भस्म हो जाय!!’

आपका विश्वासी

  (सुचित मिश्रा सह समस्त परिवार)

ग्राम पोस्ट – कासमा, थाना – कासमा

जिला – औरंगाबाद (बिहार)

पिन नं. – 824125

दिनांक – 27.07.2021

अनुलग्नक –

         हम तीन भाइयों के कठिन व कठोर परिश्रम से अर्जित चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा निम्न प्रकार है:-

(1) 2 (दो) डिसमिल पुश्तैनी जमीन में बना मकान।

(2) 4 (चार) डिसमिल पुश्तैनी जमीन में बना – ‘माँ द्रौपदी देवी सर्वांगीण विकास बालिका उच्च विद्यालय, कासमा है।

(3) 2( (सवा दो) डिसमिल जमीन में बना – छड़, सिमेंट की दुकान है।

(4) 2 (दो) डिसमिल कासमा में आवासीय जमीन।

(5) 2 एकड़ 35 डिसमिल कृषि योग्य भूमि, जिसमें खेती की जा रही है।

(6) 2) (अढ़ाई) डिसमिल धनबाद में आवासीय जमीन, जिसका मामला धनबाद कोर्ट में लंबित है।

(7) लगभग 9 (नौ) डिसमिल, कासमा में दान की आवासीय जमीन।

(8) खेती व दुकान के कामकाज के उद्देश्य से खरीदा गया एक ट्रैक्टर।

(9) तीन मोटरसाईकिल    .

         

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

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